जानवरों के लिए खर्च करते हैं आधी से ज्यादा कमाई, जंगलों में भी जाकर खिलाते हैं खाना

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ईश्वर ने मनुष्य को बोलने की शक्ति का वरदान देकर उसे धरती के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया है। इस बोलने की शक्ति का सहारा लेकर वह अपने मन के भावों और विचारों को बोलकर व्यक्त करता है, लेकिन जानवरों के साथ ऐसा नहीं है। भले ही वो आपस में अपनी भाषा में बात करते हों पर उसे हम समझ नहीं पाते। लेकिन उनके प्रति प्यार और आदर उन्हें खूब समझ आता है। आप भी यदि जानवरों को प्यार करेंगे तो उसके बदले में वह भी बेहद प्यार करते हैं। ऐसा कहा और माना भी जाता है कि घोड़े और श्वान जैसे कुछ जानवर मनुष्य से भी अधिक भरोसेमंद और स्वामिभक्त होते हैं। परंपरा का हिस्सा है पशु प्रेम पशु-पक्षियों का साहचर्य प्राप्त करना तो हमारी परंपरा का अटूट हिस्सा रहा है। चाहे वो पक्षियों को दाना चुगाना हो, चींटियों व मछलियों को दाना डालना हो अथवा गाय या श्वान को रोटी खिलाना। यह आचरण पशु-पक्षियों के प्रति हमारे कोमल व संवेदनशील व्यवहार को दर्शाते हैं। यही नहीं, हममें से बहुत से लोग इन जानवरों को पालने का भी शौक रखते हैं। आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताएंगे जो जानवरों के सेवा के लिए अपनी आधी से अधिक कमाई खर्च कर देते है। आइये जानते है उस दयालु इंसान के बारे में।

बाशा मोहीउद्दीन का परिचय।

Sheik Basha Mohiuddin feeding stray animals

 

बाशा मोहीउद्दीन आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के रहनेवाले है। उनकी आयु 50 वर्ष है। बाशा पिछले दस सालों से निरंतर जानवरों की सेवा करते आए है। उनको जानवरों से बहुत लगाव है। एक मध्यम परिवार के होते हुए भी वह जानवरों पर अपनी आधी कमाई खर्च कर देते है।

जब तक ज़िंदगी है तब तक जानवरों की सेवा।

बाशा मोहीउद्दीन का कहना है कि वह जब तक जीवित रहेंगे बेजुबानों की सेवा करते रहेंगे। बाशा का यह लगाव सचमुच प्रशंसनीय है। वह बचपन से जानवरों की सेवा करते आए है। बाशा केवल 10वीं पास हैं। स्कूल की पढ़ाई के बाद से ही उन्होंने नौकरी शुरू कर दी थी। कई सालों तक उन्होंने कुवैत में भी काम किया। साल 2010 में वह देश लौट आए और छोटे स्तर पर रियल एस्टेट का काम शुरू किया। फिलहाल, 2017 से शहर में वह अपना फिटनेस जिम चला रहे है। उनके जिम से जितनी कमाई होती है वह जानवरों में उन कमाई का आधा हिस्सा खर्च करते है ।

जानवरों से लगाव की कहानी।

Feeding Monkeys and Cows

 

बाशा मोहीउद्दीन को जानवरों से लगाव तब हुआ जब वो 2011 में एक जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने बंदरों का एक झुंड देखा जो एक बोतल के आधे पानी के लिए आपस मे झगड़ रहे थे ।उन्होंने सोचा कि बेजुबानों को खाने-पीने में बहुत तकलीफ होती होगी। उन्होंने तभी से प्रण किया वो जानवरों की सेवा करेंगे। उस घटना के बाद 10 सालों से वह लगातार जानवरों की सेवा करते आ रहे है। वह जंगल मे जाते है जानवरों के लिए पानी भरते है ,उन्हें खाना उपलब्ध कराते है। यह सब करके उनके बहुत खुशी मिलती है। वह लगभग 40 किमी में फैले जंगल में जाकर जानवरों को खाना खिलाते हैं ।

परिवार वालों का मिलता है पूरा सहयोग।

बाशा मोहीउद्दीन को उनके परिवार वालों का पूरा सहयोग मिलता है ।उनकी पत्नी भी इस काम में उनका पूरा सहयोग करती है। बाशा जीतना कमाते है उसका आधा भाग वह जानवरों की सेवा में खर्च करते है। सभी लोगों को बाशा मोहीउद्दीन से प्रेरणा लेने की जरूरत है। हमें भी बेजुबानों की सेवा करनी चाहिए।वो भी प्रकृति का एक हिस्सा है।

 

 

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