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Bhagat Singh

Bhagat Singh – शहीद सरदार भगत सिंह जीवन परिचय

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मेरे लहू का हर एक कतरा इन्कलाब लायेगा

मेरा देश मुझे बुला रहा है पिस्तौल और बम से इन्कलाब नही आता,
हमारे अपने विचारो से इन्कलाब आता है, यह समय मेरी शादी का नही है मेरा जन्म देश की आजादी के लिए है l

देश भक्ति तो हर किसी के मन में होती है लेकिन देश के लिए मर मिटने का जूनून हर किसी में नही होता इस प्रकार का जूनून कुछ गिने चुने लोगो में होता है उनमे से थे हमारे सभी के दिलो की शान शहीद सरदार भगत सिंह | आइये जानते है इनके जीवन के बारे में……

Bhagat Singh
Bhagat Singh

भगत सिंह का जीवन परिचय

Bhagat Singh एक साधारण सिख परिवार से आते है इनका जन्म 28 सितम्वर 1907 को पंजाब के एक किसान परिवार में हुआ था, भगत सिंह के पिता जी का नाम सरदार किशन सिंह और माता जी का नाम विधावती कौर था,

शहीद की देश के प्रति देश भक्ति औरो से अपेक्षा जनक अधिक थी भगत सिंह का मनना था की देश को आजाद करने के लिए सिर्फ नरम दल से कुछ नही होगा हमें अंग्रेजो को दिखाना पड़ेगा हम भारतीय देश के लिए अपने प्राण भी त्याग सकते है l

पूरा नामभगत सिंह
जन्म तिथि28 सितंबर, 1907
जन्म स्थानबंगा, पंजाब, ब्रिटिश भारत
माता-पिताकिशन सिंह (पिता) और विद्यावती देवी (माता)
शिक्षानेशनल कॉलेज, लाहौर
राजनीतिक जुड़ावहिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA)
क्रांतिकारी गतिविधियाँ– युवा क्रांतिकारी आंदोलन में हिस्सा लेना। ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सौंडर्स की हत्या में सहभागी होना। दिल्ली के केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर कठोर कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन करना। ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वराज के पक्षधर होना।
कैद8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार किया गया। जॉन सौंडर्स की हत्या के लिए उम्रकैद की सजा पाई। कैद के दौरान विभिन्न कारागार में भेजा गया।
विचारधारासमाजवाद, कम्यूनिज्म, और अराजकता
प्रभावभारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख आदर्श माना जाता है। अपनी लेखनी और कार्यों के माध्यम से कई क्रांतिकारियों और कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया।
फांसी23 मार्च, 1931 को लाहौर केंद्रीय जेल में 23 वर्ष की आयु में फांसी दी गई।
उपनगरीएक शहीद और विद्रोह के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके विचार और बलिदान ने स्वतंत्रता की लड़ाई में अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया है।

Bhagat Singh की देश के प्रति देश भक्ति

भारत पर अंग्रेजो की हुकूमत थी 1857 में प्लासी के युद्ध के बाद अंग्रेजी हुकुमत पूरी तरह से कायम हो गई थी भारत से कच्छा माल सस्ते में लेते थे और इग्लैंड में महगी दरो पर बेचते थे भारतीय मजदूरो पर जम कर अत्याचार करते थे

जलिया बाला बाग हत्या कांड से Bhagat Singh के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा यहाँ से इन्होने देश को आजाद करने का प्रण लिया और चन्द्र शेखर द्वारा बनाये गए दल में हिस्सा लिया और चन्द्र शेखर के कदमो पर भारत को आज़ादी की तरफ ले चले |

Bhagat Singh की देश के प्रति क्रांतिकारी गतिविधि

Bhagat Singh के जीवन पर जलिया वाले बाग हत्या कांड का ऐसा असर हुआ की उन्होंने अपना जीवन देश के प्रति समर्पित कर दिया चन्द्र शेकर आजाद के कदमो पर चलने लगे और कई जुलूसो में सामिल होने लगे  भगत सिंह शुरु से अपने चाचा के करांतिकारी कार्यो को सुनते थे, और किताबो और समाचार पत्र ,पत्रिकाओ में पड़ते थे महात्मा गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में इन्होने अपनी सहमति जताई लेकिन जब गाँधी जी ने आन्दोलन बापस लिया तो भगत को अच्छा नही लगा और उन्होंने गरम दल में सामिल हो गये l

काकोरी कांड के बाद 4 को फाँसी और 16 को कारावास दी गई तो भगत ने अपनी एक पार्टी बनाई जिसमे भगत सिंह ,लाला लाजपत राय, सुखदेव, राजगुरु जैसे करान्तिकरियो को अपने साथ सामिल किया l

कुछ समय बाद लाला लाजपत ने साइमन बहिस्कार के लिए आन्दोलन में हिस्सा लिया , उस आन्दोलन में साइमन ने लाठी चार्ज शुरु करा दिया, जिसकी बजह से लाला लाजपत की मृत्यु हो गई, जिसका बदला लेने के लिए भगत द्वारा साजिस रचाई गई और पूरी तैयारी के साथ भगत और उनके सथियों ने मिलकर साइमन को गोली मार दी और अपना प्रतिशोध पूरा किया l

अंग्रेजी असेम्बली में बम फेकना 

Bhagat Singh का मानना था की अंग्रेज अहिंसा से नही मानेगे इनको बताना पड़ेगा भारतीय लोग जाग चुके है और अब अंग्रेजो का यह जुल्म नही सहेगे और हर उस कानून का विरोध करेगे जो उनके हित के लिए नही होगा, इसी सोच को अंग्रेजो के मन में डालने के लिए भगत सिंह ने असेम्बली में बम फेकने की योजना बनाई,

7 अप्रैल 1921 को अंग्रेजी असेम्बली में बम फेका उसमे किसी की जान नही गई क्यों की भगत सिंह चाहते थे की किसी की जान न जाये और हमारी आवाज सबके पास चली जाये और बम फेकने के बाद इन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाने शुरु कर  दिए l

Bhagat Singh
Bhagat Singh को अंग्रेजो द्वारा फासी दी गई

भगत सिंह लगभग 2 साल जेल में रहे और अपने जेल में रहते हुए भी अपने विचारो और देश भक्ति काव्य से उन सबका विरोध किया जो भारतीय मजदूर पर अत्याचार करते थे, जेल में उन्होंने कई पूंजीवादी और अंग्रेजो को अपना शत्रु बताया जो भारतीय लोगो पर अत्याचार करते है l

जेल में रहकर उन्होंने भूख हड़ताल भी की इसी बजह से उनका एक साथी भूख हड़ताल में मारा गया इसी बीच भगत सिंह और उनके दो साथी को फांसी की सजा सुनाई गई, फाँसी की सजा माफ़ करने के लिए कई याचिका दर्ज की लेकिन सभी याचिका को ख़ारिज कर दिया गया, पुरे भारत में धारा 144 लागू करने के पश्चात् 23 मार्च 1931 को शाम 7 बजे सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरु को फाँसी दे दी गई !

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Inspirational Story – जशराज चारण हर दिन 25 किलो आटे की रोटियां बनाकर, भरते हैं 300 से ज़्यादा बेसहारा कुत्तों का पेट

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वैसे तो जानवरों और पक्षियों से इंसान का प्यार कोई नई बात नहीं है। युगों से इंसान पशु-पक्षियों से प्यार करता रहा है।

दुनिया में कई सारे लोग हैं जो पक्षियों और जानवरों से बेहद प्यार करते हैं। कई लोगों ने कुत्ता, बिल्ली जैसे जानवरों को ऐसे अपना लिया है कि वे उन्हें अपने घर-परिवार का बेहद अहम हिस्सा मानते हैं। आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताएंगे जो हर रोज पशुओं के लिए भोजन तैयार करते हैं। हर दिन उनके द्वारा 300 बेसहारा कुत्तों का पेट भरा जाता है। आइये जानते है इस नेक कार्य के बारे में।

जशराज चारण का परिचय

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Image/ Better India

जशराज चारण कच्छ के मांडवी तालुका के कठड़ा गाँव के निवासी है। उन्हें जानवरों से इतना प्यार है कि वह प्रतिदिन जानवरों के लिए भोजन तैयार करते हैं और बेसहारा जानवरों का पेट भरते हैं। उनका परिवार हर दिन 25 किलो आटे का रोटी तैयार करता है और कुत्तों को खिलाता है। जानवरों के प्रति उनका यह अद्भुत प्यार को उनके गांव के लोग काफी प्रशंसा करते हैं।

वन विभाग में काम करते थे जशराज

जशराज वन विभाग में काम करते थे। उन्होंने पहले फॉरेस्ट गार्ड और वनपाल के तौर पर काम किया है। उन्होंने वन विभाग में 37 साल काम किया है। वह विभाग में काम करते-करते जशराज को जानवरों से काफी लगाव हो गया तभी से वो जानवरों की खूब सेवा करते हैं। जानवरों के भोजन में प्रतिमाह उनके द्वारा 35 हजार रुपये का खर्च किया जाता है। जसराज के परिवार के और लोग भी वन विभाग में कार्यरत है। अभी वर्तमान में उनका छोटा बेटा और बेटी वन विभाग में अपनी सेवा दे रही हैं।

भरते है 300 कुत्तों का पेट

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Image/ Better India

जशराज रिटायर होने के बाद से ही पशु प्रेम में लगे हुए है। वह अपने गांव के 300 कुत्तों को प्रतिदिन भोजन कराते हैं। उन्हें यह सब करना बहुत पसंद है।इसकी शुरुआत अचानक ही उनके द्वारा हुई थी। जशराज रोज ऑफिस से आने के बाद वॉक पर जाया करते थे। एक दिन उन्होंने देखा कि कुत्ते के छोटे-छोटे बच्चे, अपनी माँ के साथ बड़ी ही दयनीय हालत में थे। चूँकि उनकी माँ भी अपने बच्चों को छोड़कर खाना लाने नहीं जा सकती थी। इसलिए वह भी भूखी और कमजोर हो गई थी। जशराज ने उस दिन तो उन्हें बिस्कुट खरीद कर खिला दिए। लेकिन अगले दिन उन्होंने अपनी पत्नी से तीन-चार रोटियां बना कर देने को कहा। इस तरह वह उनको रोज रोटियां देने लगें।

जानवरों की संख्या बढ़ी

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Image/ Better India

इसी चीज को रोजाना करने से जानवरों को संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई। इस तरह अब उनके घर में 300 कुत्तों के लिए हर रोज खाना तैयार होता है। वहीं, जशराज हर दिन जंगल में छोटे-छोटे जानवर, जैसे- खरगोश, हिरन और सियार के छोटे बच्चों को बिस्कुट खिलाने जाते हैं। इसके लिए वह हर महीने लगभग पांच हजार के बिस्कुट भी खरीदते हैं। इन सभी कामों में जशराज के परिवार वाले हमेशा साथ देते हैं।

जशराज चारण के पशु प्रेम की जितनी प्रशंसा की जाए कम है। लोगों को जशराज से सिख लेने की आवश्यकता है।

 

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Inspirational Story : लुधियाना की रहने वाली 42 वर्षीया रूह चौधरी,पिछले कई सालों से अपनी कमाई से कर रही है जानवरों की सेवा !

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वैसे तो इंसान का जानवर से प्यार करना कोई नई बात नहीं है। युगों से इंसान पशुओं से प्यार करता रहा है । दुनिया में कई सारे लोग हैं, जो जानवरों से बेहद प्यार करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी है जो जानवरों से ऐसे प्यार करते है जैसे उनके परिवार का ही सदस्य हो । कहते हैं प्यार-मोहब्बत, लगाव जैसी भावनाएं सिर्फ इंसानों में होती है, जानवर इमोशनलेस होते हैं। पर ऐसा नहीं है, जानवरों में भी भावनाएं होती हैं। आज हम आपको एक ऐसी ही महिला के बारे में बताएंगे जिन्हें जानवरों से बेहद प्यार है। वह रोज जानवरों को खाना खिलाती है । बीते लॉकडाउन में भी उन्होंने जानवरों के प्रति अपने प्रेम को दिखाया है। आइये जानते है उनके बारे में।

रूह चौधरी का परिचय । 

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Image/ Better India / रूह चौधरी

रूह चौधरी लुधियाना की रहने वाली है। वह 42 वर्ष की है।रूह को जानवरों से बहुत लगाव है। वह रोज लगभग 75 बेजुबान जानवरों को खाना खिलाती है । यह काम रूह काफी दिनों से करती आ रही है ।बीते लॉकडाउन में जब लोग घर में अपना समय बीता रहे थे तब रूह जानवरों के लिए खाने का प्रबंध करती थी। वह लॉकडाउन में प्रतिदिन 500 बेसहारा कुत्तों को खाना खिलाया करती थी।

बचपन से जानवरों से लगाव।

रूह को अपने बचपन से जानवरों से लगाव है। वह अपने पापा से जानवरों की देखभाल करना सीखी हैं। रूह को बचपन में कोई भी जानवर घायल दिखता था तो वह तुरंत उसे सही इलाज दिलाना और हर रोज उसे खाना खिलाती थी। वह बेजुबानों का दर्द बचपन से समझती आई है। उनका कहना है कि इन बेजुबानों का दर्द इंसान नही समझेंगे तो कौन समझेगा। ये जानवर भी हमारे पृथ्वी के अभिन्न अंग है। इनकी देखभाल करना इंसानों का कर्तव्य है। जानवरों से ही पृथ्वी का संतुलन कायम है। इस धरती पर इन्हें भी रहने का अधिकार है।

अपनी कमाई से करती है जानवरों की सेवा।

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Image/ Better India/ हर रोज खिलाते हैं बेसहारा जानवरों को खाना

रूह चौधरी रोजाना जानवरों को खाना देती है । यह काम वह अपने बेटे के साथ मिलकर करती हैं । सुबह-शाम दोनों वक्त वह घूम-घूम कर सेवा देती है। रूह काफी समय से बेकिंग कर रही थी और साथ ही, खाना बनाने का भी उन्हें शौक था । उन्होंने तय किया कि वह घर से ही एक छोटी-सी पहल करें और उन्होंने वीकेंड पर बतौर ‘होम शेफ’ काम करना शुरू किया। वह “बेकिंग के कुछ ऑर्डर मैं पहले भी लेती थी। लेकिन यह नियमित नहीं था । लेकिन पिछले साल लॉकडाउन से उन्होंने नियमित वीकेंड पर खाने के ऑर्डर लेना शुरू किया। उनके इन ऑर्डर से जो भी पैसे आते हैं, वह उनसे इन बेसहारा जानवरों के खाने और इलाज आदि की व्यवस्था करती हैं। वह जितना कमाती है वह जानवरों की सेवा में लगाती हैं।

पर्यावरण के लिए भी सोचती है रूह।

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Image/ Better India/ पर्यावरण के लिए भी सोचती है रूह।

रूह चौधरी को जितना जानवरों से प्यार है उतना ही वह पर्यावरण के लिए भी सोचती हैं। उनके घर से किसी भी तरह का कचरा बाहर नही फेंका जाता है । वह अपने घर पर ही कचरे से जैविक खाद तैयार करती हैं । वह अपने रसोई के कचरे से जैविक खाद बनाती हैं, जिनका उपयोग वह अपने बेटे के साथ बागबानी करने में करती हैं। वह प्लास्टिक की कोई भी सामग्री नहीं खरीदती हैं और सभी तरह की खरीदारी के लिए कपडे का बैग लेकर जाती हैं। वह हमेशा यह सोचती है कि उनके कारण पर्यावरण को किसी भी प्रकार का नुकसान नही हो।

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Image / Better India/मिट्टी के बर्तनों में पैक करती हैं खाना

उनकी सभी डिशेज भी उनके ग्राहकों तक पर्यावरण के अनुकूल तरीकों से पैक होकर पहुंचाई जाती हैं। अपनी डिशेज को पैक करने के लिए वह मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करती हैं।

रूह चौधरी के जानवरों और पर्यावरण के प्रति इतना समर्पण सचमुच अद्भुत है। रूह आज सभी लोगों के लिए प्रेरणाश्रोत है। हमें भी जानवरों और पर्यावरण से प्यार करना चाहिए। हमारा आने वाले भविष्य के लिए यह दोनों बहुत ही जरूरी है। पृथ्वी को संतुलित रखने में भी यह जरूरी है। हमें अपने जीवन में इन सभी पहलुओं को अपनाकर अपने अंदर बदलाव लाने की जरूरत है।

 

अगर आप रूह चौधरी से संपर्क करना चाहते हैं तो उन्हें फेसबुक पर संपर्क कर सकते हैं।

 

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भारत के 2 लाख से भी ज़्यादा ग्रामीण बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं अमरीकी NRI बिस्वजीत नायक

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बहुत कम ऐसे लोग है जो विदेश रहकर भी अपने देश के लिए सोचते है । जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण है बिस्वजीत नायक।
बिस्वजीत नायक एक ऐसे अप्रवासी भारतीय है जो रहते तो कैलिफोर्निया में है पर वह भारत के लोगों के उत्थान के लिए लगे हुए है। आज बिस्वजीत एविटी लर्निंग से उड़िया के अलावा 15 से अधिक भारतीय भाषा मे लर्निंग कंटेंट तैयार कर के ग्रामीण छात्रों तक पहुचा रही हैं। आइये जानते है बिस्वजीत के बारे में।

बिस्वजीत का परिचय ।

बिस्वजीत नायक ओड़िसा के जाजपुर ज़िले के नारीगांव के रहने वाले है। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा वही के स्थानीय स्कूल से पूरी की। इन्होंने NIT राउरकेला से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढाई की हैं। बीटेक करने के बाद इन्होंने कुछ साल भारत में नौकरी की । इसके बाद विदेश में जॉब करने की चाहत में यह 1999 में कैलिफ़ोर्निया के सिलिकॉन वैली चले गए। जहाँ पर अच्छी सैलरी पर इनकी नौकरी भी लग गयी । र इनका दिल था जो अब भी अपने देश में ही था। बिस्वजीत विदेश तो चले गए पर वह हमेशा अपने देश भारत के लिए सोचा करते थे। वह साल में एक बार भारत ज़रूर आते थे और यह बच्चो को शिक्षा देते थे।

बिस्वजीत ने ट्यूशन सेंटर की शुरुआत की ।

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बच्चों के साथ बिस्वजीत

अपने देश से प्यार के कारण वह जब भी भारत आते थे तो बच्चों को पढ़ाया करते थे । वह एक बार पाचवीं कक्षा के एक लड़की को पढा रहे थे तो उन्हें समझाने में दिक्कत हो रही थी । उन्होंने तय किया कि वह अपने क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार को बढाने के लिए ट्यूशन सेंटर की शुरुआत करेंगे जिससे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। उन्होंने इसी सोच के साथ अपने गांव में मधुसूदन शिख्या केंद्र की नींव डाली ।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का दीप ।

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Image/ Social Media

बिस्वजीत ने ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों में शिक्षा का दीप जलाया ।
बिस्वजीत ने जिस शिक्षा के दीप को जलाया उसे अब एविटी लर्निंग के नाम से जाना जाता हैं। यह Masive open online course(MOOC) पर आधारित हैं। 2017 में बिस्वजीत ने एविटी लर्निंग को आधिकारिक नाम से पंजीकृत करवाया। एविटी लर्निंग के आज उड़िया के अलावा 15 से अधिक भारतीय भाषा मे लर्निंग कंटेंट तैयार कर के ग्रामीण छात्रों तक पहुचा रही हैं। आज 120 से अधिक केंद्र और 400 स्कूलों में इसके कंटेंट को पढ़ाया जाता हैं। इसका पाठ्यक्रम पूरे राज्य में पढ़ाया जाता हैं।

चंदा वसूली करने वाले को बनाया मैनेजर।

बिस्वजीत ने एक नवयुवक जो गांव में घूमकर पूजा का चंदा वसूली का काम करता था उसे मैनेजर बनाया। वह बताते हैं कि एक बार गणेश पूजा के पहले कुछ लोग चंदा वसूली कर रहे थे। उन्ही लोगो मे से एक युवक प्रकाश पर बिस्वजीत की नज़र पड़ी। इन्होंने प्रकाश को 3 हज़ार रुपये महीने की नौकरी का ऑफर दिया। बिस्वजीत कहते है कि आज सेन्टर चलाने से लेकर छात्रों का डेटाबेस तैयार करना या पेरेंट्स को समझना यह सभी काम प्रकाश ही संभालता हैं। सेन्टर में आज शिक्षक और कंटेंट बनाने वालों को।मिलाकर 18 सदस्य हैं।

पूरे भारत में प्रसार करने का लक्ष्य ,दोस्त भी करते है मदद।

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Image / Social Media

बिस्वजीत के दोस्त जिन्हें भारत से लगाव था वह आज उनकी मदद कर रहे है । उनके दोस्त स्मार्ट लर्निंग उपकरण जैसे टेबलेट या संचालन के उपकरणों का स्पांसर करते है। बिस्वजीत इस पाठ्यक्रम को पूरे भारत के कोने-कोने में ले जाना चाहते है। जिससे गरीब छात्र-छात्राओं को भी इससे लाभ हो।

 

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Inspirational Story of A Bus Conductor : गरीब छात्रों की शिक्षा के लिए, यह बस कंडक्टर देता है हजारों का योगदान

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जरूरी नही की सेवा के लिए आपका धनवान होना जरूरी है। आपके पास सेवा करने की भावना होनी चाहिए। जिसमें सेवा करने की भावना होती है वह इंसान अपने कम बचत में भी खूब सेवा करता है। आज हम एक ऐसे ही इंसान के बारे में आपको बताएंगे जिनके अंदर सेवा करने की भावना इतनी है कि वह एक बस कंडक्टर की नौकरी करके अपने कम कमाई में भी सालाना बचत करके पढ़ने वाले गरीब छात्र-छात्राओं की मदद करते है। आइये जानते है उनके बारे में ।

कौन है थोटा श्रीधर ?

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स्कूल में आयोजन के दौरान श्रीधर

थोटा श्रीधर मूल रूप से चित्तूर जिले के मुलकलचेरुवु के रहने वाले है। उनका बचपन वहीं बीता और वहीं के सरकारी स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई की। उनके पिताजी खेती-बाड़ी करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके पिता एक किसान होने से उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दैनीय थी।

बस कंडक्टर की नौकरी मिली।

थोटा श्रीधर दसवीं की पढ़ाई के बाद, अनंतपुर के तनकल्लू आ गए और यहाँ से उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद, 1991 में उन्हें ‘आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम’ (APSRTC) में बतौर बस कंडक्टर नौकरी मिल गयी। उनकी इस नौकरी से, उनके घर की आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुधर गयी।

गरीब बच्चों की मदद करते है श्रीधर ।

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बच्चों को किताबें देते हुए

एक बस कंडक्टर होने के बावजूद श्रीधर मुलकलचेरुवु के ‘जिला परिषद हाई स्कूल’ में हर साल गणतंत्र दिवस पर गरीब बच्चों के लिए 20 से 25 हजार रुपये की मदद करते है । इन पैसों से स्कूल के ऐसे मेधावी छात्रों की किताब, कॉपी, स्कूल बैग और जूते आदि खरीदने में मदद की जाती है, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। वह साल 2015 से यह योगदान दे रहे हैं। उनके योगदान से अब तक, 100 से ज्यादा छात्रों को मदद मिल चुकी है।

माँ के मृत्यु के बाद से सेवा शुरू की।

श्रीधर की माँ के देहान्त के बाद वह लगातार सेवा करते आ रहे है। उनकी माँ का देहांत 2014 में हो गया था । श्रीधर खुद भी उसी स्कूल से पढ़े है । हर साल श्रीधर 26 जनवरी को मेघावी छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत करते है।उनके यह सेवा की भावना सालों से चली आ रही है। श्रीधर के इस काम से स्कूल के सभी शिक्षक अत्यंत ही प्रभावित है।

अपने एक शिक्षक से मिली प्रेरणा।

श्रीधर को सेवा की प्रेरणा अपने एक शिक्षक से मिली। दरअसल स्कूल के दिनों में श्रीधर एक शिक्षक ने उन्हें कहा था कि अच्छे कर्म करने से अखबार में तस्वीर आती है । बस उसी दिन से श्रीधर ने यह कसम खाई की वह अपने कर्तव्य को हमेशा अच्छा रखेंगे । उन्होंने तभी से सेवा करनी शुरू कर दी। आज श्रीधर की तारीफ हर तरफ होती है। एक कंडक्टर होने के बाद भी महीने में 2000 रुपये तक की बचत करके गरीब बच्चों के प्रति उनके सेवा के भाव की तारीफ जितनी हो कम ही प्रतीत होता है। श्रीधर से हमसभी को प्रेरणा लेने की जरूरत है।

 

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Inspirational Story :जानवरों के लिए खर्च करते हैं आधी से ज्यादा कमाई, जंगलों में भी जाकर खिलाते हैं खाना

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ईश्वर ने मनुष्य को बोलने की शक्ति का वरदान देकर उसे धरती के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया है। इस बोलने की शक्ति का सहारा लेकर वह अपने मन के भावों और विचारों को बोलकर व्यक्त करता है, लेकिन जानवरों के साथ ऐसा नहीं है। भले ही वो आपस में अपनी भाषा में बात करते हों पर उसे हम समझ नहीं पाते। लेकिन उनके प्रति प्यार और आदर उन्हें खूब समझ आता है। आप भी यदि जानवरों को प्यार करेंगे तो उसके बदले में वह भी बेहद प्यार करते हैं। ऐसा कहा और माना भी जाता है कि घोड़े और श्वान जैसे कुछ जानवर मनुष्य से भी अधिक भरोसेमंद और स्वामिभक्त होते हैं। परंपरा का हिस्सा है पशु प्रेम पशु-पक्षियों का साहचर्य प्राप्त करना तो हमारी परंपरा का अटूट हिस्सा रहा है। चाहे वो पक्षियों को दाना चुगाना हो, चींटियों व मछलियों को दाना डालना हो अथवा गाय या श्वान को रोटी खिलाना। यह आचरण पशु-पक्षियों के प्रति हमारे कोमल व संवेदनशील व्यवहार को दर्शाते हैं। यही नहीं, हममें से बहुत से लोग इन जानवरों को पालने का भी शौक रखते हैं। आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताएंगे जो जानवरों के सेवा के लिए अपनी आधी से अधिक कमाई खर्च कर देते है। आइये जानते है उस दयालु इंसान के बारे में।

बाशा मोहीउद्दीन का परिचय।

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Sheik Basha Mohiuddin feeding stray animals

 

बाशा मोहीउद्दीन आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के रहनेवाले है। उनकी आयु 50 वर्ष है। बाशा पिछले दस सालों से निरंतर जानवरों की सेवा करते आए है। उनको जानवरों से बहुत लगाव है। एक मध्यम परिवार के होते हुए भी वह जानवरों पर अपनी आधी कमाई खर्च कर देते है।

जब तक ज़िंदगी है तब तक जानवरों की सेवा।

बाशा मोहीउद्दीन का कहना है कि वह जब तक जीवित रहेंगे बेजुबानों की सेवा करते रहेंगे। बाशा का यह लगाव सचमुच प्रशंसनीय है। वह बचपन से जानवरों की सेवा करते आए है। बाशा केवल 10वीं पास हैं। स्कूल की पढ़ाई के बाद से ही उन्होंने नौकरी शुरू कर दी थी। कई सालों तक उन्होंने कुवैत में भी काम किया। साल 2010 में वह देश लौट आए और छोटे स्तर पर रियल एस्टेट का काम शुरू किया। फिलहाल, 2017 से शहर में वह अपना फिटनेस जिम चला रहे है। उनके जिम से जितनी कमाई होती है वह जानवरों में उन कमाई का आधा हिस्सा खर्च करते है ।

जानवरों से लगाव की कहानी।

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Feeding Monkeys and Cows

 

बाशा मोहीउद्दीन को जानवरों से लगाव तब हुआ जब वो 2011 में एक जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने बंदरों का एक झुंड देखा जो एक बोतल के आधे पानी के लिए आपस मे झगड़ रहे थे ।उन्होंने सोचा कि बेजुबानों को खाने-पीने में बहुत तकलीफ होती होगी। उन्होंने तभी से प्रण किया वो जानवरों की सेवा करेंगे। उस घटना के बाद 10 सालों से वह लगातार जानवरों की सेवा करते आ रहे है। वह जंगल मे जाते है जानवरों के लिए पानी भरते है ,उन्हें खाना उपलब्ध कराते है। यह सब करके उनके बहुत खुशी मिलती है। वह लगभग 40 किमी में फैले जंगल में जाकर जानवरों को खाना खिलाते हैं ।

परिवार वालों का मिलता है पूरा सहयोग।

बाशा मोहीउद्दीन को उनके परिवार वालों का पूरा सहयोग मिलता है ।उनकी पत्नी भी इस काम में उनका पूरा सहयोग करती है। बाशा जीतना कमाते है उसका आधा भाग वह जानवरों की सेवा में खर्च करते है। सभी लोगों को बाशा मोहीउद्दीन से प्रेरणा लेने की जरूरत है। हमें भी बेजुबानों की सेवा करनी चाहिए।वो भी प्रकृति का एक हिस्सा है।

 

 

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Social Heroes :कुत्ते को गटर से पानी पीता देख शुरू की पहल, अब तक बाँट चुके हैं 25,000 पानी के बर्तन

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पशु-पक्षियों में भी मनुष्यों की भांति प्रेम की भावना होती है । इसीलिए पशु-पक्षी समूह में रहते हैं और प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं । अकारण किसी पर हमला नहीं करते ।दैनिक दिनचर्या के ऐसे काम जो मनुष्य नहीं कर सकता पशु सहज भाव में ही कर देते हैं । पालतू पशु-पक्षी भी मनुष्य के साथ प्रेम भाव से बंध जाते हैं और उसके लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देते हैं ।आज हम आपको एक ऐसे ही इंसान के बारे में बताएंगे जो जानवरों से बहुत प्रेम करते है। उनका प्रेम भावना अद्भुत है । आइये जानते है उनके बारे में ।

जैन सनी का परिचय ।

जैन सनी कर्नाटक के तुमकुर के रहने वाले है। पेशे से एक फार्मासिस्ट हैं और साथ ही, वह ‘वॉटर फॉर वॉइसलेस‘ अभियान चला रहे हैं। वह 35 वर्ष के है। लगभग सात साल पहले उन्होंने अकेले तुमकुर में इस अभियान की शुरुआत की थी, लेकिन आज यह पहल लगभग दस शहरों तक पहुँच चुकी है। आज इस अभियान के चर्चे लोगों तक आसानी से पहुँच रहे है। दरअसल इस अभियान के तहत वह पशु-पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम करते है।

घर-घर जाकर लोगों को घड़े/बर्तन बांटे ।

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उन्होंने इस अभियान कि शुरुआत घर-घर जाकर लोगों को घड़े/बर्तन बांटने से की थी, जिनमें लोग अपने घरों के बाहर जानवरों के लिए पानी भरकर रख सकते हैं। आज वह और उनकी टीम लगभग 25000 बड़े-छोटे पानी के बर्तन लोगों को बाँट चुकी है।
ताकि जितना ज्यादा हो सके पशु-पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम हो।

बेजुबानों के लिए प्रेम अद्भुत ।

जैन सनी का जानवरों के प्रति प्रेम बहुत है। उनका कहना है कि जानवर अपने मन की व्यथा जाहिर नही कर सकते है। उनके भूख-प्यास को अपना समझ वह निरंतर इस कार्य में लगे हुए है। वह कहते है कि गर्मियों के मौसम में जानवरों के लिए आसानी से पानी उपलब्ध नही होता । इसलिए उनका यह अभियान पशुओं की सेवा के लिए ही है।

अभियान की शुरुआत कैसे हुई ।

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लगभग सात साल पहले एक दिन एक कुत्ते के बच्चे का जैन सनी के गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया। वह उसे लेकर अस्पताल भी गए लेकिन उसकी जान नहीं बच पाई। इस दुर्घटना से वह अंदर तक हिला गए और वह तीन-चार महीने तक इसे सदमे में ही थे, वह हमेशा सोचते रहते थे कि यह क्या हो गया उनसे ? फिर एक दिन काम पर जाते समय उन्होंने देखा कि एक कुत्ता गटर में से पानी पी रहा है। उस दृश्य को देखकर उन्होंने ठान लिया कि वह इन बेजुबानों के लिए कुछ करेंगे।
उन्होंने सबसे पहले शुरुआत अपने घर से की और एक छोटा-सा मिट्टी का बर्तन पानी से भरकर घर के बाहर रखने लगे। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने आस-पड़ोस के घरों में जा-जाकर बर्तन बाँटना शुरू किया और उनसे अनुरोध किया कि वे भी बेजुबानों के लिए पानी भरकर रखें। देखते ही देखते उनकी यह ड्राइव सोशल मीडिया पर भी पहुँच गयी और ज्यादा से ज्यादा लोग उनसे जुड़ने लगे।

लोग अभियान में मदद भी करते है।

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उनकी टीम इलाके के हिसाब से पानी के लिए बर्तन बांटती है। उनके पास दो तरह के बर्तन हैं – एक बड़ा, जो वह ज्यादातर जंगल वाले इलाके में रखते हैं क्योंकि वहाँ हाथी, हिरण, गधा जैसे जानवर भी पानी पीते हैं। वहीं छोटा बर्तन रिहायशी इलाकों में रखते हैं, जहाँ कुत्ते, बिल्ली, बकरी आदि पानी पीते हैं। इन बर्तनों को मुफ्त में बाटंने के लिए अभियान से जुड़े कुछ लोग और कुछ दानकर्ता आर्थिक मदद करते हैं।

सभी लोगों को जैन सनी से सीखने की जरूरत है । उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है । हमें भी बेजुबानों की सेवा करनी चाहिए। प्रकृति के वह भी एक अभिन्न अंग है।

 

 

Social Heroes :कुत्ते को गटर से पानी पीता देख शुरू की पहल, अब तक बाँट चुके हैं 25,000 पानी के बर्तन Read More »