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आसानी से आदते बदलो | How to Change Bad Habits ? – Hindi

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गलत आदतों से छुटकारा पाना बहुत मुश्क़िल काम होता है।चाहे सिगरेट छोड़ना हो, सोशल मीडिया की लत से बाहर आना हो या जंक फूड खाने की दीवानगी से छुटकारा पाना ।किसी भी आदत को छोड़ना किसी चुनौती से कम नहीं होता।

आदत दिमाग की उपज होती है।

आदत हमारे दिमाग़ की उपज होती है, इसलिए इससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्क़िल होता है। इसके लिए हमें अपने दिमाग़ के साथ जद्दोज़ेहद करनी पड़ती है। यह कहना ग़लत न होगा कि आदत बनाना आसान होता है, लेकिन उसे बदलना बेहद कठिन। इसलिए अपनी आदत को बदलने की बजाय बेहतर होगा कि कोई नई मगर अच्छी आदत डाले। ताकि पुरानी आदत की ओर से ध्यान हट जाए । आज हम आपको कहानी के माध्यम से बताएंगे की बुरी आदतों को कैसे बदला जाए ।

कहानी इस प्रकार है ।

एक बार की बात है एक पिता अपने पुत्र की आदतों से बहुत परेशान था। उसे समझाया करते थे कि बेटा तुम्हारी आदत से मैं बहुत परेशान हूं। अब तुम बड़े हो गए हो प्लीज अपनी आदत को सुधार लो,लेकिन बेटा हमेशा बोलता गया अभी तो मैं छोटा हूं
जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं इस आदत को सुधार लूंगा। लेकिन, तभी गांव में एक विख्यात महात्मा आए हुए थे। इस परेशान पिता को उनकी ख्याति के बारे में पता चला तो वे उनके चरणों में चले गए। महात्मा ने कहा कि आप मुझे कल शाम को बगीचे में मिलो और साथ में अपने पुत्र को भी लेकर के आओ उसने ऐसा ही किया। जब शाम को बगीचे में पुत्र के साथ पिता भी आए तो, पुत्र ने महात्मा जी को नमन किया और महात्मा जी ने कहा आओ बालक मेरे साथ चलो। चलते चलते एक छोटा सा पौधा महात्मा जी को दिखाई दिया। उन्होंने बालक से कहा कि बालक तुम इस पौधे को उखाड़ सकते हो बच्चे ने कहा बिल्कुल।
इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। बालक ने फटाफट पौधे को उखाड़ दिया महात्मा जी आगे बढ़े
अबकी बार पौधा थोड़ा बड़ा था। लेकिन महात्मा जी ने कहा क्या तुम इस पौधे को भी उखाड़ सकते हो? बच्चे के अंदर जोश था बिल्कुल मैं इसको उखाड़ सकता हूं थोड़ी मेहनत उसको लगी। लेकिन अंततः पौधा उखाड़ दिया। अब महात्मा जी ने उसको एक गुड़हल का पेड़ दिखाया और कहा कि इसे उखाड़ कर दिखाओ। तब मैं मान लूंगा कि वाकई में तुममे बहुत ताकत है। बच्चा कोशिश करने लगा
तने को बार-बार हिलाने लगा लेकिन बार-बार विफल हो रहा था। उसने कोशिश की लेकिन अंतत असफलता उसके हाथ लगी। महात्मा जी ने कहा कि कुछ आपके समझ में आया?
बच्चा बोला नहीं। महात्मा ने कहा ठीक ऐसा ही हमारी आदतों के साथ है। अगर शुरू में हम आदतों को तोड़ना चाहे। ठीक पौधों की तरह तोड़ सकते हैं। क्यों की शुरू में आदतें इतनी मजबूत नहीं होती है।
लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है और हम आदतों को नहीं बदलते हैं। आदतें इस विशाल वृक्ष की ताकत के बराबर मजबूत हो जाती है और अंततः उनको बदलना बहुत ही मुश्किल काम है। हालांकि नामुमकिन नहीं है लेकिन बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुल मिलाकर आप अपनी आदतों को बदलना चाहते हो तो शुरुआत में ही सतर्क रहें। इससे मेहनत भी कम लगेगी और आप अपनी आदतों पर लगाम भी लगा पाएंगे। चाहे किसी भी प्रकार की आदत को आप बदलना चाहे बस शुरू में आप सतर्क रहें।

इस तरह इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है कि हम अगर चाहे तो अपनी बुरी आदतों को हमेशा के लिए छोड़ सकते है बस हमें कोशिश करने की आवश्यकता है।

 

 

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ये कहानियाँ आपको सफल बना सकती है || 3 Best Motivational Story Hindi

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प्रेणादायक कहानियां जो आपकी ज़िन्दगी बदल देती है। अगर जिंदगी में कुछ पाना हो, करना हो उन सभी के लिए प्रेरक प्रसंग बहुत की उपयोगी सिद्ध होते है। यह हमे Motivate करते है, क्योंकि जब तक हमारे जीवन में कोई प्रेरक प्रसंग नही होगा, तब तक हम आगे बढ़ नही सकते और ना ही सफल हो सकते है। कई लोगो में सेल्फ मोटिवेशन होता है। आज हम 3 प्रेणादायक कहानियां आपको बताएंगे जिसको पढ़ के आपको ज़िंदगी में सफल होने की सिख मिलेगी।

1. हार कर खुद से जीता ।

हरीश नाम का एक लड़का था उसको दौड़ने का बहुत शौक था
वह कई मैराथन में हिस्सा ले चुका था ।परंतु वह किसी भी दौड़ को पूरा नही करता था ।एक दिन उसने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाये वह दौड़ पूरा जरूर करेगा। अब रेस शुरू हुई ।हरीश ने भी दौड़ना शुरू किया धीरे 2
सारे धावक आगे निकल रहे थे
मगर अब हरीश थक गया था
वह रुक गया फिर उसने खुद से बोला अगर मैं दौड़ नही सकता तो कम से कम चल तो सकता हूं।
उसने ऐसा ही किया वह धीरे-धीरे
चलने लगा मगर वह आगे जरूर बढ़ रहा था ।अब वह बहुत ज्यादा थक गया था और नीचे गिर पड़ा
उसने खुद को बोला की वह कैसे भी करके आज दौड़ को पूरी जरूर करेगा वह जिद करके वापस उठा लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ने लगा और अंततः वह रेस पूरी कर गया । माना कि वह रेस हार चुका था लेकिन आज उसका विश्वास चरम पर था क्योंकि आज से पहले वह दौड़ को कभी पूरा ही नही कर पाया था वह जमीन पर पड़ा हुआ था क्योंकि उसके पैरों की मांसपेशियों में बहुत खिंचाव हो चुका था । लेकिन आज वह बहुत खुश था
क्योंकि आज वह हार कर भी जीता था । हरीश की कहानी से हमे यही सीखने को मिलता है कि अगर हम लगातार आगे बढ़ते रहे तो एक दिन हम हारकर भी जीत
जाएंगे ।

2.परिस्थितियों को दोष देना ।

कुछ समय पहले की बात है।
एक आदमी रेगिस्तान में फंस गया था । वह मन ही मन अपने आप को बोल रहा था कि यह कितनी अच्छी और सुंदर जगह है
अगर यहां पर पानी होता तो यहां पर कितने अच्छे-अच्छे पेड़ उग रहे होते । और यहां पर कितने लोग घूमने आना चाहते होंगे
मतलब वह आरोप कर रहा था
कि यह होता तो वो होता और वो होता तो शायद ऐसा होता । ऊपरवाला देख रहा था अब उस इंसान ने सोचा यहां पर पानी नहीं दिख रहा है । उसको थोड़ी देर आगे जाने के बाद उसको एक कुआं दिखाई दिया जो कि
पानी से लबालब भरा हुआ था । वह खुद से काफी देर तक विचार-विमर्श करता रहा ।
फिर बाद में उसको वहां पर एक रस्सी और बाल्टी दिखाई दी इसके बाद कहीं से
एक पर्ची उड़ के आती है जिस पर्ची में लिखा हुआ था कि तुमने कहा था कि यहां पर पानी का कोई श्रोत नहीं है अब तुम्हारे पास पानी का स्रोत भी है
अगर तुम चाहते हो तो यहां पौधे लगा सकते हो
पर वह इंसान वहाँ से बिना पेड़ लगाए चला गया।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कुछ लोग सिर्फ परिस्थिति को दोष देना जानते हैं अगर उनके पास उपयुक्त स्रोत हो तो वह परिस्थिति को नहीं बदल सकते
सिर्फ वह आरोप करना जानते हैं लेकिन हमे ऐसा नहीं बनना है
यह कहानी हमें यह बताती है कि
अगर आप चाहते हो कि
परिस्थितियां बदले और आपको अगर उसके लिए उपयुक्त साधन मिल जाए तो आप अपना एक परसेंट योगदान तो दे ही सकते हैं।

3. ईमानदारी का फल ।

काफी समय पहले की बात है प्रतापगढ़ नाम का एक राज्य था वहाँ का राजा बहुत अच्छा था
मगर राजा को एक सुख नही था
वह यह कि उसके कोई भी संतान नही थी । वह चाहता था कि अब वह राज्य के अंदर किसी योग्य बच्चे को गोद ले ताकि वह उसका उत्तराधिकारी बन सके और आगे की बागडोर को सुचारू रूप से चला सके ।और इसी को देखते हुए राजा ने राज्य में घोषणा करवा दी की सभी बच्चे राजमहल में एकत्रित हो जाये ।
ऐसा ही हुआ राजा ने सभी बच्चो को पौधे लगाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के बीज दिए और कहा कि अब हम 6 महीने बाद मिलेंगे और देखेंगे कि किसका पौधा सबसे अच्छा होगा । महीना बीत जाने के बाद भी एक बच्चा ऐसा था जिसके गमले में वह बीज अभी तक नही फूटा था
लेकिन वह रोज उसकी देखभाल करता था और रोज पौधे को पानी देता था। देखते ही देखते 3 महीने बीत गए बच्चा परेशान हो गया । तभी उसकी माँ ने कहा कि बेटा धैर्य रखो कुछ बीजो को फलने में ज्यादा वक्त लगता है
और वह पौधे को सींचता रहा
6 महीने हो गए राजा के पास जाने का समय आ चुका था ।
लेकिन वह डर हुआ था कि सभी बच्चो के गमलो में तो पौधे होंगे और उसका गमला खाली होगा
लेकिन वह बच्चा ईमानदार था ।
सारे बच्चे राजमहल में दोबारा एकत्रित हुए। कुछ बच्चे जोश से भरे हुए थे क्योंकि उनके अंदर राज्य का उत्तराधिकारी बनने की प्रबल लालसा थी । अब राजा ने आदेश दिया सभी बच्चे अपने अपने गमले दिखाने लगे
मगर एक बच्चा सहमा हुआ था क्योंकि उसका गमला खाली था
तभी राजा की नजर उस गमले पर गयी उसने पूछा तुम्हारा गमला तो खाली है । तो उसने कहा लेकिन मैंने इस गमले की 6 महीने तक देखभाल की है । राजा उसकी ईमानदारी से खुश था कि उसका गमला खाली है फिर भी वह हिम्मत करके यहाँ आ तो गया । सभी बच्चों के गमले देखने के बाद राजा ने उस बच्चे को सभी के सामने बुलाया बच्चा सहम गया। और राजा ने वह गमला सभी को दिखाया
सभी बच्चे जोर से हसने लगे
राजा ने कहा शांत हो जाइये ।
इतने खुश मत होइए आप सभी के पास जो पौधे है वो सब बंजर है आप चाहे कितनी भी मेहनत कर ले उनसे कुछ नही निकलेगा
लेकिन असली बीज यही था
राजा उसकी ईमानदारी से बेहद खुश हुआ।
और उस बच्चे को राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया गया ।
इस कहानी से हमें यह सीखने को मिला की अपने अंदर ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है । अगर हम खुद के साथ ईमानदार है तो जीवन के किसी न किसी पड़ाव में सफल हो ही जाएंगे ।

आशा है इस प्रेरणादायक कहानियों को पढ़ कर आप अपने जीवन मे इसे लागू करने का प्रयत्न भी करेंगे।

 

 

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सफल होने के लिए काम मे डूब जाओ ! Dedication On Your Passion or Goals

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जीवन में हर व्यक्ति अपने सपनों को पूरा कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना चाहता है। इस दौड़ में कुछ लोग सफलता हासिल कर आगे निकल जाते हैं तो कुछ को असफलता का मुंह देखना पड़ता है। असफलता का स्वाद चखने वाले ज्यादातर लोग अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोष देते है, लेकिन वास्तव में उनकी असफलता के लिए उनके ही द्वारा की गई कुछ गलतियां जिम्मेदार होती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं सफलता हासिल करने के आसान मंत्र, जो हर व्यक्ति को सफलता हासिल करने में मदद करते हैं।

हमेशा बड़ा सोच रखें।

ज्यादातर लोग अपना लक्ष्य बहुत ही छोटा रखते हैं और उसे प्राप्त कर खुश हो जाते हैं जबकि कुछ लोग बहुत बड़ा लक्ष्य पाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन हासिल नहीं कर पाते। इसलिये आप अपना लक्ष्य काफी सोच समझ कर तय करें और बड़ा सोचें।जब आप अपना लक्ष्य बड़ा रखेंगे तो उसे पूरा करने में भी मजा आएगा । यही लक्ष्य जब पूरा हो जाएगा तो आप दिन-रात तरक्की करेंगे ।

स्वयं पर भरोसा रखें ।

खुद पर विस्वास ऐसी मनोभावना है, जो आपके हर एक काम में आपका पहला साथी होता है । जब भी आप कोई काम शुरु करते है तो उसमे जी तोड़ मेनहत करने से पहले आपको अपने आप पर भरोसा होना चाहिए तभी वह काम आपका सफल होगा । यदि आपके अंदर ऐसा विस्वास है की आप जो काम शुरु करने जा रहे है उसको उसके अंजाम तक पंहुचा सकते है, तो आपको उस काम में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है । यदि आपको अपने आप पर भरोसा नहीं होगा तो आप ठीक उसी प्रकार हो जाएंगे जो अपने योग्ता पर काम और दूसरे की सलाह पर ज्यादा भरोसा करता है। आपको दूसरे के सलाह से ज्यादा अपने आप पर भरोसा होना चाहिए ।

अपने काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करें।

आपके द्वारा किया गया हर एक काम और आपके मिला हर एक मौका एक चुनौती की तरह होता है । ज़िंदगी में जो लोग इस बात को समझ कर अपना काम कर रहे है ।उनके सफल होने का मौका दूसरे के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है । चुनौती मन और शरीर को मंजिल की दिशा में साधकर उसको वहाँ पर अपना ध्यान केंद्रित करने में मदद करती है ।जो लोग चुनौती का सामना करने से घबराते है। सफलता भी उनसे बहुत कोसो दूर रहती है। इसलिए ज़िंदगी में सफल होने के लिए कभी भी किसी भी चुनौती से घबराना नहीं चहिए ।बल्कि उसको डटकर सामना करना चाहिए ।

अपने डर को दूर भागए ।

जब भी आप किसी नए काम को करने के लिए जाये तो उससे थोड़ा भी डरे ना क्योकि अगर आप उस से डर गए तो समझ लो की आप मर गए । बहुत से लोग ऐसे है जो भय के कारण अपने काम को पूरा ही नहीं करते है । ऐसा लोगो के साथ आत्मविस्वास की कमी के कारण होता है।
किसी भी काम को करने से पहले ही ये ना सोचे की आप इस काम में हार जाएंगे। बस अपना बढ़िया प्रयास करे, खुद पर विस्वास रखें, और बिना डरे उस काम की शुरुवात करे। आपको सफलता जरूर मिलेगी। जिंन्दगी में छोटे से लेकर बड़ा हर कोई सफल होना चाहता है । लेकिन लाइफ में सफलता उसको ही मिलती है जो अपने कमजोरी को अपनी ताकत बनाता है ।और किसी भी काम में अपना हार नहीं मनाता है ।

अच्छे दोस्त बनाएं।

आपके आस-पास के लोग ,आपका परिवेश ,आपके मित्रों का भी जीवन में बड़ा योगदान होता है। इसलिए सफलता हासिल के लिए अच्छे दोस्त बनाएं । अच्छे लोगों से मिले । आपके आत्मविश्वास को बढ़ाने वाले कहानी भी पढ़ें । इस तमाम चीजों को अपने जीवन में अपनाकर आप जल्द से जल्द सफल हो सकेंगे।

 

 

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स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekananda Biography In Hindi

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स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे।
इनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवीजी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान् शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था।
नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहाँ उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तव्य के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत ” मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों ” के साथ करने के लिए जाना जाता है । उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

अतिथि सेवा और गुरु सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते थे।

दैवयोग से उनके पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दर्रिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते। स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की चिंता किये बिना, स्वयं के भोजन की चिंता किये बिना वे गुरु-सेवा में सतत संलग्न रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। परमहंस जी की कृपा से इन्हें आत्म-साक्षात्कार हुआ जिसके फलस्वरूप कुछ समय बाद वह परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए ।

युवाओं के लिए मार्गदर्शक स्वामी विवेकानंद।

स्वामी विवेकानंद सदा खुद को गरीबों का सेवक मानते थे । भारत के गौरव को देश दुनियां तक पहुंचाने के लिए वह सदा प्रयत्नशील रहते थे।। 4 जुलाई, सन्‌ 1902 को उन्होंने अलौकिक रूप से अपना देह त्याग किया। बेल्लूर मठ में अपने गुरु भाई स्वामी प्रेमानंद को मठ के भविष्य के बारे में निर्देश देकर रात में ही उन्होंने जीवन की अंतिम सांसें लीं। “उठो जागो और तब तक ना रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए” स्वामी विवेकानंद के यही आदर्श आध्यात्मिक हस्ती होने के बावजूद युवाओं के लिए एक बेहतरीन प्रेरणास्त्रोत साबित करते हैं .आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो केवल उनके सिद्धांतों को ही अपना मार्गदर्शक मानते हैं।

 

 

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विलियम शेक्सपियर का जीवन परिचय | William Shakespeare Biography In Hindi

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विलियम शेक्सपियर जीवन परिचय | William Shakespeare Biography In Hindi

बिंदु (Points) जानकारी (Information)
नाम (Name) विलियम शेक्सपियर
जन्म (Date of Birth) 1564
आयु 70 वर्ष
जन्म स्थान (Birth Place) स्ट्रैटफ़ोर्ड-ऑन-एवन, यूनाइटेड किंगडम
पिता का नाम (Father Name) जॉन शेक्सपिय
माता का नाम (Mother Name) मैरी आर्डेन
पत्नी का नाम (Wife Name) ऐनी हैथवे
पेशा (Occupation ) कवि, नाटककार
बच्चे (Children) 3
मृत्यु (Death) 23 अप्रैल 1616
मृत्यु स्थान (Death Place) स्ट्रैटफ़ोर्ड-ऑन-एवन, यूनाइटेड किंगडम
भाई-बहन (Siblings) 9
अवार्ड (Award) विशिष्ट सेवा पदक

 

विलियम शेक्सपीयर इंग्लिश कवी, नाटककार और अभिनेता थे जो इंग्लिश भाषा के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध लेखको में से एक थे। उन्हें इंग्लैंड का राष्ट्रिय कवी और “बार्ड ऑफ़ एवन” भी कहा जाता है। उनके महानतम कार्यो में 38 नाटक, 154 चतुर्दश पदि कविता, 2 लंबी विवरणात्मक कविताये, और बहोत से छंद और लेखन कार्य शामिल है। उनके नाटको को कई भाषाओ में रूपांतरित किया गया था और बहोत से नाटककारों ने उनके नाटकों का प्रदर्शन भी किया था।

विलियम शेक्सपीयर का परिचय।

शेक्सपीयर का जन्म एवन के ऊपर स्ट्रेटफोर्ड में हुआ था। 18 साल की उम्र में उन्होंने ऐनी हैथवे से शादी कर ली। बाद में उनके तीन बच्चे भी हुए, सुसान और जुड़वाँ हम्नेट और जूडिथ। 1585-1592 के समय में उन्होंने लंदन में एक अभिनेता, लेखक और एक नाटक कंपनी लॉर्ड चेम्बर्लेन मेन के सह-मालक बनकर अपने करियर की शुरुवात की। 1613 में 49 साल की आयु में वे स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर्ड हो गये थे और वही तक़रीबन 3 साल बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी।

आर्थिक स्थिति खराब के कारण पढ़ाई छोड़ी।

उन्होने अपनी स्कूली शिक्षा एक स्थानीय स्कूल स्ट्रेटफोर्ड ग्रामर स्कूल से की थी। अपनी पिता की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों के कारण उन्हें पढाई छोड़कर छोटे मोटे धंधों में लग जाना पड़ा। इसके बाद उन्होने जीविका की तलाश में 1587 में लन्दन चले गये, लंदन मे उन्होंने एक रंगशाला में किसी छोटी नौकरी पर काम किया। किंतु कुछ दिनों के बाद वे लार्ड चेंबरलेन की कंपनी के सदस्य बन गए और लंदन की प्रमुख रंगशालाओं में समय समय पर अभिनय में भाग लेने लगे। जहा वो एक अभिनेता और नाटककार बने।

उन्होंने दुखांत नाटक का समावेश किया ।

1608 तक उन्होंने दुखांत नाटक लिखे, जिनमे हैमलेट, ऑथेलो, किंग लेअर और मैकबेथ भी शामिल है। अपने अंतिम समय में उन्होंने दुःख सुखान्तक नाटको का लेखन किया था। जिनमे कुछ रोमांचक नाटक भी शामिल है। अंतिम नाटकों में शेक्सपियर का परिपक्व जीवनदर्शन मिलता है। महाकवि को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए थे जिनकी झलक उनकी कृतियों में दिखाई पड़ती है।

रोमांस के साथ कॉमेडी भी ।

शेक्सपियर के नाटकों में रोमांस के साथ- साथ कॉमेडी भी होती थी। उन्होंने कॉमेडी वाले भी बहुत से नाटक प्रस्तुत किये लोगों ने उसे बहुत पसंद भी किया ।इसके बाद के वर्षों में इन्होंने ट्रेजेडी की शैली को भी छुआ ।उनके चरित्र- प्रतिनिधत्व में शेक्सपियर ने मानव व्यवहार और कार्यों को भी प्रस्तुत किया ।

विलियम शेक्सपियर की मृत्यु ।

सन 1613 में शेक्सपियर स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर हो गए । विलियम शेक्सपियर की अपने जन्मदिन के 3 दिन पहले यानि 23 अप्रैल सन 1616 में मृत्यु हो गई । शेक्सपियर की याद में दुनिया भर में कई मूर्तियाँ, स्मारकें स्थापित किये गये है। जो कि इस महान कवि और नाटककार के लिए लोगों आपार प्रेम को दर्शाता है ।

 

 

 

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सिकंदर वही होता है, जो दुखो से लड़ता है – Auto Driver Deshraj की कहानी !

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ये कहानी एक बुज़ुर्ग ऑटो ड्राइवर ( Auto Driver Deshraj) की है। जिनका नाम देशराज है और उम्र 74 साल है। उनके दोनों बेटों की मौत हो चुकी है, ऐसे में  वो अकेले ही अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे है , इनके परिवार मे सात सदस्य है, जिनमे से पोते-पोतियों पढ़ाई का जिम्मा भी उनके ऊपर ही है।

6 साल पहले उनका बड़ा बेटा हमेशा की तरह काम पर निकला था। लेकिन घर वापस नहीं लौटा। करीब एक सप्ताह बाद उसका शव एक ऑटो में मिला! वो कहते है बड़े बेटे को खोने का ग़म ऐसा था जैसे मेरा एक हिस्सा मर गया हो !  वो बस 40 साल का था ! बड़े बेटे को खोने का गम भी वो ज्यादा दिन तक नहीं मना पाए क्योंकि आर्थिक परिस्थिति इसकी अनुमति नहीं दे रही थी। इसलिए, दूसरे ही दिन से वह ऑटो चलाने लगे।

ये दुःख का पहाड़ फिर २ साल बाद टुटा जब उनके छोटे बेटे ने आत्महत्या कर ली ! उम्र के उस दौर में जब एक पिता को सहारा चाहिए होता है तब दो -दो जवान बेटे को खोने का दर्द किसी भी पिता को इतना खोखला कर देता है कि शायद वह अपने पैरों पर भी न खड़े हो पाए। लेकिन देशराज के पास तो अब जिम्मेदारी और दोगुनी बढ़ गई थी। परिवार में अब पत्नी, दो बहुएं और चार पोता पोती ही रह गए थे। जिनका पालन पोषण अब उन्हें है देखना था।

वो कहते है कि छोटे बेटे के दाह संस्कार के बाद उनकी पोती जो 9वी  कक्षा में थी, उसने पूछा , दादाजी, क्या अब मेरा स्कूल छूट जायगा ?, मैंने अपनी सारी हिम्म्त जुटाई और उससे कहा ” नहीं बेटी , तुम जितना पढ़ना चाहो उतना पढ़ो ! देशराज ने मीडिया से बातचीत में बताया कि पोते पोतियों की पढ़ाई न छूटे इसलिए उन्होंने सुबह 6 बजे से देर रात तक ऑटो चलाना शुरू किया।

इतना करने के बाद भी महीने में बस वो 10,000 तक ही कमा पाते है, जिसमें  से 6 हजार पोते पोतियों की पढ़ाई और बाकी के 4 हज़ार में सात लोगों के खाने का इंतज़ाम होता है। कई दिन ऐसे भी बीते जब परिवार के पास कुछ खाने को नहीं होता था। बीच में पत्नी के बीमार हो जाने के कारण इधर उधर से दवाइयों के लिए पैसे भी लेने पड़े।

मगर जब 10 वीं में उनकी पोती ने 80% नंबर से बोर्ड एग्जाम पास किया तो उन्हें लगा जैसे वो अपन ऑटो आसमान में उड़ा रहे है और इस खुशी के सामने सारे गम फीके पड़ गए। उस दिन देशराज ने पूरे दिन लोगों को फ्री में अपने ऑटो में बैठाया।

देशराज जी से जब पोती ने बीएड की पढ़ाई करने के लिए दिल्ली जाने को कहा तो वो जानते थे कि ऐसा करने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। लेकिन अपनी पोती को पढ़ाने के लिए उन्होंने घर बेच दिया। पोती को दिल्ली भेजा और बाकी के परिवार के सदस्यों को रिश्तेदारों के घर। अब खुद का घर नहीं बचा तो देशराज ऑटो में सोने लगे। वह अब ऑटो में ही खाते है और सोते हैं।

मीडिया से उन्होंने बताया कि “शुरुआत में थोड़ी दिक्कत होती थी, पांव में दर्द भी होता था लेकिन अब आदत हो गई है। जब बेटी फोन पर बताती है कि वह क्लास में फर्स्ट आई है तो ये दर्द भी महसूस नहीं होता है।”
देशराज अब उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब उनकी बेटी ग्रैजुएट होकर टीचर बन जाएगी। उन्होंने फैसला किया है उस दिन के बाद से वह एक हफ्ते के लिए अपने ऑटो का किराया फ्री कर देंगे क्योकि वो उनके परिवार की पहले ग्रैजुएट होने जा रही है  और उन्हें उस पर गर्व है !

इस कहानी को मीडिया के कवर करने के बाद कई लोग मदद के लिए आगे आए हैं। अगर आप भी उनकी मदद करना चाहते है , तो निचे दिए गए एड्रेस और फोन नो पर कांटेक्ट कर सकते है ! .

खार डंडा नाका, मुंबई गाड़ी नंबर 160 में रहने वाले देशराज को आप इस नंबर पर 8657681857 संपर्क कर सकते हैं।

Moral:: 

जीवन में दुःख सुख का आना जाना लगा रहता है, मगर सिकंदर वही होता है जो उन दुखो से लड़ता है , कभी हार नहीं मानता , हमेशा आगे बढ़ने का लक्ष्य रखता है !

 

सिकंदर वही होता है, जो दुखो से लड़ता है – Auto Driver Deshraj की कहानी ! Read More »