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Success Story Of IAS Kuldeep Dwivedi: सिक्योरिटी गार्ड के बेटे ने हिंदी मीडियम से पढ़कर, ऐसे क्रैक किया UPSC

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मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं,

जिनके सपनों में जान होती है ,

सिर्फ पंख होने से कुछ नहीं होता,

हौसलों से ही उड़ान होती है |

 

ऐसे ही जानदार सपने और मजबूत हौसले रखने वाले कुलदीप द्विवेदी की सच्ची कहानी लेकर आये है जिन्होंने अपने जीवन में सफलता के मार्ग में आयी हज़ारो उलझनों के बावजूद कभी हार नहीं मानी सबके लिए मिसाल पेश की है |

पिता थे सिक्योरिटी गार्ड

कुलदीप का जन्म उत्तर प्रदेश में निगोह के एक छोटे से शेखपुर नाम के गांव में बेहद आम परिवार में हुआ | कुलदीप द्विवेदी के पिताजी श्री सूर्यकांत द्विवेदी लखनऊ विश्वविद्यालय में बतौर सुरक्षा गार्ड  काम करते थे। छ: सदस्यों का यह परिवार एक ही कमरे के घर में रहता था और पिता की कमाई जो कि सिर्फ 6000 रुपये महीना थी, उसमे जैसे-तैसे घर का खर्च चलता था| कुलदीप के पिता श्री सूर्यकांत 12वीं पास थे और मां मंजु भी ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी परन्तु उन्होंने अपने बच्चे की पढ़ाई में कभी कोई कमी नहीं रखी | अपनी इच्छाओं को दबाकर उन्होंने कुलदीप को स्कूल भेजा. बेटे ने कभी उनको निराश नहीं किया और खूब मन लगाकर पढ़ाई की.कुलदीप की बहन के अनुसार कुलदीप अपने दूसरे सगे संबंधियों को देखकर अंग्रेजी मीडियम में पढ़ना चाहते थे   परंतु पिता की आय काफी कम होने की वजह  से वह गांव के ही एक सरकारी स्कूल में पढ़ने को मजबूर हो गए थे।

कुलदीप  ने कम उम्र से ही आईएएस बनने का सपना देखना शुरू कर दिया था। जब वह सातवीं कक्षा में थे तब से ही उन्होंने यह ठाना था। भले ही एमए तक की पढ़ाई कुलदीप ने हिंदी मीडियम से की, मगर वो हमेशा दूसरों से एक कदम आगे ही रहे |

UPSC के लिए छोड़ दी नौकरी

कुलदीप द्विवेदी ने हिंदी और भूगोल में वर्ष 2009 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और फिर वर्ष 2011 में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी कर ली थी। इस के बाद कुलदीप ने तय किया कि वह खुद को यूपीएससी के लिए तैयार कर करेंगे, तभी से ही वह दिल्ली में आकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे थे। यहां दिल्ली में उन्होंने एक किराये का कमरा लिया और अपनी परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उनके पास सीमित पैसे होते थे जिनमे वह पढ़ने के लिए पर्याप्त किताबें खरीदने में भी असमर्थ थे तो ऐसे में कई बार उन्होंने दोस्तों की मदद ली और उनकी किताबें उधार लेकर अपनी पढ़ाई की | घर के हालात को देखते हुए कुलदीप अन्य सरकारी नौकरी की भी परीक्षाएं देते रहते थे | साल 2013 में उनका चयन BSF में बतौर असिस्टेंट कमांडेंट हो गया  लेकिन आईएएस बनने के जुनून के चलते उन्होंने नौकरी नहीं की |

2015 में बन गए IRS

बहुत कठिन प्रयासों के बावजूद कुलदीप अपने पहले दो प्रयासों में सफल नहीं हो सके थे, पहली बार प्रीलिम्स नहीं निकला. दूसरी प्री निकला लेकिन मेन्स में सफल नहीं हुए | कुलदीप शुरू से बहुत आशावादी रहे है और आशावादी व्यक्ति हर आपदा में एक अवसर देखता है तो उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी और बहुत ही साहस के साथ निरंतर मेहनत करते रहे  जिस तरह वृक्ष कभी भी इस बात पर व्यथित नहीं होता कि उसने कितने पुष्प खो दिए; वह सदैव नए फूलों के सृजन में व्यस्त रहता है अंतत: उनकी मेहनत रंग लाई और 2015 में 242 वीं रैंक के साथ वो यूपीएससी क्रैक करने में सफल रहे और फिर आगे इंडियन रेवेन्यू सर्विसेस (IRS)को उन्होंने अपना करियर बनाया | बताया जाता है कि जब कुलदीप के सफलता की खबर उनके पिता के पास पहुंची, तो वह समझ नहीं पाए क्या हुआ है. उन्हें यह समझाने में काफी समय लगा कि उनका बेटा कुलदीप अधिकारी बन चुका है |

कुलदीप ने अपनी मेहनत से दुनिया को बता दिया कि मेहनत करने वालों की हार नहीं होती | संघर्ष इंसान को मजबूत बनाता है फिर चाहे वह  कितना भी कमजोर क्यों ना हो और कम से कम संसाधन के साथ भी लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है |

जीवन में कितना कुछ खो गया, इस पीड़ा को भूल कर, क्या नया कर सकते हैं, इसी में जीवन की सार्थकता है | अंत में आप सभी के लिए एक ही संदेश है –

 

हजारों उलझनें राहों में,

और कोशिशें बेहिसाब;

इसी का नाम है ज़िन्दगी,

चलते रहिये जनाब ।

 

 

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कैसे बनें

How to Succeed in Life – Hindi | जीवन में सफलता कैसे प्राप्त करें !

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जिंदगी को दिशा देने के लिए मकसद का होना उतना ही जरूरी है, जितना शरीर के लिए आक्सीजन का। इसलिए हमें मकसद खोजते रहना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि आप यात्रा कर रहे हैं और आपके बगल वाली सीट पर बैठा यात्री आपसे सवाल करता है, ‘आप कहां जा रहे हैं और आपके पास इस सवाल का जवाब न हो तो बड़ा अजीब होगा ना ? लेकिन ऐसा नहीं है। यदि आपको पता है आप कहां और क्यों जा रहे है तो आप जवाब दे देंगे। इसी तरह पता कीजिए कि आप अपने जीवन में किस दिशा में जा रहे हैं। अपने जीवन को हमेशा सही दिशा में ले जाने के लिए एक अच्छे योजना के साथ मकसद का होना बहुत ही जरूरी है। आज हम आपको इस यह बताएंगे कि आप अपने ज़िंदगी में एक अच्छे योजना के साथ अच्छे कैसे बन सकते है और ज़िंदगी में सफलता कैसे अर्जित कर सकते है।

मानसिक ऊर्जा बढ़ाएं।

अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सबसे जरूरी है अपने मन को शांत रखना। मन को कभी विचलित नही होने दे। हमेशा शांत रह कर लक्ष्य के पीछे अग्रसर रहे। उन पर एक महीने तक चलें। इन्हें अपनी आदत में शुमार होने दें। किसी एक बड़ी सफलता से ज्यादा अधिक मानसिक बल छोटी-छोटी कई सफलताओं से मिलता है।

जानकारी को बढ़ाते रहें।

ज्ञान और कौशल ऐसे हथियार हैं जो कमाई के साथ करियर के लक्ष्यों को हासिल करने में मदद करते हैं ।इसलिए अपने ज्ञान को लगातार बढ़ाते रहना चाहिए ।इस काम को प्राथमिकता के साथ करना चाहिए।।ऐसा करने के लिए पहले आपको तैयार होना पड़ेगा । आलोचना होने पर उसे स्वीकार करना होगा। पर आलोचना से आपको घबराना भी नही है। साथ ही हर एक मिलने वाले व्यक्ति से कुछ सीखने की कोशिश करनी होगी । रोजाना पढ़ने की आदत विकसित करें। हर दिन अपने काम की समीक्षा भी करना पड़ेगा।

सही खान-पान और नियमित व्यायाम जरूरी।

किसी भी काम को पूरा करने में ऊर्जा की जरूरत होती है। इसलिए आपके पास जितनी अधिक ऊर्जा होगी, उतना ही काम आप कर सकेंगे। सही खान-पान और नियमित रूप से व्यायाम करके ऊर्जा के स्तर को बढ़ाएं ।परिवार, दोस्तों से अच्छा बर्ताव रखें। इससे आप अपनी भावनात्मक ऊर्जा को बढ़ा सकेंगे।

सवाल पूछने में न हिचकिचाएं ।

दूसरों के साथ बातचीत करने में झिझक होती है तो इस पर काम करना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कम बोलते हैं या बहुत बातूनी हैं । जब आप कोई बात नहीं समझ पाते हैं तो सवाल जरूर करें । मार्गदर्शन के लिए किसी का भी धन्यवाद करना नहीं भूलें ।अपने काम को बेचने का हुनर आपको आना चाहिए। जब कोई आपसे बात करे तो उसकी बात धैर्यपूर्वक सुननी चाहिए ।

सही दिशा में काम करें ।

अगर आपने कड़ी मेहनत करने का फैसला कर लिया है तो सवाल उठता है कि आप कब और कहां इसे करेंगे? निरंतर सीखने और विकास के लिए सही जगह की तलाश करें। मौका मिलने पर सही जगह और समय पर काम करने का प्रयास करें। आप सबसे पहले अपनी जिम्मेदारी हैं। इसलिए अपने भविष्य को देखते हुए अपनी जरूरतों को प्राथमिकता दें । उन कार्यों को परिभाषित करें जिन्हें आपको करना है। इन्हें आदत में शुमार करें । एक बार जब आप अपनी मदद करने की जिम्मेदारी ले लेते हैं, तो दूसरों के लिए भी उपलब्ध हो जाते हैं।

इन सब बातों को अपनी ज़िंदगी में लागू करके आप जरूर सफल होंगे। एक अच्छा मुकाम हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम करना अत्यंत आवश्यक है।

 

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आचार्य चाणक्य की जीवन परिचय| Acharya Chanakya Biography in Hindi

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आचार्य चाणक्य असाधारण प्रतिभा के धनी थे । वे एक कुशल अर्थशास्त्री, कूट​नीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ और योग्य गुरू होने के साथ तमाम विषयों का ज्ञान रखते थे । जीवन की हर परिस्थिति का वो बारीकी से अध्ययन करते थे ।अपने ज्ञान और अनुभव को उन्होंंने अपनी रचनाओं में पिरोया है, ताकि उनसे आम लोगों का भी भला हो सके । उन्हीं रचनाओं में से एक है चाणक्य नीति । चाणक्य नीति में आचार्य ने तमाम ऐसी बातें बताई हैं, जिनका अनुसरण करके व्यक्ति अपने कठिन समय को भी आसान बना सकता है और तमाम मुसीबतों को आने से पहले ही रोक सकता है।

आचार्य चाणक्य के जन्म स्थान के बारे में।

महापंडित चाणक्य के जन्म के बारे में कुछ भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है, फिर भी उनका जन्म बौद्ध धर्म के मुताबिक 350 ईसा पूर्व में तक्षशिला के कुटिल नामक एक ब्राह्मण वंश में हुआ था। उन्हें भारत का ‘मैक्यावली‘ भी कहा जाता है। आचार्य चाणक्य के जन्म के बारे में अलग-अलग मतभेद हैं। वहीं कुछ विद्धान उन्हें कुटिल वंश का मानते हैं इसलिए कहा जाता है कि कुटिल वंश में जन्म लेने की वजह से उन्हें कौटिल्य के नाम से जाना गया। जबकि कुछ विद्धानों की माने तो वे अपने उग्र और गूढ़ स्वभाव की वजह सेत ‘कौटिल्य’ के नाम से जाने गए। जन्म स्थान को लेकर ‘मुद्राराक्षस‘ के रचयिता के अनुसार उनके पिता को चमक कहा जाता था इसलिए पिता के नाम के आधार पर उन्हें चाणक्य कहा जाने लगा।

आचार्य चाणक्य के जीवन परिचय ।

चाणक्य का जन्म एक बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होनें अपने बचपन में काफी गरीबी देखी यहां तक की गरीबी की वजह से कभी-कभी तो चाणक्य को खाना भी नसीब नहीं होता था और उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था। चाणक्य बचपन से क्रोधी और जिद्दी स्वभाव के थे उनके उग्र स्वभाग के कारण ही उन्होनें नन्द वंश का विनाश करने का फैसला लिया था। आपको बता दें कि चाणक्य शुरू से ही साधारण जीवन यापन करने में यकीन करते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि महामंत्री का पद और राजसी ठाट होते हुए भी इन्होंने मोह माया का फ़ायदा कभी नहीं उठाया। चाणक्य को धन, यश, मोह का लोभ नहीं था। कौटिल्य ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे उनके जीवन के संघर्षों और उनकी नेक विचारों ने उन्हें एक महान विद्धान बनाया था।

चाणक्य की शिक्षा।

महान विद्धान चाणक्य की शिक्षा-दीक्षा प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय में हुई थी। वे बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी और एक होनहार छात्र थे उनके पढ़ने में गहन रूचि थी। वहीं कुछ ग्रंथों के मुताबिक चाणक्य ने तक्षशिला में शिक्षा ग्रहण की थी। ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए, चाणक्य को अर्थशास्त्र, राजनीति, युद्ध रणनीतियों, दवा, और ज्योतिष जैसे कई विषयों की अच्छी और गहरी जानकारी थी। वे इन विषयों के विद्धान थे।
इसके अलावा उन्हें वेदों और साहित्य का अच्छा ज्ञान था। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे तक्षशिला में राजनीतिक विज्ञान और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बन गए उसके बाद वे सम्राट चंद्रगुप्त के भरोसेमंद सहयोगी भी बन गए थे।

चाणक्य सफल कूटनीतिज्ञ

14 वर्ष के अध्ययन के बाद 26 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी समाजशास्त्र, राजनीति और अर्थशास्त्र की शिक्षा पूर्ण की और नालंदा में उन्होंने शिक्षण कार्य भी किया । वे राजतंत्र के प्रबल समर्थक थे, उन्हें ‘भारत का मैकियावेली’ के नाम से भी जाना जाता है । ऐसी किंवदन्ती है कि एक बार मगध के राजदरबार में मगध पति घनानंद के कारण उनका अपमान किया गया था, तभी उन्होंने नंद वंश के विनाश का बीड़ा उठाया था । उन्होंने चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी पर बैठा कर वास्तव में अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर ली तथा नंद वंश को मिटाकर मौर्य वंश की स्थापना की| आचार्य चाणक्य भारतीय इतिहास के सर्वाधिक प्रखर कूटनीतिज्ञ माने जाते है ।उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ नामक पुस्तक में अपने राजनीतिक सिद्धांत का प्रतिपादन किया है, जिनका महत्त्व आज भी स्वीकार किया जाता है।

आचार्य चाणक्य की मृत्यु ।

आचार्य चाणक्य की मृत्युं लगभग 283 ईसा.पूर्व. ही हो चुकी थी, भले ही आचार्य चाणक्य अब हमारे बीच नहीं रहे परन्तु आचार्य चाणक्य के अनमोल विचार आज भी हमारे बीच जीवित है, और हमेशा जीवित रहेंगे क्यूंकी आचार्य चाणक्य विचार, आचार्य चाणक्य नीति अमर है।

 

 

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भगवान श्री कृष्ण से सीखे जीवन बदलने वाले सबक Teachings of Shree Krishna – Hindi

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श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के 8वें अवतार और हिन्दू धर्म के ईश्वर माने जाते हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता हैं। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। कृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तुत रूप से लिखा गया है।

मथुरा में जन्म, गोकुल में लालन-पालन।

भगवद्गीता कृष्ण और अर्जुन का संवाद है जो ग्रंथ आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस कृति के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है। कृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। मथुरा के कारावास में उनका जन्म हुआ था और गोकुल में उनका लालन पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता पिता थे। उनका बचपन गोकुल में व्यतित हुआ। बाल्य अवस्था में ही उन्होंने बड़े- बड़े कार्य किये जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। मथुरा में मामा कंस का वध किया। सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहां अपना राज्य बसाया। पांडवों की मदद की और विभिन्न आपत्तियों में उनकी रक्षा की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और भगवद्गीता का ज्ञान दिया जो उनके जीवन की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की।

भगवद्गीता के उपदेश से जीवन में बदलाव।

श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया उपदेश किसी भी इंसान के जीवन को बदल सकता है। श्रीमद्भागवत गीता न केवल धर्म का उपदेश देती है, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है। महाभारत के युद्ध के पहले अर्जुन और श्रीकृष्ण के संवाद लोगों के लिए प्रेरणा स्त्रोत हैं। ऐसे ही वर्तमान जीवन में उत्पन्न कठिनाईयों से लडऩे के लिए मनुष्य को गीता में बताए ज्ञान की तरह आचरण करना चाहिए। इससे वह उन्नति की ओर अग्रसर होगा। आइये जानते है उन उपदेशों के बारे में जो किसी के जीवन में बदलाव ला सकते है।

शंका करने से होती है परेशानी।

कुछ लोग होते हैं जिन्हें हमेशा लगता है कि लोग उनके विषय में ही बातें कर रहे हैं। वह यह सोच कर हमेशा परेशान भी रहते हैं कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते। मगर, वस्तविकता कुछ और ही होती है। ऐसे लोग संदेह करने के आदी होतें। पति पत्नी में भी कई बार ऐसी स्थिति आती हैं जब उन्हें एक दूसरे पर संदेह होता हे। गीता में बताया गया है कि जो व्यक्ति किसी पर संदेह करता है वह कभी भी सुखी नहीं रहता। उसके मन हमेशा शंका बनी रहती हैं जो उसे परेशान करती रहती है। वह बेशकर कुछ काम कर रहा हो मगर शंका उसे किसी बीमारी की तरह हर वक्त दुख पहुंचाती रहती है। इसलिए शंका करने से मन परेशान रहता है ।

नरक के द्वार से बचाते है अच्छे कर्म।

आम जीवन में हम हमेशा ही मोक्ष और नरक की बात करते हैं। मगर क्या आपने कभी स्वर्ग या नरक देखा है? यह हमारी मनास्थिति ही है जो हमे स्वर्ग और नरक का अनुभव कराती हैं। मगर, आपको किसी चीज का लोभ है या फिर आपको बहुत गुस्सा आता है या फिर आप वासना के शिकार हैं तो जान लें कि यह तीनों ही नरक के द्वार हैं। जहां लालच आपको अपनों से दूर करता है वहीं क्रोध आपको रोगी बनाता है और आपके बनते कामों को बिगाड़ता है। इतना ही नहीं वासना आपको मनुष्य ही नहीं रहने देती जिससे आपका नरक में जाना निश्चित हो जाता है।

कभी शोक नही करना चाहिए।

हमेशा लोग किसी को खोने पे शोक करने लगते है। अमूमन वह तब शोक करते हैं जब, वह किसी ऐसी चीज को खो देते हैं जिसका नष्ट होना तय होता है। ऐसी चीजों पर शोक मनाने का क्या फायदा जिनका नष्ट होना तय है। गीता के उपदेशों में यह बात बताई गई है कि कोई मनुष्य अमर नहीं है। सभी की मृत्यु तय है। इसलिए किसी के दुनिया को अलविदा कहने पर शोक न मनाएं। शोक उन चीजों का मनाएं जो आपके हाथों में होने के बावजूद आप उन्हें नहीं बचा पाते हैं।

हमेशा करें अच्छे कर्म।

आज के समय में अधुनिकता लोगों पर हावी है। इसके बावजूद लोग इससे वह फायदा नहीं उठा पा रहे जो वह उठा सकते हैं। क्योंकि बुद्धीमान लोग आज भी बहुत कम हैं। अगर आप समझदार हैं तो बहुत जरूरी है कि आपको अपने साथ वालों को भी समझ देनी चाहिए। इसके साथ ही आप सबका भला नहीं कर सकते मगर, इस भावना को मन में रखेंगे तो आप किसी एक का भला जरूर कर सकेंगे। अपने आस-पास के लोगों को अच्छी बातों को बताना उन्हें ज्ञान देना ही अच्छे इंसान की पहचान है।

ईश्वर की प्राप्ति करना आसान।

गीता का पाचवा सबसे महत्वपूर्ण उपदेश यह है कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय ईश्वर को याद करता है और उसके मन में सभी के लिए अच्छे भाव होते हैं वह हमेशा ईश्वर को प्राप्त करता है। अगर मन में विश्वास और श्रद्धा है तो आपको ईश्वर की प्राप्ती जरूर होगी।

 

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एक विचार आपकी जिंदगी बदल सकता है ! How One Thought Can Change Your Life – Inspirational Story in Hindi

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प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कुछ अच्छाइयाँ और कुछ बुराइयाँ छिपी होती हैं । हम अक्सर दूसरों की बुराइयों का जिक्र करते हैं और उसी पर सबसे ज्यादा ध्यान देते हैं। हर मनुष्य को इस बात का ज्ञान होता है कि उसमें कौन सी बुराइयाँ हैं और वो किस हद तक उसके मस्तिष्क पर असर करती हैं।चूंकि हम अपने अंदर की बुराइयों से अनभिज्ञ नहीं होते हैं इसीलिए हमें यह एक कमजोरी की तरह लगने लगती है। हमारे आसपास का वातावरण कई बार हमें खराब लगने लगता है क्योंकि हर कोई हमारी बुरी आदतों, बातों के बारे में ही बातें करता है । पर इसे दूर किया जा सकता है । आइये आज हम आपको ‘अंगुलिमाल ‘के कहानी के माध्यम से बताएंगे कि कैसे बुराई को पहचानकर अंगुलिमाल अच्छा इंसान बना ।

अंगुलिमाल की कहानी ।

काफी समय पहले की बात है।
अंगुलिमाल नाम का एक इंसान था उसने एक प्रतिज्ञा ली
कि वह 1000 लोगों को मारेगा और अंगुलियों की माला गले मे पहनेगा । उसने ऐसा ही किया और वह 999 लोगों को मार चुका था सब लोग उससे थर- थर कांपते थे । यहां तक कि राजा भी उससे डरता था । जहा वो रहता था वहाँ कोई नही जाता था ।

एक दिन गौतम बुद्ध उस रास्ते पर जा रहे थे, साथी भिक्षु ने उनसे कहा कि यह रास्ता सही नही है, हमारे लिए यहाँ खतरा है,
हमारी जान भी जा सकती है ।उसने बुद्ध को बताया कि, यहा अंगुलिमाल नाम का
शक्श रहता है जो लोगो को मारता है । बुद्ध ने यह सुना और वह मुस्कुराते हुए बोले की अब तो मैं जरूर जाऊंगा । उस डाकू को मेरी जरूरत है। उन्होंने साथी भिक्षु से कहा कि तुझे अपनी जान प्यारी है तो तू भाग जा ।
अब बुद्ध उसके सामने जा पहुंचे।
एक सन्यासी का तेज देख कर उसके क्रोध की ज्वाला ओर धधक उठी । अंगुलिमाल बोला सन्यासी आज मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो जाएगी। आज मैं 1000 वध की प्रतिज्ञा पूरी करूँगा । उसका क्रोध चरम सीमा पर था, वह बुद्ध को बोला, तू लौट जा नही तो तुझे मैं मार दूंगा बुद्ध निडरता पूर्वक बोले मार दे ।

बुद्ध ने अंगुलिमाल से कहा कि मैं तो रुक गया तुम कब रुकोगे। फिर बुद्ध ने डाकू से कहा कि तुम्हें अपने शक्तियों इतना घमण्ड है तो इन पेडों की टहनी काट के बताओ । डाकू ने एक झटके में टहनी के दो टुकड़े कर दिए ।
बुद्ध मन ही मन सोचने लगे कि यह डाकू मेरी बात मान रहा है।
यानी इसके बदलने की संभावना है।

बुद्ध फिर बोले अब इस टहनी को जोड़ के बताओ, वो डाकू बोला सन्यासी तू पागल है जो एक बार टूट जाता है वो जोड़ा नही जा सकता ।
बुद्ध बोले यही तो तुझे समझा रहा हूं, इस एक लाइन ने उस डाकू की ज़िंदगी मे ऐसा परिवर्तन लाया की वह इंसान बुद्ध के चरणों मे आ गिरा । उसके आंखों में आंसू थे।
बुद्ध पीछे मुड़ गए
और वो भी बुद्ध के पीछे पीछे आने लगा। गौतम बुद्ध ने उसे शिक्षा दी। वह डाकू अब सज्जन इंसान बन चुका था।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कोई भी इन्सान कितना ही बुरा क्यों न हो, वह बदल सकता है। दोस्तों, अंगुलिमाल बुराई का एक प्रतीक है, और हम सबमें छोटे-बड़े रूप में कोई न कोई बुराई है। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने अन्दर की बुराइयों को पहचाने और उन्हें ख़त्म करें।

 

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ज्यादा सोचने वाले लोगों के लिए रोचक कहानी

“ज्यादा सोचने वाले लोगों के लिए रोचक कहानी” Best Motivational Story For Overthinker in Hindi

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आधुनिकता के इस दौर में हम सभी एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हुए हैं। कैसे आगे निकला जाए, ऐसी बातें सोच-सोचकर हम खुद को ही बीमार बना रहे हैं। घर-परिवार, नौकरी या किसी भी मुद्दे पर जरूरत से ज्यादा सोचना सेहत के लिए नुकसानदेह है।

दौड़ भरी आज की जीवनशैली में सबसे बड़ी और उभरती हुई समस्या है मानसिक तनाव। हर किसी के जीवन में अपने पैर पसार चुका तनाव व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। मानसिक रोग से बचना है तो किसी भी बात को सोचने के बजाय उसका हल तलाशें। अधिक सोचने से अच्छा है कि उसका हल निकाला जाए। कभी-कभी मन को शांत रखने से भी किसी समस्या का हल निकल जाता है। आज हम आपको एक सूंदर कहानी के माध्यम से इसे समझाने की कोशिश करेंगे।आइये देखते है इस कहानी को और समझने की कोशिश करते है।

एक गांव में एक आदमी रहता था,जो ताले तोड़ने के मामले में एक्सपर्ट था,यानी कि जहां कहीं भी ताले तोड़ने की बात आती थी या लॉक को खोलने की बात आती थी,तो उसका नाम सबसे पहले लिया जाता था। एक दिन कुछ समझदार लोगों ने उसकी परीक्षा लेनी चाही और उसको बता दिया गया कि आपको इस जगह पर इस तारीख को आना है और ताले को तोड़ना है ।

वह समय के अनुसार तय दिनांक को वहां पहुंच गया। उसे लोगों के द्वारा प्रतियोगिता के नियम समझा दिए गए। उसे समझाया गया कि आपको एक बॉक्स में बिठा दिया जाएगा और उस बॉक्स को पानी में उतार दिया जाएगा। आपको ताला खोल कर बाहर आना होगा इस बीच आपको लगता है कि लॉक आपसे नहीं खुल पाएगा तो,आप इमरजेंसी बटन को दबा सकते हैं और ऊपर आ सकते हैं, लेकिन आप प्रतियोगिता में हार जाएंगे,उसने सभी नियमों की हां कर दी और पानी में चला गया।

जैसे ही वह पानी में पहुंचा तो उसने जेब में से एक तार निकाला और लॉक को खोलने की कोशिश करने लगा। 4 से 5 बार कोशिश करने के बाद वह बार बार विफल हो रहा था । लेकिन उससे लॉक नहीं खुल रहा था अब ज्यादा समय तक पानी में रहना उसके लिए और भी मुश्किल था क्योंकि उसे सांस लेने में दिक्कत आ रही थी। अंततः उसने अपना पूरा दिमाग लगाया और एक बार अंतिम प्रयास किया। वह विफल हुआ और उसने इमरजेंसी बटन दबा दिया धीरे-धीरे ऊपर आने लगा ।

पानी के ऊपर आये बॉक्स को बाहर निकाला गया और हल्का सा धक्का देकर खोला गया,वह अचंभित हो गया । उसने सोचा कि मेरे दिमाग में यह ख्याल क्यों नहीं आया कि मैं इसको धक्का देकर खोलूँ । हो सकता है कि ये लॉक ही ना हो । उसे यह समझ आ गया था कि किसी भी काम को करते समय ज्यादा दिमाग का इस्तेमाल नही करना चाहिए। कुछ काम शांत रहकर भी किया जा सकता है । अत्यधिक दिमाग लगाने से वह काम विफल साबित हो सकता है।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अपने दिमाग का सही से इस्तेमाल करके किसी भी चीज को आसानी से सुलझाया जा सकता है। अत्यधिक दिमाग से परिणाम विपरीत आने की संभावना रहती है।

 

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भारत के 2 लाख से भी ज़्यादा ग्रामीण बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं अमरीकी NRI बिस्वजीत नायक

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बहुत कम ऐसे लोग है जो विदेश रहकर भी अपने देश के लिए सोचते है । जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण है बिस्वजीत नायक।
बिस्वजीत नायक एक ऐसे अप्रवासी भारतीय है जो रहते तो कैलिफोर्निया में है पर वह भारत के लोगों के उत्थान के लिए लगे हुए है। आज बिस्वजीत एविटी लर्निंग से उड़िया के अलावा 15 से अधिक भारतीय भाषा मे लर्निंग कंटेंट तैयार कर के ग्रामीण छात्रों तक पहुचा रही हैं। आइये जानते है बिस्वजीत के बारे में।

बिस्वजीत का परिचय ।

बिस्वजीत नायक ओड़िसा के जाजपुर ज़िले के नारीगांव के रहने वाले है। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा वही के स्थानीय स्कूल से पूरी की। इन्होंने NIT राउरकेला से सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की पढाई की हैं। बीटेक करने के बाद इन्होंने कुछ साल भारत में नौकरी की । इसके बाद विदेश में जॉब करने की चाहत में यह 1999 में कैलिफ़ोर्निया के सिलिकॉन वैली चले गए। जहाँ पर अच्छी सैलरी पर इनकी नौकरी भी लग गयी । र इनका दिल था जो अब भी अपने देश में ही था। बिस्वजीत विदेश तो चले गए पर वह हमेशा अपने देश भारत के लिए सोचा करते थे। वह साल में एक बार भारत ज़रूर आते थे और यह बच्चो को शिक्षा देते थे।

बिस्वजीत ने ट्यूशन सेंटर की शुरुआत की ।

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बच्चों के साथ बिस्वजीत

अपने देश से प्यार के कारण वह जब भी भारत आते थे तो बच्चों को पढ़ाया करते थे । वह एक बार पाचवीं कक्षा के एक लड़की को पढा रहे थे तो उन्हें समझाने में दिक्कत हो रही थी । उन्होंने तय किया कि वह अपने क्षेत्र में शिक्षा के प्रसार को बढाने के लिए ट्यूशन सेंटर की शुरुआत करेंगे जिससे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके। उन्होंने इसी सोच के साथ अपने गांव में मधुसूदन शिख्या केंद्र की नींव डाली ।

ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का दीप ।

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बिस्वजीत ने ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों में शिक्षा का दीप जलाया ।
बिस्वजीत ने जिस शिक्षा के दीप को जलाया उसे अब एविटी लर्निंग के नाम से जाना जाता हैं। यह Masive open online course(MOOC) पर आधारित हैं। 2017 में बिस्वजीत ने एविटी लर्निंग को आधिकारिक नाम से पंजीकृत करवाया। एविटी लर्निंग के आज उड़िया के अलावा 15 से अधिक भारतीय भाषा मे लर्निंग कंटेंट तैयार कर के ग्रामीण छात्रों तक पहुचा रही हैं। आज 120 से अधिक केंद्र और 400 स्कूलों में इसके कंटेंट को पढ़ाया जाता हैं। इसका पाठ्यक्रम पूरे राज्य में पढ़ाया जाता हैं।

चंदा वसूली करने वाले को बनाया मैनेजर।

बिस्वजीत ने एक नवयुवक जो गांव में घूमकर पूजा का चंदा वसूली का काम करता था उसे मैनेजर बनाया। वह बताते हैं कि एक बार गणेश पूजा के पहले कुछ लोग चंदा वसूली कर रहे थे। उन्ही लोगो मे से एक युवक प्रकाश पर बिस्वजीत की नज़र पड़ी। इन्होंने प्रकाश को 3 हज़ार रुपये महीने की नौकरी का ऑफर दिया। बिस्वजीत कहते है कि आज सेन्टर चलाने से लेकर छात्रों का डेटाबेस तैयार करना या पेरेंट्स को समझना यह सभी काम प्रकाश ही संभालता हैं। सेन्टर में आज शिक्षक और कंटेंट बनाने वालों को।मिलाकर 18 सदस्य हैं।

पूरे भारत में प्रसार करने का लक्ष्य ,दोस्त भी करते है मदद।

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बिस्वजीत के दोस्त जिन्हें भारत से लगाव था वह आज उनकी मदद कर रहे है । उनके दोस्त स्मार्ट लर्निंग उपकरण जैसे टेबलेट या संचालन के उपकरणों का स्पांसर करते है। बिस्वजीत इस पाठ्यक्रम को पूरे भारत के कोने-कोने में ले जाना चाहते है। जिससे गरीब छात्र-छात्राओं को भी इससे लाभ हो।

 

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Inspirational Story of A Bus Conductor : गरीब छात्रों की शिक्षा के लिए, यह बस कंडक्टर देता है हजारों का योगदान

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जरूरी नही की सेवा के लिए आपका धनवान होना जरूरी है। आपके पास सेवा करने की भावना होनी चाहिए। जिसमें सेवा करने की भावना होती है वह इंसान अपने कम बचत में भी खूब सेवा करता है। आज हम एक ऐसे ही इंसान के बारे में आपको बताएंगे जिनके अंदर सेवा करने की भावना इतनी है कि वह एक बस कंडक्टर की नौकरी करके अपने कम कमाई में भी सालाना बचत करके पढ़ने वाले गरीब छात्र-छात्राओं की मदद करते है। आइये जानते है उनके बारे में ।

कौन है थोटा श्रीधर ?

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स्कूल में आयोजन के दौरान श्रीधर

थोटा श्रीधर मूल रूप से चित्तूर जिले के मुलकलचेरुवु के रहने वाले है। उनका बचपन वहीं बीता और वहीं के सरकारी स्कूल से दसवीं तक की पढ़ाई की। उनके पिताजी खेती-बाड़ी करके परिवार का पालन-पोषण करते थे। उनके पिता एक किसान होने से उनकी आर्थिक स्थिति अत्यंत ही दैनीय थी।

बस कंडक्टर की नौकरी मिली।

थोटा श्रीधर दसवीं की पढ़ाई के बाद, अनंतपुर के तनकल्लू आ गए और यहाँ से उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई की। पढ़ाई के बाद, 1991 में उन्हें ‘आंध्र प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम’ (APSRTC) में बतौर बस कंडक्टर नौकरी मिल गयी। उनकी इस नौकरी से, उनके घर की आर्थिक स्थिति काफी हद तक सुधर गयी।

गरीब बच्चों की मदद करते है श्रीधर ।

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बच्चों को किताबें देते हुए

एक बस कंडक्टर होने के बावजूद श्रीधर मुलकलचेरुवु के ‘जिला परिषद हाई स्कूल’ में हर साल गणतंत्र दिवस पर गरीब बच्चों के लिए 20 से 25 हजार रुपये की मदद करते है । इन पैसों से स्कूल के ऐसे मेधावी छात्रों की किताब, कॉपी, स्कूल बैग और जूते आदि खरीदने में मदद की जाती है, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। वह साल 2015 से यह योगदान दे रहे हैं। उनके योगदान से अब तक, 100 से ज्यादा छात्रों को मदद मिल चुकी है।

माँ के मृत्यु के बाद से सेवा शुरू की।

श्रीधर की माँ के देहान्त के बाद वह लगातार सेवा करते आ रहे है। उनकी माँ का देहांत 2014 में हो गया था । श्रीधर खुद भी उसी स्कूल से पढ़े है । हर साल श्रीधर 26 जनवरी को मेघावी छात्र-छात्राओं को पुरस्कृत करते है।उनके यह सेवा की भावना सालों से चली आ रही है। श्रीधर के इस काम से स्कूल के सभी शिक्षक अत्यंत ही प्रभावित है।

अपने एक शिक्षक से मिली प्रेरणा।

श्रीधर को सेवा की प्रेरणा अपने एक शिक्षक से मिली। दरअसल स्कूल के दिनों में श्रीधर एक शिक्षक ने उन्हें कहा था कि अच्छे कर्म करने से अखबार में तस्वीर आती है । बस उसी दिन से श्रीधर ने यह कसम खाई की वह अपने कर्तव्य को हमेशा अच्छा रखेंगे । उन्होंने तभी से सेवा करनी शुरू कर दी। आज श्रीधर की तारीफ हर तरफ होती है। एक कंडक्टर होने के बाद भी महीने में 2000 रुपये तक की बचत करके गरीब बच्चों के प्रति उनके सेवा के भाव की तारीफ जितनी हो कम ही प्रतीत होता है। श्रीधर से हमसभी को प्रेरणा लेने की जरूरत है।

 

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You Are The Best – Motivational Story In Hindi

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अपनी तुलना दूसरों से करने से रोकना कठिन है लेकिन इसे दूर किया जा सकता है। आजकल हर किसी को परफ़ेक्ट बनना है। यदि हम अपनी उपलब्धियों और दक्षता को जाँचना शुरू कर देते हैं, तो हम सच में आगे बढ़ सकते हैं। अपनी तुलना दूसरों के साथ करना, बहुत आम बात है और इनसे जलन का अनुभव होना भी सामान्य गुण है।

लेकिन जब आप अपनी क्षमताओं के बारे में सोचे बिना सिर्फ़ अपनी कमियों को सोच कर परेशान होते हैं, तो आप ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं। यह आप की एक कमज़ोरी हो सकती है, और यहाँ तक कि यह आप को अपने जीवन के कुछ अनमोल पहलुओं का आनंद लेने से भी रोक देती है। दूसरे लोगों के साथ निरंतर की जा रही तुलना आप के आत्म-सम्मान को कम कर देती है, और इस से आप आप को अपने ही बारे में बुरा लगने लगता है। खुद को अपनी नज़रों से देख कर ही आप अपनी तुलना करने की लत से छुटकारा पा सकते हैं। हमेशा यह सोचे कि आप में वह सभी क्षमता है जो एक इंसान में होनी चाहिए । अपने आत्मविश्वास को हमेशा उँचा रखें। आज हम आपको एक कहानी के माध्यम से इसे समझाने की कोशिश करेंगे। यह कहानी जरूर आपके जीवन में बदलाव लाएगी।

एक बार की बात है एक विद्वान योगी जंगल से निकल रहे थे, तो बीच में एक पेड़ आया और पेड़ से पानी की एक बूँद उनके ऊपर गिरी जैसे ही उन्होंने ऊपर देखा तो उनको एक कौआ दिखाई दिया । वह रो रहा था । साधु ने उससे पूछा की तुम रो क्यों रहे हो ? तो कौआ ने जवाब दिया कि मैं अपनी जिंदगी से परेशान हूं। उसने कहाँ ये भी कोई जिंदगी है,मैं कितना काला हूं। मैं किसी के काम नही आ सकता सिर्फ लोग मुझे श्राद्ध में ही याद करते है।

योगी ने कहा बोल तुझे किसके जैसा बनना है तो वो बोला मुझे हंस जैसा बनना है । योगी जी बोले लेकिन उससे पहले तुम एक बार हंस से तो मिल लो । अब वो कौआ हंस को ढूंढने निकला। काफी मशक्कत के बाद जब वो हंस के पास पहुंचा तो देखकर बोला वाह -वाह क्या जिंदगी है । तुम पानी मैं चलते हो जिसका पता भी नही लगता, मुझे भी तेरे जैसा बनना है भाई । लाइफ तो तुम ही जी रहे हो।

अब हंस ने कहा क्या खाख लाइफ है, ये सफेद रंग । साला लोग मरने के बाद पहनना पसन्द करते है,ये भी कोई जिंदगी है ।
दोनों साधु के पास आ गए ।
अब साधु ने पूछा कि तू भी परेशान है तो बता किसके जैसा बनना चाहता है।
तो हंस बोला मुझे तोते जैसा बनना है, अब तोते के पास आ पहुंचे दोनों।

उन्होंने तोते से कहा कि क्या जिंदगी है तेरी वाह ,
लोग काजू बादाम तक देते है तुझे
बेहद आलीशान लाइफ जीता है रे तू तोता भाई ।अब तोता बोला साला ये भी कोई लाइफ है।
हरे में हरा ये भी कोई कलर है ।
तेरा कितना सुंदर कलर है ,सफेद। साला कोई पिंजरे में बंद कर ले तो पिंजरे के कैदी हो जाते है ।खुले आसमान में घूमने की आजादी छीन जाती है ।
अब तीनो साधु के पास आ गए ।

साधु ने कहा तोता तुम खुश हो ?
तोता बोला नही ।
साधू ने कहा तो अब तू भी बता की तू किस जैसा बनना चाहता है? तोता बोला मुझे मोर जैसा बनना है ।
भागे- भागे तीनो मोर के पास गए
मोर भाई मोर भाई….!!
क्या जिंदगी है तेरी क्या लाइफ जीता है रे तू…..!
कितने सुंदर सुंदर पंख है तेरे
लोग मरते है तेरे फ़ोटो खींचने के लिए…
तो वो बोला साला ये भी कोई जिंदगी है ।जहाँ अगले पल का पता ना हो
वो कुछ नही समझे
मोर बोला सुनो???
टक टक टक………
बोला शिकारी आ रहा है। मेरी
माँ को नोच डाला बच्चो को मार डाला ।
हर पल जिंदगी का खतरा मंडराता रहता है, नही चाहिए
ऐसी जिंदगी ..।

चारो लौट के साधु के पास आ गए
साधु ने उससे भी पूछ लिया कि तुझे किस जैसा बनना है ।
मोर ने बड़ी ही शालीनतापूर्वक जवाब दिया
मुझे कौआ बनना है ।
कौआ की आंखे फ़टी की फटी रह गयी बोला ये क्या बोल रहा है
आगे मोर ने बोला कि
सबसे सुरक्षित जीवन कौआ जीता है ।
इसकी जिंदगी में कोई खतरा नही है। साल में एक बार श्राद्ध के महीने में काम आता है,लोगो के, बाकी अपनी मस्ती में जीता है
आज का इंसान इतना क्रूर हो चुका चुका है कि
किसी भी जानवर को नही छोड़ता
सिवाए कौआ के आपने सुना होगा चिकन बिरयानी मटन बिरयानी लेकिन कभी सुना है कौआ बिरयानी । मोर की बात सुनकर कौआ की आंखे खुल गई। वह समझ चुका था कि हर कोई अपने आप मे अच्छा होता है।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी अपने आप को कम नही आंकना चाहिए। आप खुद में एक अव्वल इंसान है । बस जरूरत है उस इंसान को पहचानने की।

 

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Maharana Pratap

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय | Maharana Pratap Biography In Hindi

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महाराणा प्रताप का जीवन परिचय | Maharana Pratap Biography In Hindi

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बिंदु (Points) जानकारी (Information)
नाम (Name) प्रताप सिंह
प्रसिद्ध नाम महाराणा प्रताप
जन्म (Date of Birth) 9 मई 1540
आयु 56 वर्ष
लम्बाई लगभग(Height) 7 फीट 5 इंच
वजन (Weight) 80 किग्रा
जन्म स्थान (Birth Place) कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजस्थान
पिता का नाम (Father Name) उदय सिंह
माता का नाम (Mother Name) जैवंता बाई
पत्नी का नाम (Wife Name) महारानी अजबदे के अलावा 9 रानियाँ
पेशा (Occupation ) मेवाड़ के राजा
बच्चे (Children) कुल 17 बच्चे, जिनमे अमर सिंह, भगवान दास शामिल है.
मृत्यु (Death) 19 जनवरी 1597
मृत्यु स्थान (Death Place) चावंड, राजस्थान
भाई-बहन (Siblings) 3 भाई (विक्रम सिंह, शक्ति सिंह, जगमाल सिंह),
2 बहने सौतेली (चाँद कँवर, मन कँवर)

 

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को एक राजपूत परिवार में हुआ था। उनके पिता उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ वंश के 12वें शासक और उदयपुर के संस्थापक थे। परिवार में सबसे बड़े बच्चे प्रताप के तीन भाई और दो सौतेली बहनें थीं ।महाराणा प्रताप को भारत के अब तक के सबसे मजबूत योद्धाओं में से एक माना जाता है। इसलिए उन्हें ‘माउंटेन मैन’ भी कहा जाता है। महाराणा प्रताप 7 फीट 5 इंच लंबे थे। वह 72 किलोग्राम वजनी बॉडी आर्मर यानी कवच भी पहनते था। 81 किलो का भाला रखते थे। इसके अलावा उनके पास दो भारी वजनी तलवारें भी थी। कुल मिलाकर लगभग 208 किलोग्राम वजन वह अपने साथ लेकर चलते थे।

बचपन से थे साहसी महाराणा। 

बचपन से ही महाराणा प्रताप बहादुर और दृढ़ निश्चयी थे। सामान्य शिक्षा से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी। उनको धन-दौलत की नहीं बल्कि मान-सम्मान की ज्यादा परवाह थी। उनके बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, ‘इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है। धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे। प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया। हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा।

महाराणा का राज्याभिषेक।

महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह अपनी मृत्यु से पहले बेटे जगमल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था जो उनकी सबसे छोटी पत्नी से थे। वह प्रताप सिंह से छोटे थे। जब पिता ने छोटे भाई को राजा बना दिया तो अपने छोटे भाई के लिए प्रताप सिंह मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे लेकिन सरदारों के आग्रह पर रुक गए। मेवाड़ के सभी सरदार राजा उदय सिंह के फैसले से सहमत नहीं थे। सरदार और आम लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रताप सिंह मेवाड़ का शासन संभालने के लिए तैयार हो गए। 1 मार्च, 1573 को वह सिंहासन पर बैठे।

अकबर से टकराव और हल्दीघाटी का युद्ध ।

महाराणा प्रताप के समय दिल्ली पर मुगल शासक अकबर का राज था। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुगल बादशाह की गुलामी पसंद नहीं थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि मानसिंह के भड़काने से अकबर ने खुद मानसिंह और सलीम (जहांगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।अकबर ने मेवाड़ को पूरी तरह से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच युद्ध हुआ। इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है।

युद्ध लड़ते रहे महाराणा।

हल्दीघाटी का युद्ध’ भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे।

महाराणा प्रताप का चेतक ।

भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था ।
हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

महाराणा का वनवास ।

महाराणा प्रताप का हल्दी घाटी के युद्ध के बाद का समय पहाड़ों और जंगलों में ही व्यतीत हुआ। अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति द्वारा उन्होंने अकबर को कई बार मात दी। महाराणा प्रताप चित्तौड़ छोड़कर जंगलों में रहने लगे। महारानी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और जंगल के पोखरों के जल पर ही किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफाएं ही अब उनका आवास था और शिला ही शैया थी ।

महाराणा की मृत्यु।

1579 का वो दौर आया जब मुगलों ने चित्तौड़ पर ध्यान देना बंद कर दिया। क्योंकि उन दिनों बिहार और बंगाल में मुगलों के खिलाफ जंग छिड़ी हुई थी। इनसब के बीच महाराणा प्रताप को अपनी गतिविधियां तेज करने का मौका मिल गया। 1585 में अकबर लाहौर की तरफ बढ़ गया क्योंकि उसे अपने उत्तर-पश्चिम वाले क्षेत्र पर भी नजर रखना था। अगले 12 सालों तक वो वहीं रहा। इसका फायदा उठाते हुए महाराणा प्रताप ने पश्चिमी मेवाड़ पर अपना कब्जा कर लिया जिसमें कुंभलगढ़, उदयपुर और गोकुण्डा आदि शामिल थे और उन्होंने चवण को अपनी नई राजधानी बनाई। महाराणा प्रताप की मौत का कोई पुख्ता सुबूत तो नही मिल पाया था लेकिन कहा गया है कि चवण में 56 की उम्र में शिकार करते समय एक दुर्घटना होने से उनकी मौत हो गयी ।

 

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