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You Are The Best – Motivational Story In Hindi

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अपनी तुलना दूसरों से करने से रोकना कठिन है लेकिन इसे दूर किया जा सकता है। आजकल हर किसी को परफ़ेक्ट बनना है। यदि हम अपनी उपलब्धियों और दक्षता को जाँचना शुरू कर देते हैं, तो हम सच में आगे बढ़ सकते हैं। अपनी तुलना दूसरों के साथ करना, बहुत आम बात है और इनसे जलन का अनुभव होना भी सामान्य गुण है।

लेकिन जब आप अपनी क्षमताओं के बारे में सोचे बिना सिर्फ़ अपनी कमियों को सोच कर परेशान होते हैं, तो आप ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं। यह आप की एक कमज़ोरी हो सकती है, और यहाँ तक कि यह आप को अपने जीवन के कुछ अनमोल पहलुओं का आनंद लेने से भी रोक देती है। दूसरे लोगों के साथ निरंतर की जा रही तुलना आप के आत्म-सम्मान को कम कर देती है, और इस से आप आप को अपने ही बारे में बुरा लगने लगता है। खुद को अपनी नज़रों से देख कर ही आप अपनी तुलना करने की लत से छुटकारा पा सकते हैं। हमेशा यह सोचे कि आप में वह सभी क्षमता है जो एक इंसान में होनी चाहिए । अपने आत्मविश्वास को हमेशा उँचा रखें। आज हम आपको एक कहानी के माध्यम से इसे समझाने की कोशिश करेंगे। यह कहानी जरूर आपके जीवन में बदलाव लाएगी।

एक बार की बात है एक विद्वान योगी जंगल से निकल रहे थे, तो बीच में एक पेड़ आया और पेड़ से पानी की एक बूँद उनके ऊपर गिरी जैसे ही उन्होंने ऊपर देखा तो उनको एक कौआ दिखाई दिया । वह रो रहा था । साधु ने उससे पूछा की तुम रो क्यों रहे हो ? तो कौआ ने जवाब दिया कि मैं अपनी जिंदगी से परेशान हूं। उसने कहाँ ये भी कोई जिंदगी है,मैं कितना काला हूं। मैं किसी के काम नही आ सकता सिर्फ लोग मुझे श्राद्ध में ही याद करते है।

योगी ने कहा बोल तुझे किसके जैसा बनना है तो वो बोला मुझे हंस जैसा बनना है । योगी जी बोले लेकिन उससे पहले तुम एक बार हंस से तो मिल लो । अब वो कौआ हंस को ढूंढने निकला। काफी मशक्कत के बाद जब वो हंस के पास पहुंचा तो देखकर बोला वाह -वाह क्या जिंदगी है । तुम पानी मैं चलते हो जिसका पता भी नही लगता, मुझे भी तेरे जैसा बनना है भाई । लाइफ तो तुम ही जी रहे हो।

अब हंस ने कहा क्या खाख लाइफ है, ये सफेद रंग । साला लोग मरने के बाद पहनना पसन्द करते है,ये भी कोई जिंदगी है ।
दोनों साधु के पास आ गए ।
अब साधु ने पूछा कि तू भी परेशान है तो बता किसके जैसा बनना चाहता है।
तो हंस बोला मुझे तोते जैसा बनना है, अब तोते के पास आ पहुंचे दोनों।

उन्होंने तोते से कहा कि क्या जिंदगी है तेरी वाह ,
लोग काजू बादाम तक देते है तुझे
बेहद आलीशान लाइफ जीता है रे तू तोता भाई ।अब तोता बोला साला ये भी कोई लाइफ है।
हरे में हरा ये भी कोई कलर है ।
तेरा कितना सुंदर कलर है ,सफेद। साला कोई पिंजरे में बंद कर ले तो पिंजरे के कैदी हो जाते है ।खुले आसमान में घूमने की आजादी छीन जाती है ।
अब तीनो साधु के पास आ गए ।

साधु ने कहा तोता तुम खुश हो ?
तोता बोला नही ।
साधू ने कहा तो अब तू भी बता की तू किस जैसा बनना चाहता है? तोता बोला मुझे मोर जैसा बनना है ।
भागे- भागे तीनो मोर के पास गए
मोर भाई मोर भाई….!!
क्या जिंदगी है तेरी क्या लाइफ जीता है रे तू…..!
कितने सुंदर सुंदर पंख है तेरे
लोग मरते है तेरे फ़ोटो खींचने के लिए…
तो वो बोला साला ये भी कोई जिंदगी है ।जहाँ अगले पल का पता ना हो
वो कुछ नही समझे
मोर बोला सुनो???
टक टक टक………
बोला शिकारी आ रहा है। मेरी
माँ को नोच डाला बच्चो को मार डाला ।
हर पल जिंदगी का खतरा मंडराता रहता है, नही चाहिए
ऐसी जिंदगी ..।

चारो लौट के साधु के पास आ गए
साधु ने उससे भी पूछ लिया कि तुझे किस जैसा बनना है ।
मोर ने बड़ी ही शालीनतापूर्वक जवाब दिया
मुझे कौआ बनना है ।
कौआ की आंखे फ़टी की फटी रह गयी बोला ये क्या बोल रहा है
आगे मोर ने बोला कि
सबसे सुरक्षित जीवन कौआ जीता है ।
इसकी जिंदगी में कोई खतरा नही है। साल में एक बार श्राद्ध के महीने में काम आता है,लोगो के, बाकी अपनी मस्ती में जीता है
आज का इंसान इतना क्रूर हो चुका चुका है कि
किसी भी जानवर को नही छोड़ता
सिवाए कौआ के आपने सुना होगा चिकन बिरयानी मटन बिरयानी लेकिन कभी सुना है कौआ बिरयानी । मोर की बात सुनकर कौआ की आंखे खुल गई। वह समझ चुका था कि हर कोई अपने आप मे अच्छा होता है।

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी अपने आप को कम नही आंकना चाहिए। आप खुद में एक अव्वल इंसान है । बस जरूरत है उस इंसान को पहचानने की।

 

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Maharana Pratap

महाराणा प्रताप का जीवन परिचय | Maharana Pratap Biography In Hindi

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महाराणा प्रताप का जीवन परिचय | Maharana Pratap Biography In Hindi

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बिंदु (Points) जानकारी (Information)
नाम (Name) प्रताप सिंह
प्रसिद्ध नाम महाराणा प्रताप
जन्म (Date of Birth) 9 मई 1540
आयु 56 वर्ष
लम्बाई लगभग(Height) 7 फीट 5 इंच
वजन (Weight) 80 किग्रा
जन्म स्थान (Birth Place) कुम्भलगढ़ दुर्ग, राजस्थान
पिता का नाम (Father Name) उदय सिंह
माता का नाम (Mother Name) जैवंता बाई
पत्नी का नाम (Wife Name) महारानी अजबदे के अलावा 9 रानियाँ
पेशा (Occupation ) मेवाड़ के राजा
बच्चे (Children) कुल 17 बच्चे, जिनमे अमर सिंह, भगवान दास शामिल है.
मृत्यु (Death) 19 जनवरी 1597
मृत्यु स्थान (Death Place) चावंड, राजस्थान
भाई-बहन (Siblings) 3 भाई (विक्रम सिंह, शक्ति सिंह, जगमाल सिंह),
2 बहने सौतेली (चाँद कँवर, मन कँवर)

 

महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 को एक राजपूत परिवार में हुआ था। उनके पिता उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ वंश के 12वें शासक और उदयपुर के संस्थापक थे। परिवार में सबसे बड़े बच्चे प्रताप के तीन भाई और दो सौतेली बहनें थीं ।महाराणा प्रताप को भारत के अब तक के सबसे मजबूत योद्धाओं में से एक माना जाता है। इसलिए उन्हें ‘माउंटेन मैन’ भी कहा जाता है। महाराणा प्रताप 7 फीट 5 इंच लंबे थे। वह 72 किलोग्राम वजनी बॉडी आर्मर यानी कवच भी पहनते था। 81 किलो का भाला रखते थे। इसके अलावा उनके पास दो भारी वजनी तलवारें भी थी। कुल मिलाकर लगभग 208 किलोग्राम वजन वह अपने साथ लेकर चलते थे।

बचपन से थे साहसी महाराणा। 

बचपन से ही महाराणा प्रताप बहादुर और दृढ़ निश्चयी थे। सामान्य शिक्षा से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी। उनको धन-दौलत की नहीं बल्कि मान-सम्मान की ज्यादा परवाह थी। उनके बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, ‘इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है। धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे। प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया। हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा।

महाराणा का राज्याभिषेक।

महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह अपनी मृत्यु से पहले बेटे जगमल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था जो उनकी सबसे छोटी पत्नी से थे। वह प्रताप सिंह से छोटे थे। जब पिता ने छोटे भाई को राजा बना दिया तो अपने छोटे भाई के लिए प्रताप सिंह मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे लेकिन सरदारों के आग्रह पर रुक गए। मेवाड़ के सभी सरदार राजा उदय सिंह के फैसले से सहमत नहीं थे। सरदार और आम लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रताप सिंह मेवाड़ का शासन संभालने के लिए तैयार हो गए। 1 मार्च, 1573 को वह सिंहासन पर बैठे।

अकबर से टकराव और हल्दीघाटी का युद्ध ।

महाराणा प्रताप के समय दिल्ली पर मुगल शासक अकबर का राज था। अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुगल बादशाह की गुलामी पसंद नहीं थी। इसी बात पर उनकी आमेर के मानसिंह से भी अनबन हो गई थी, जिसका नतीजा यह हुआ कि मानसिंह के भड़काने से अकबर ने खुद मानसिंह और सलीम (जहांगीर) की अध्यक्षता में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भारी सेना भेजी।अकबर ने मेवाड़ को पूरी तरह से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा। दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच युद्ध हुआ। इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है।

युद्ध लड़ते रहे महाराणा।

हल्दीघाटी का युद्ध’ भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है। इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे। मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी। उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे।

महाराणा प्रताप का चेतक ।

भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली। चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था ।
हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था। फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया। जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका। प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी।

महाराणा का वनवास ।

महाराणा प्रताप का हल्दी घाटी के युद्ध के बाद का समय पहाड़ों और जंगलों में ही व्यतीत हुआ। अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति द्वारा उन्होंने अकबर को कई बार मात दी। महाराणा प्रताप चित्तौड़ छोड़कर जंगलों में रहने लगे। महारानी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और जंगल के पोखरों के जल पर ही किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफाएं ही अब उनका आवास था और शिला ही शैया थी ।

महाराणा की मृत्यु।

1579 का वो दौर आया जब मुगलों ने चित्तौड़ पर ध्यान देना बंद कर दिया। क्योंकि उन दिनों बिहार और बंगाल में मुगलों के खिलाफ जंग छिड़ी हुई थी। इनसब के बीच महाराणा प्रताप को अपनी गतिविधियां तेज करने का मौका मिल गया। 1585 में अकबर लाहौर की तरफ बढ़ गया क्योंकि उसे अपने उत्तर-पश्चिम वाले क्षेत्र पर भी नजर रखना था। अगले 12 सालों तक वो वहीं रहा। इसका फायदा उठाते हुए महाराणा प्रताप ने पश्चिमी मेवाड़ पर अपना कब्जा कर लिया जिसमें कुंभलगढ़, उदयपुर और गोकुण्डा आदि शामिल थे और उन्होंने चवण को अपनी नई राजधानी बनाई। महाराणा प्रताप की मौत का कोई पुख्ता सुबूत तो नही मिल पाया था लेकिन कहा गया है कि चवण में 56 की उम्र में शिकार करते समय एक दुर्घटना होने से उनकी मौत हो गयी ।

 

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आसानी से आदते बदलो | How to Change Bad Habits ? – Hindi

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गलत आदतों से छुटकारा पाना बहुत मुश्क़िल काम होता है।चाहे सिगरेट छोड़ना हो, सोशल मीडिया की लत से बाहर आना हो या जंक फूड खाने की दीवानगी से छुटकारा पाना ।किसी भी आदत को छोड़ना किसी चुनौती से कम नहीं होता।

आदत दिमाग की उपज होती है।

आदत हमारे दिमाग़ की उपज होती है, इसलिए इससे पीछा छुड़ाना बहुत मुश्क़िल होता है। इसके लिए हमें अपने दिमाग़ के साथ जद्दोज़ेहद करनी पड़ती है। यह कहना ग़लत न होगा कि आदत बनाना आसान होता है, लेकिन उसे बदलना बेहद कठिन। इसलिए अपनी आदत को बदलने की बजाय बेहतर होगा कि कोई नई मगर अच्छी आदत डाले। ताकि पुरानी आदत की ओर से ध्यान हट जाए । आज हम आपको कहानी के माध्यम से बताएंगे की बुरी आदतों को कैसे बदला जाए ।

कहानी इस प्रकार है ।

एक बार की बात है एक पिता अपने पुत्र की आदतों से बहुत परेशान था। उसे समझाया करते थे कि बेटा तुम्हारी आदत से मैं बहुत परेशान हूं। अब तुम बड़े हो गए हो प्लीज अपनी आदत को सुधार लो,लेकिन बेटा हमेशा बोलता गया अभी तो मैं छोटा हूं
जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो मैं इस आदत को सुधार लूंगा। लेकिन, तभी गांव में एक विख्यात महात्मा आए हुए थे। इस परेशान पिता को उनकी ख्याति के बारे में पता चला तो वे उनके चरणों में चले गए। महात्मा ने कहा कि आप मुझे कल शाम को बगीचे में मिलो और साथ में अपने पुत्र को भी लेकर के आओ उसने ऐसा ही किया। जब शाम को बगीचे में पुत्र के साथ पिता भी आए तो, पुत्र ने महात्मा जी को नमन किया और महात्मा जी ने कहा आओ बालक मेरे साथ चलो। चलते चलते एक छोटा सा पौधा महात्मा जी को दिखाई दिया। उन्होंने बालक से कहा कि बालक तुम इस पौधे को उखाड़ सकते हो बच्चे ने कहा बिल्कुल।
इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। बालक ने फटाफट पौधे को उखाड़ दिया महात्मा जी आगे बढ़े
अबकी बार पौधा थोड़ा बड़ा था। लेकिन महात्मा जी ने कहा क्या तुम इस पौधे को भी उखाड़ सकते हो? बच्चे के अंदर जोश था बिल्कुल मैं इसको उखाड़ सकता हूं थोड़ी मेहनत उसको लगी। लेकिन अंततः पौधा उखाड़ दिया। अब महात्मा जी ने उसको एक गुड़हल का पेड़ दिखाया और कहा कि इसे उखाड़ कर दिखाओ। तब मैं मान लूंगा कि वाकई में तुममे बहुत ताकत है। बच्चा कोशिश करने लगा
तने को बार-बार हिलाने लगा लेकिन बार-बार विफल हो रहा था। उसने कोशिश की लेकिन अंतत असफलता उसके हाथ लगी। महात्मा जी ने कहा कि कुछ आपके समझ में आया?
बच्चा बोला नहीं। महात्मा ने कहा ठीक ऐसा ही हमारी आदतों के साथ है। अगर शुरू में हम आदतों को तोड़ना चाहे। ठीक पौधों की तरह तोड़ सकते हैं। क्यों की शुरू में आदतें इतनी मजबूत नहीं होती है।
लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता जाता है और हम आदतों को नहीं बदलते हैं। आदतें इस विशाल वृक्ष की ताकत के बराबर मजबूत हो जाती है और अंततः उनको बदलना बहुत ही मुश्किल काम है। हालांकि नामुमकिन नहीं है लेकिन बहुत ही मुश्किल काम है। लेकिन कुल मिलाकर आप अपनी आदतों को बदलना चाहते हो तो शुरुआत में ही सतर्क रहें। इससे मेहनत भी कम लगेगी और आप अपनी आदतों पर लगाम भी लगा पाएंगे। चाहे किसी भी प्रकार की आदत को आप बदलना चाहे बस शुरू में आप सतर्क रहें।

इस तरह इस कहानी से हमें यह सिख मिलती है कि हम अगर चाहे तो अपनी बुरी आदतों को हमेशा के लिए छोड़ सकते है बस हमें कोशिश करने की आवश्यकता है।

 

 

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ये कहानियाँ आपको सफल बना सकती है || 3 Best Motivational Story Hindi

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प्रेणादायक कहानियां जो आपकी ज़िन्दगी बदल देती है। अगर जिंदगी में कुछ पाना हो, करना हो उन सभी के लिए प्रेरक प्रसंग बहुत की उपयोगी सिद्ध होते है। यह हमे Motivate करते है, क्योंकि जब तक हमारे जीवन में कोई प्रेरक प्रसंग नही होगा, तब तक हम आगे बढ़ नही सकते और ना ही सफल हो सकते है। कई लोगो में सेल्फ मोटिवेशन होता है। आज हम 3 प्रेणादायक कहानियां आपको बताएंगे जिसको पढ़ के आपको ज़िंदगी में सफल होने की सिख मिलेगी।

1. हार कर खुद से जीता ।

हरीश नाम का एक लड़का था उसको दौड़ने का बहुत शौक था
वह कई मैराथन में हिस्सा ले चुका था ।परंतु वह किसी भी दौड़ को पूरा नही करता था ।एक दिन उसने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाये वह दौड़ पूरा जरूर करेगा। अब रेस शुरू हुई ।हरीश ने भी दौड़ना शुरू किया धीरे 2
सारे धावक आगे निकल रहे थे
मगर अब हरीश थक गया था
वह रुक गया फिर उसने खुद से बोला अगर मैं दौड़ नही सकता तो कम से कम चल तो सकता हूं।
उसने ऐसा ही किया वह धीरे-धीरे
चलने लगा मगर वह आगे जरूर बढ़ रहा था ।अब वह बहुत ज्यादा थक गया था और नीचे गिर पड़ा
उसने खुद को बोला की वह कैसे भी करके आज दौड़ को पूरी जरूर करेगा वह जिद करके वापस उठा लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ने लगा और अंततः वह रेस पूरी कर गया । माना कि वह रेस हार चुका था लेकिन आज उसका विश्वास चरम पर था क्योंकि आज से पहले वह दौड़ को कभी पूरा ही नही कर पाया था वह जमीन पर पड़ा हुआ था क्योंकि उसके पैरों की मांसपेशियों में बहुत खिंचाव हो चुका था । लेकिन आज वह बहुत खुश था
क्योंकि आज वह हार कर भी जीता था । हरीश की कहानी से हमे यही सीखने को मिलता है कि अगर हम लगातार आगे बढ़ते रहे तो एक दिन हम हारकर भी जीत
जाएंगे ।

2.परिस्थितियों को दोष देना ।

कुछ समय पहले की बात है।
एक आदमी रेगिस्तान में फंस गया था । वह मन ही मन अपने आप को बोल रहा था कि यह कितनी अच्छी और सुंदर जगह है
अगर यहां पर पानी होता तो यहां पर कितने अच्छे-अच्छे पेड़ उग रहे होते । और यहां पर कितने लोग घूमने आना चाहते होंगे
मतलब वह आरोप कर रहा था
कि यह होता तो वो होता और वो होता तो शायद ऐसा होता । ऊपरवाला देख रहा था अब उस इंसान ने सोचा यहां पर पानी नहीं दिख रहा है । उसको थोड़ी देर आगे जाने के बाद उसको एक कुआं दिखाई दिया जो कि
पानी से लबालब भरा हुआ था । वह खुद से काफी देर तक विचार-विमर्श करता रहा ।
फिर बाद में उसको वहां पर एक रस्सी और बाल्टी दिखाई दी इसके बाद कहीं से
एक पर्ची उड़ के आती है जिस पर्ची में लिखा हुआ था कि तुमने कहा था कि यहां पर पानी का कोई श्रोत नहीं है अब तुम्हारे पास पानी का स्रोत भी है
अगर तुम चाहते हो तो यहां पौधे लगा सकते हो
पर वह इंसान वहाँ से बिना पेड़ लगाए चला गया।
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कुछ लोग सिर्फ परिस्थिति को दोष देना जानते हैं अगर उनके पास उपयुक्त स्रोत हो तो वह परिस्थिति को नहीं बदल सकते
सिर्फ वह आरोप करना जानते हैं लेकिन हमे ऐसा नहीं बनना है
यह कहानी हमें यह बताती है कि
अगर आप चाहते हो कि
परिस्थितियां बदले और आपको अगर उसके लिए उपयुक्त साधन मिल जाए तो आप अपना एक परसेंट योगदान तो दे ही सकते हैं।

3. ईमानदारी का फल ।

काफी समय पहले की बात है प्रतापगढ़ नाम का एक राज्य था वहाँ का राजा बहुत अच्छा था
मगर राजा को एक सुख नही था
वह यह कि उसके कोई भी संतान नही थी । वह चाहता था कि अब वह राज्य के अंदर किसी योग्य बच्चे को गोद ले ताकि वह उसका उत्तराधिकारी बन सके और आगे की बागडोर को सुचारू रूप से चला सके ।और इसी को देखते हुए राजा ने राज्य में घोषणा करवा दी की सभी बच्चे राजमहल में एकत्रित हो जाये ।
ऐसा ही हुआ राजा ने सभी बच्चो को पौधे लगाने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार के बीज दिए और कहा कि अब हम 6 महीने बाद मिलेंगे और देखेंगे कि किसका पौधा सबसे अच्छा होगा । महीना बीत जाने के बाद भी एक बच्चा ऐसा था जिसके गमले में वह बीज अभी तक नही फूटा था
लेकिन वह रोज उसकी देखभाल करता था और रोज पौधे को पानी देता था। देखते ही देखते 3 महीने बीत गए बच्चा परेशान हो गया । तभी उसकी माँ ने कहा कि बेटा धैर्य रखो कुछ बीजो को फलने में ज्यादा वक्त लगता है
और वह पौधे को सींचता रहा
6 महीने हो गए राजा के पास जाने का समय आ चुका था ।
लेकिन वह डर हुआ था कि सभी बच्चो के गमलो में तो पौधे होंगे और उसका गमला खाली होगा
लेकिन वह बच्चा ईमानदार था ।
सारे बच्चे राजमहल में दोबारा एकत्रित हुए। कुछ बच्चे जोश से भरे हुए थे क्योंकि उनके अंदर राज्य का उत्तराधिकारी बनने की प्रबल लालसा थी । अब राजा ने आदेश दिया सभी बच्चे अपने अपने गमले दिखाने लगे
मगर एक बच्चा सहमा हुआ था क्योंकि उसका गमला खाली था
तभी राजा की नजर उस गमले पर गयी उसने पूछा तुम्हारा गमला तो खाली है । तो उसने कहा लेकिन मैंने इस गमले की 6 महीने तक देखभाल की है । राजा उसकी ईमानदारी से खुश था कि उसका गमला खाली है फिर भी वह हिम्मत करके यहाँ आ तो गया । सभी बच्चों के गमले देखने के बाद राजा ने उस बच्चे को सभी के सामने बुलाया बच्चा सहम गया। और राजा ने वह गमला सभी को दिखाया
सभी बच्चे जोर से हसने लगे
राजा ने कहा शांत हो जाइये ।
इतने खुश मत होइए आप सभी के पास जो पौधे है वो सब बंजर है आप चाहे कितनी भी मेहनत कर ले उनसे कुछ नही निकलेगा
लेकिन असली बीज यही था
राजा उसकी ईमानदारी से बेहद खुश हुआ।
और उस बच्चे को राज्य का उत्तराधिकारी बना दिया गया ।
इस कहानी से हमें यह सीखने को मिला की अपने अंदर ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है । अगर हम खुद के साथ ईमानदार है तो जीवन के किसी न किसी पड़ाव में सफल हो ही जाएंगे ।

आशा है इस प्रेरणादायक कहानियों को पढ़ कर आप अपने जीवन मे इसे लागू करने का प्रयत्न भी करेंगे।

 

 

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सफल होने के लिए काम मे डूब जाओ ! Dedication On Your Passion or Goals

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जीवन में हर व्यक्ति अपने सपनों को पूरा कर सफलता की सीढ़ियां चढ़ना चाहता है। इस दौड़ में कुछ लोग सफलता हासिल कर आगे निकल जाते हैं तो कुछ को असफलता का मुंह देखना पड़ता है। असफलता का स्वाद चखने वाले ज्यादातर लोग अपनी असफलता के लिए दूसरों को दोष देते है, लेकिन वास्तव में उनकी असफलता के लिए उनके ही द्वारा की गई कुछ गलतियां जिम्मेदार होती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं सफलता हासिल करने के आसान मंत्र, जो हर व्यक्ति को सफलता हासिल करने में मदद करते हैं।

हमेशा बड़ा सोच रखें।

ज्यादातर लोग अपना लक्ष्य बहुत ही छोटा रखते हैं और उसे प्राप्त कर खुश हो जाते हैं जबकि कुछ लोग बहुत बड़ा लक्ष्य पाने की कोशिश तो करते हैं लेकिन हासिल नहीं कर पाते। इसलिये आप अपना लक्ष्य काफी सोच समझ कर तय करें और बड़ा सोचें।जब आप अपना लक्ष्य बड़ा रखेंगे तो उसे पूरा करने में भी मजा आएगा । यही लक्ष्य जब पूरा हो जाएगा तो आप दिन-रात तरक्की करेंगे ।

स्वयं पर भरोसा रखें ।

खुद पर विस्वास ऐसी मनोभावना है, जो आपके हर एक काम में आपका पहला साथी होता है । जब भी आप कोई काम शुरु करते है तो उसमे जी तोड़ मेनहत करने से पहले आपको अपने आप पर भरोसा होना चाहिए तभी वह काम आपका सफल होगा । यदि आपके अंदर ऐसा विस्वास है की आप जो काम शुरु करने जा रहे है उसको उसके अंजाम तक पंहुचा सकते है, तो आपको उस काम में सफल होने से कोई नहीं रोक सकता है । यदि आपको अपने आप पर भरोसा नहीं होगा तो आप ठीक उसी प्रकार हो जाएंगे जो अपने योग्ता पर काम और दूसरे की सलाह पर ज्यादा भरोसा करता है। आपको दूसरे के सलाह से ज्यादा अपने आप पर भरोसा होना चाहिए ।

अपने काम को चुनौती के रूप में स्वीकार करें।

आपके द्वारा किया गया हर एक काम और आपके मिला हर एक मौका एक चुनौती की तरह होता है । ज़िंदगी में जो लोग इस बात को समझ कर अपना काम कर रहे है ।उनके सफल होने का मौका दूसरे के मुकाबले कई गुना बढ़ जाता है । चुनौती मन और शरीर को मंजिल की दिशा में साधकर उसको वहाँ पर अपना ध्यान केंद्रित करने में मदद करती है ।जो लोग चुनौती का सामना करने से घबराते है। सफलता भी उनसे बहुत कोसो दूर रहती है। इसलिए ज़िंदगी में सफल होने के लिए कभी भी किसी भी चुनौती से घबराना नहीं चहिए ।बल्कि उसको डटकर सामना करना चाहिए ।

अपने डर को दूर भागए ।

जब भी आप किसी नए काम को करने के लिए जाये तो उससे थोड़ा भी डरे ना क्योकि अगर आप उस से डर गए तो समझ लो की आप मर गए । बहुत से लोग ऐसे है जो भय के कारण अपने काम को पूरा ही नहीं करते है । ऐसा लोगो के साथ आत्मविस्वास की कमी के कारण होता है।
किसी भी काम को करने से पहले ही ये ना सोचे की आप इस काम में हार जाएंगे। बस अपना बढ़िया प्रयास करे, खुद पर विस्वास रखें, और बिना डरे उस काम की शुरुवात करे। आपको सफलता जरूर मिलेगी। जिंन्दगी में छोटे से लेकर बड़ा हर कोई सफल होना चाहता है । लेकिन लाइफ में सफलता उसको ही मिलती है जो अपने कमजोरी को अपनी ताकत बनाता है ।और किसी भी काम में अपना हार नहीं मनाता है ।

अच्छे दोस्त बनाएं।

आपके आस-पास के लोग ,आपका परिवेश ,आपके मित्रों का भी जीवन में बड़ा योगदान होता है। इसलिए सफलता हासिल के लिए अच्छे दोस्त बनाएं । अच्छे लोगों से मिले । आपके आत्मविश्वास को बढ़ाने वाले कहानी भी पढ़ें । इस तमाम चीजों को अपने जीवन में अपनाकर आप जल्द से जल्द सफल हो सकेंगे।

 

 

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स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekananda Biography In Hindi

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स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे।
इनकी माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवीजी धार्मिक विचारों की महिला थीं। उनका अधिकांश समय भगवान् शिव की पूजा-अर्चना में व्यतीत होता था।
नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहाँ उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

भारत का वेदान्त अमेरिका और यूरोप के हर एक देश में स्वामी विवेकानन्द की वक्तव्य के कारण ही पहुँचा। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे। उन्हें प्रमुख रूप से उनके भाषण की शुरुआत ” मेरे अमेरिकी भाइयों एवं बहनों ” के साथ करने के लिए जाना जाता है । उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था।

अतिथि सेवा और गुरु सेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते थे।

दैवयोग से उनके पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेन्द्र पर आ पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। अत्यन्त दर्रिद्रता में भी नरेन्द्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रात भर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते। स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव श्रीरामकृष्ण को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की चिंता किये बिना, स्वयं के भोजन की चिंता किये बिना वे गुरु-सेवा में सतत संलग्न रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यन्त रुग्ण हो गया था। परमहंस जी की कृपा से इन्हें आत्म-साक्षात्कार हुआ जिसके फलस्वरूप कुछ समय बाद वह परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए ।

युवाओं के लिए मार्गदर्शक स्वामी विवेकानंद।

स्वामी विवेकानंद सदा खुद को गरीबों का सेवक मानते थे । भारत के गौरव को देश दुनियां तक पहुंचाने के लिए वह सदा प्रयत्नशील रहते थे।। 4 जुलाई, सन्‌ 1902 को उन्होंने अलौकिक रूप से अपना देह त्याग किया। बेल्लूर मठ में अपने गुरु भाई स्वामी प्रेमानंद को मठ के भविष्य के बारे में निर्देश देकर रात में ही उन्होंने जीवन की अंतिम सांसें लीं। “उठो जागो और तब तक ना रुको जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए” स्वामी विवेकानंद के यही आदर्श आध्यात्मिक हस्ती होने के बावजूद युवाओं के लिए एक बेहतरीन प्रेरणास्त्रोत साबित करते हैं .आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो केवल उनके सिद्धांतों को ही अपना मार्गदर्शक मानते हैं।

 

 

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Inspirational Story :जानवरों के लिए खर्च करते हैं आधी से ज्यादा कमाई, जंगलों में भी जाकर खिलाते हैं खाना

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ईश्वर ने मनुष्य को बोलने की शक्ति का वरदान देकर उसे धरती के सभी प्राणियों में श्रेष्ठ बनाया है। इस बोलने की शक्ति का सहारा लेकर वह अपने मन के भावों और विचारों को बोलकर व्यक्त करता है, लेकिन जानवरों के साथ ऐसा नहीं है। भले ही वो आपस में अपनी भाषा में बात करते हों पर उसे हम समझ नहीं पाते। लेकिन उनके प्रति प्यार और आदर उन्हें खूब समझ आता है। आप भी यदि जानवरों को प्यार करेंगे तो उसके बदले में वह भी बेहद प्यार करते हैं। ऐसा कहा और माना भी जाता है कि घोड़े और श्वान जैसे कुछ जानवर मनुष्य से भी अधिक भरोसेमंद और स्वामिभक्त होते हैं। परंपरा का हिस्सा है पशु प्रेम पशु-पक्षियों का साहचर्य प्राप्त करना तो हमारी परंपरा का अटूट हिस्सा रहा है। चाहे वो पक्षियों को दाना चुगाना हो, चींटियों व मछलियों को दाना डालना हो अथवा गाय या श्वान को रोटी खिलाना। यह आचरण पशु-पक्षियों के प्रति हमारे कोमल व संवेदनशील व्यवहार को दर्शाते हैं। यही नहीं, हममें से बहुत से लोग इन जानवरों को पालने का भी शौक रखते हैं। आज हम आपको एक ऐसे इंसान के बारे में बताएंगे जो जानवरों के सेवा के लिए अपनी आधी से अधिक कमाई खर्च कर देते है। आइये जानते है उस दयालु इंसान के बारे में।

बाशा मोहीउद्दीन का परिचय।

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Sheik Basha Mohiuddin feeding stray animals

 

बाशा मोहीउद्दीन आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले के रहनेवाले है। उनकी आयु 50 वर्ष है। बाशा पिछले दस सालों से निरंतर जानवरों की सेवा करते आए है। उनको जानवरों से बहुत लगाव है। एक मध्यम परिवार के होते हुए भी वह जानवरों पर अपनी आधी कमाई खर्च कर देते है।

जब तक ज़िंदगी है तब तक जानवरों की सेवा।

बाशा मोहीउद्दीन का कहना है कि वह जब तक जीवित रहेंगे बेजुबानों की सेवा करते रहेंगे। बाशा का यह लगाव सचमुच प्रशंसनीय है। वह बचपन से जानवरों की सेवा करते आए है। बाशा केवल 10वीं पास हैं। स्कूल की पढ़ाई के बाद से ही उन्होंने नौकरी शुरू कर दी थी। कई सालों तक उन्होंने कुवैत में भी काम किया। साल 2010 में वह देश लौट आए और छोटे स्तर पर रियल एस्टेट का काम शुरू किया। फिलहाल, 2017 से शहर में वह अपना फिटनेस जिम चला रहे है। उनके जिम से जितनी कमाई होती है वह जानवरों में उन कमाई का आधा हिस्सा खर्च करते है ।

जानवरों से लगाव की कहानी।

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Feeding Monkeys and Cows

 

बाशा मोहीउद्दीन को जानवरों से लगाव तब हुआ जब वो 2011 में एक जंगल के रास्ते से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्होंने बंदरों का एक झुंड देखा जो एक बोतल के आधे पानी के लिए आपस मे झगड़ रहे थे ।उन्होंने सोचा कि बेजुबानों को खाने-पीने में बहुत तकलीफ होती होगी। उन्होंने तभी से प्रण किया वो जानवरों की सेवा करेंगे। उस घटना के बाद 10 सालों से वह लगातार जानवरों की सेवा करते आ रहे है। वह जंगल मे जाते है जानवरों के लिए पानी भरते है ,उन्हें खाना उपलब्ध कराते है। यह सब करके उनके बहुत खुशी मिलती है। वह लगभग 40 किमी में फैले जंगल में जाकर जानवरों को खाना खिलाते हैं ।

परिवार वालों का मिलता है पूरा सहयोग।

बाशा मोहीउद्दीन को उनके परिवार वालों का पूरा सहयोग मिलता है ।उनकी पत्नी भी इस काम में उनका पूरा सहयोग करती है। बाशा जीतना कमाते है उसका आधा भाग वह जानवरों की सेवा में खर्च करते है। सभी लोगों को बाशा मोहीउद्दीन से प्रेरणा लेने की जरूरत है। हमें भी बेजुबानों की सेवा करनी चाहिए।वो भी प्रकृति का एक हिस्सा है।

 

 

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विलियम शेक्सपियर का जीवन परिचय | William Shakespeare Biography In Hindi

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विलियम शेक्सपियर जीवन परिचय | William Shakespeare Biography In Hindi

बिंदु (Points) जानकारी (Information)
नाम (Name) विलियम शेक्सपियर
जन्म (Date of Birth) 1564
आयु 70 वर्ष
जन्म स्थान (Birth Place) स्ट्रैटफ़ोर्ड-ऑन-एवन, यूनाइटेड किंगडम
पिता का नाम (Father Name) जॉन शेक्सपिय
माता का नाम (Mother Name) मैरी आर्डेन
पत्नी का नाम (Wife Name) ऐनी हैथवे
पेशा (Occupation ) कवि, नाटककार
बच्चे (Children) 3
मृत्यु (Death) 23 अप्रैल 1616
मृत्यु स्थान (Death Place) स्ट्रैटफ़ोर्ड-ऑन-एवन, यूनाइटेड किंगडम
भाई-बहन (Siblings) 9
अवार्ड (Award) विशिष्ट सेवा पदक

 

विलियम शेक्सपीयर इंग्लिश कवी, नाटककार और अभिनेता थे जो इंग्लिश भाषा के महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध लेखको में से एक थे। उन्हें इंग्लैंड का राष्ट्रिय कवी और “बार्ड ऑफ़ एवन” भी कहा जाता है। उनके महानतम कार्यो में 38 नाटक, 154 चतुर्दश पदि कविता, 2 लंबी विवरणात्मक कविताये, और बहोत से छंद और लेखन कार्य शामिल है। उनके नाटको को कई भाषाओ में रूपांतरित किया गया था और बहोत से नाटककारों ने उनके नाटकों का प्रदर्शन भी किया था।

विलियम शेक्सपीयर का परिचय।

शेक्सपीयर का जन्म एवन के ऊपर स्ट्रेटफोर्ड में हुआ था। 18 साल की उम्र में उन्होंने ऐनी हैथवे से शादी कर ली। बाद में उनके तीन बच्चे भी हुए, सुसान और जुड़वाँ हम्नेट और जूडिथ। 1585-1592 के समय में उन्होंने लंदन में एक अभिनेता, लेखक और एक नाटक कंपनी लॉर्ड चेम्बर्लेन मेन के सह-मालक बनकर अपने करियर की शुरुवात की। 1613 में 49 साल की आयु में वे स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर्ड हो गये थे और वही तक़रीबन 3 साल बाद उनकी मृत्यु हो गयी थी।

आर्थिक स्थिति खराब के कारण पढ़ाई छोड़ी।

उन्होने अपनी स्कूली शिक्षा एक स्थानीय स्कूल स्ट्रेटफोर्ड ग्रामर स्कूल से की थी। अपनी पिता की बढ़ती आर्थिक मुश्किलों के कारण उन्हें पढाई छोड़कर छोटे मोटे धंधों में लग जाना पड़ा। इसके बाद उन्होने जीविका की तलाश में 1587 में लन्दन चले गये, लंदन मे उन्होंने एक रंगशाला में किसी छोटी नौकरी पर काम किया। किंतु कुछ दिनों के बाद वे लार्ड चेंबरलेन की कंपनी के सदस्य बन गए और लंदन की प्रमुख रंगशालाओं में समय समय पर अभिनय में भाग लेने लगे। जहा वो एक अभिनेता और नाटककार बने।

उन्होंने दुखांत नाटक का समावेश किया ।

1608 तक उन्होंने दुखांत नाटक लिखे, जिनमे हैमलेट, ऑथेलो, किंग लेअर और मैकबेथ भी शामिल है। अपने अंतिम समय में उन्होंने दुःख सुखान्तक नाटको का लेखन किया था। जिनमे कुछ रोमांचक नाटक भी शामिल है। अंतिम नाटकों में शेक्सपियर का परिपक्व जीवनदर्शन मिलता है। महाकवि को अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के अनुभव हुए थे जिनकी झलक उनकी कृतियों में दिखाई पड़ती है।

रोमांस के साथ कॉमेडी भी ।

शेक्सपियर के नाटकों में रोमांस के साथ- साथ कॉमेडी भी होती थी। उन्होंने कॉमेडी वाले भी बहुत से नाटक प्रस्तुत किये लोगों ने उसे बहुत पसंद भी किया ।इसके बाद के वर्षों में इन्होंने ट्रेजेडी की शैली को भी छुआ ।उनके चरित्र- प्रतिनिधत्व में शेक्सपियर ने मानव व्यवहार और कार्यों को भी प्रस्तुत किया ।

विलियम शेक्सपियर की मृत्यु ।

सन 1613 में शेक्सपियर स्ट्रेटफोर्ड से रिटायर हो गए । विलियम शेक्सपियर की अपने जन्मदिन के 3 दिन पहले यानि 23 अप्रैल सन 1616 में मृत्यु हो गई । शेक्सपियर की याद में दुनिया भर में कई मूर्तियाँ, स्मारकें स्थापित किये गये है। जो कि इस महान कवि और नाटककार के लिए लोगों आपार प्रेम को दर्शाता है ।

 

 

 

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Social Heroes :कुत्ते को गटर से पानी पीता देख शुरू की पहल, अब तक बाँट चुके हैं 25,000 पानी के बर्तन

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पशु-पक्षियों में भी मनुष्यों की भांति प्रेम की भावना होती है । इसीलिए पशु-पक्षी समूह में रहते हैं और प्रकृति के नियमों के अनुसार चलते हैं । अकारण किसी पर हमला नहीं करते ।दैनिक दिनचर्या के ऐसे काम जो मनुष्य नहीं कर सकता पशु सहज भाव में ही कर देते हैं । पालतू पशु-पक्षी भी मनुष्य के साथ प्रेम भाव से बंध जाते हैं और उसके लिए अपनी जान तक न्योछावर कर देते हैं ।आज हम आपको एक ऐसे ही इंसान के बारे में बताएंगे जो जानवरों से बहुत प्रेम करते है। उनका प्रेम भावना अद्भुत है । आइये जानते है उनके बारे में ।

जैन सनी का परिचय ।

जैन सनी कर्नाटक के तुमकुर के रहने वाले है। पेशे से एक फार्मासिस्ट हैं और साथ ही, वह ‘वॉटर फॉर वॉइसलेस‘ अभियान चला रहे हैं। वह 35 वर्ष के है। लगभग सात साल पहले उन्होंने अकेले तुमकुर में इस अभियान की शुरुआत की थी, लेकिन आज यह पहल लगभग दस शहरों तक पहुँच चुकी है। आज इस अभियान के चर्चे लोगों तक आसानी से पहुँच रहे है। दरअसल इस अभियान के तहत वह पशु-पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम करते है।

घर-घर जाकर लोगों को घड़े/बर्तन बांटे ।

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उन्होंने इस अभियान कि शुरुआत घर-घर जाकर लोगों को घड़े/बर्तन बांटने से की थी, जिनमें लोग अपने घरों के बाहर जानवरों के लिए पानी भरकर रख सकते हैं। आज वह और उनकी टीम लगभग 25000 बड़े-छोटे पानी के बर्तन लोगों को बाँट चुकी है।
ताकि जितना ज्यादा हो सके पशु-पक्षियों के लिए पानी का इंतजाम हो।

बेजुबानों के लिए प्रेम अद्भुत ।

जैन सनी का जानवरों के प्रति प्रेम बहुत है। उनका कहना है कि जानवर अपने मन की व्यथा जाहिर नही कर सकते है। उनके भूख-प्यास को अपना समझ वह निरंतर इस कार्य में लगे हुए है। वह कहते है कि गर्मियों के मौसम में जानवरों के लिए आसानी से पानी उपलब्ध नही होता । इसलिए उनका यह अभियान पशुओं की सेवा के लिए ही है।

अभियान की शुरुआत कैसे हुई ।

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लगभग सात साल पहले एक दिन एक कुत्ते के बच्चे का जैन सनी के गाड़ी से एक्सीडेंट हो गया। वह उसे लेकर अस्पताल भी गए लेकिन उसकी जान नहीं बच पाई। इस दुर्घटना से वह अंदर तक हिला गए और वह तीन-चार महीने तक इसे सदमे में ही थे, वह हमेशा सोचते रहते थे कि यह क्या हो गया उनसे ? फिर एक दिन काम पर जाते समय उन्होंने देखा कि एक कुत्ता गटर में से पानी पी रहा है। उस दृश्य को देखकर उन्होंने ठान लिया कि वह इन बेजुबानों के लिए कुछ करेंगे।
उन्होंने सबसे पहले शुरुआत अपने घर से की और एक छोटा-सा मिट्टी का बर्तन पानी से भरकर घर के बाहर रखने लगे। लेकिन यह पर्याप्त नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने आस-पड़ोस के घरों में जा-जाकर बर्तन बाँटना शुरू किया और उनसे अनुरोध किया कि वे भी बेजुबानों के लिए पानी भरकर रखें। देखते ही देखते उनकी यह ड्राइव सोशल मीडिया पर भी पहुँच गयी और ज्यादा से ज्यादा लोग उनसे जुड़ने लगे।

लोग अभियान में मदद भी करते है।

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उनकी टीम इलाके के हिसाब से पानी के लिए बर्तन बांटती है। उनके पास दो तरह के बर्तन हैं – एक बड़ा, जो वह ज्यादातर जंगल वाले इलाके में रखते हैं क्योंकि वहाँ हाथी, हिरण, गधा जैसे जानवर भी पानी पीते हैं। वहीं छोटा बर्तन रिहायशी इलाकों में रखते हैं, जहाँ कुत्ते, बिल्ली, बकरी आदि पानी पीते हैं। इन बर्तनों को मुफ्त में बाटंने के लिए अभियान से जुड़े कुछ लोग और कुछ दानकर्ता आर्थिक मदद करते हैं।

सभी लोगों को जैन सनी से सीखने की जरूरत है । उनसे प्रेरणा लेने की जरूरत है । हमें भी बेजुबानों की सेवा करनी चाहिए। प्रकृति के वह भी एक अभिन्न अंग है।

 

 

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