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Author name: Rushali Gulati

Rohtak

Shubham Chaurashiya

Shubham Chaurashiya – Bihar Board Class 12 Topper 2023

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Shubham Chaurashiya- शुभम चौरसिया ने 500 में से कुल 472 अंक यानी 94.4 प्रतिशत के साथ दूसरा स्थान हासिल करके बिहार बोर्ड कक्षा 12 परीक्षा 2023 में टॉप किया और अपने माता पिता का नाम रोशन किया , कौन है शुभम चौरसिया और उन्होंने ये कारनामा कैसे कर दिखाया आइये जानते है,

Shubham Chaurashiya

शुभम चौरसिया का सफर –

जी हा आज हम शुभम चौरसिया (Shubham chaurasiya) की बात कर रहे है। जिन्होंने बिहार बोर्ड इंटरमीडिएट में दूसरा स्थान हासिल कर। अपने माता पिता का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। शुभम चौरसिया जो बिहार (Bihar) के औरंगाबाद (Aurangbad ) के दाउदनगर शहर के वार्ड नंबर 13 दुर्गापुर (Durgapur) के रहने वाले है। यह काफी सामान्य परिवार से तालुक रखते है। इनके पिता का नाम संतोष कुमार (Santosh Kumar) है जो पेशे से ऑटो चालक है। शुभम के घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक नहीं है जिसके चलते इनके घर खर्च का गुजारा काफी कठिनाई से होता है , वही शुभम की माता मीरा देवी (Meera Devi) जो गृहणी है।

Shubham Chaurashiya- घर की स्थिति ठीक न होने पर भी पढ़ाई में दिखाई पूरी लगन

जैसे की हमने आपको बताया की शुभम चौरसिया के पिता ही उनके पूरे घर का खर्च उठाते थे। जिसके चलते उनकी घर खर्च बेहद ही मुश्किल से चल पता है । लेकिन शुभम के माता पिता ने कभी भी आर्थिक तंगी का असर अपने बेटे की पढ़ाई के ऊपर नहीं आने दिया। साथ ही साथ शुभम का भी कहना था की जिस तरह उन्होंने मैट्रिक में टॉप टेन में स्थान हासिल किया था उसी तरह वह 12वी कक्षा में भी अवल आना चाहते थे। जिसके लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की और 500 अंक में से 472 अंक को हासिल किया और दूसरा स्थान प्राप्त किया। जिसके बाद माता पिता के साथ गांव में भी खुशी का माहौल है ।

शुभम करते थे 8 से 9 घंटे पढ़ाई

शुभम का कहना था। की उन्हे जिंदगी में बेहद सफलता हासिल करनी है जिसके लिए वह अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देते है। उनका कहना था की उनके पास उनकी पढ़ाई के अलावा और कोई काम नहीं था और घर के काम भी काफी कम होते थे। जिसके चलते उन्हें दिन में 8 से 9 घंटे पढ़ने का मौका मिलता था। और वह पूरी लगन और एकाग्रता से अपनी पढाई करते थे , जिसके चलते उन्होंने आज टॉप किया l

शुभम के रिजल्ट से माता पिता का सीना हुआ गर्व से चौड़ा

हर माता पिता अपने बच्चे की सफलता के लिए भगवान से प्राथना करते हैं। की उनका बच्चा अपनी जिंदगी में एक उचे मुकाम तक पहुचे और सफलता हासिल करे। शुभम को यह सफलता मिलने के बाद उनकी माता ने अपने बेटे की खुशी में उनकी काफी तारीफ की, उनकी माता का कहना था की शुभम को अपनी पढ़ाई से काफी लगाव है अपने घर की स्थिति को संभालने के लिए शुभम काफी लगन से पढ़ाई करते है और एक अच्छी नौकरी हासिल करना चाहते है। साथ ही उनके पिता ने भी अपनी खुशी जाहिर की। और साथ ही साथ गांव के लोगो में भी खुशी का माहौल बना हुआ है ।

शुभम करेंगे अच्छी नौकरी की तैयारी

शुभम ने एक इंटरव्यू में बताया की। अब वह यूपीएससी (UPSC ) की परीक्षा की तैयारी करेंगे। जिसके लिए अब वह खूब मेहनत करेंगे और अपनी घर की स्थिति को सुधारेंगे । साथ ही साथ उन्होंने अपने माता पिता और ईश्वर का भी धन्यवाद किया ।

प्रेरणा

शुभम चौरसिया आने वाली युवाओं के लिए एक प्रेरणा के रूप में उभर के आए है। आज उन्होंने साबित किया की मेहनत सिर्फ अमीर लोगो के ही नही हर उस इंसान के कदम चूमती, जो कड़ी लगन और मेहनत से काम करता है। हर युवा को शुभम से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में अपनी मंजिल को हासिल करना चाहिए।

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IAS RENU RAJ

IAS RENU RAJ – पहले ही प्रयास में बनी डॉक्टर से अफसर

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आज कल काफी चर्चा में डॉ रेणु राज, जो आज कल आईएएस (IAS) बन काफी सुर्खियां बटोरती हुई नजर आ रही हैं। अपने मेडिकल कैरियर को बड़ावा देते हुए। डॉ रेणु राज ने आईएएस जैसी परीक्षा में भी अपना योगदान देते हुए सफलता को हासिल किया। तो आइए जानते हैं। डॉ रेणु राज के जीवन और उनके द्वारा पाई गई सफलता के बारे में।

IAS RENU RAJ

कौन है IAS Renu Raj

आईएएस डॉ रेणु राज (IAS Doctor Renu Raj) जिनका जन्म 11 जनवरी 1987 में केरल (Kerala) में हुआ था। जो एक सामान्य परिवार से तालुक रखती है ,रेणु राज को बचपन से ही पढ़ाई में काफी रुचि थी। जिस कारण उन्होंने पढ़ाई को अपनी जिंदगी में बेहद अनमोल बना के रखा। जो उन्हे एक ऊंची सफलता तक लेकर आया । डॉ रेणु राज के पिता, जो पेशे से एक कंडक्टर (Conductor) है। और उनकी माता घर गृहणी ( house wife) है।

कहा से प्राप्त की शिक्षा

डॉ रेणु राज जिन्होंने अपनी शिक्षा को काफी प्रेम दिया और अपनी सफलता को हासिल किया। इन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा 10th और 12 केरला के उच्च स्कूल सेट टेरेसा हायर स्कूल (Set Teresa Higher School) से प्राप्त की थी। जिसके बाद उन्होंने एमबीबीएस (MBBS) के लिए सरकारी कॉलेज में दाखिला लिया। अपको बता दे की रेणु राज के पति और उनकी बहने मेडिकल क्षेत्र से तालुक रखते है । लेकिन रेणु राज मेडिकल क्षेत्र में पढ़ाई करते करते हमेशा आईएएस परीक्षा की तैयारी के बारे में सोचती थी। क्योंकि उनका सपना था की वे एक बार आईएएस जैसी उच्च परीक्षा जरूर दे।

एक ही प्रयास में क्लियर किया आईएएस का एग्जाम

हम सब ने अक्सर कई बच्चो को आईएएस की परीक्षा देते हुए देखा है। लेकिन इस परीक्षा को कोई कोई बच्चा ही पास कर पता हैं। क्य्योंकी यह भारत की सबसे कठिन परीक्षा में से एक है। जिसे पास करने के लिए बड़े बड़े कोचिंग सेंटर में दाखिला लेकर इस परीक्षा की तैयारी करनी होती है। लेकिन, रेणु राज द्वारा देखा गया आईएएस बनने का सपना और उनके द्वारा किया गया दृढ़ संकल्प, उन्हे अपनी लक्ष्य की और ले गया। जिसके बाद उन्होंने आईएएस की परीक्षा को पहले ही प्रयास में पास कर दिखाया और एक मिसाल कायम की ।

किस तरह की तैयारी

डॉ रेणु राज जो आज की युवा पीढ़ी के लिए एक प्रेरणा बनी है । जिनके कदमों पर चल कर हर बच्चा अपने आईएएस की परीक्षा को पास कर के सफलता को हासिल कर सकता हैं। रेणु राज का कहना है। की उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा की तैयारी यूट्यूब पर विडियोज देख कर की और कड़ी मेहनत से नोट्स बना कर शुरू की। जिसमे उन्होंने प्रीलिम्स और मेन्स की तैयारी एक साथ ही पूरी की। क्योंकि प्रीलिम्स की परीक्षा के 15 दिन बाद ही मेंस की परीक्षा होती है। जिस कारण उन्होंने दोनो तैयारी एक साथ की। और साथ ही उन्होंने कक्षा 7वी 8वी 9वी 10वी 11वी 12वी की एनसीईआरटी की बुक्स को पढ़ा।

आईएएस डॉ रेणु राज की वर्तमान पोस्टिंग

अपने सपने को साकार करने के बाद उन्होंने अपना पद हासिल किया। जिसमे वह 12 जून 2015 में त्रिशूर, केरल की सब कलेक्टर (Sub collector) के रूप में निखर के आई। जिसके बाद अब उनकी पोस्टिंग वर्तमान में केरल, वायनाड में जिलाधिकारी रूप में हुई।

IAS RENU RAJ
पहले पति से लिया तलाक और अब दुबारा की शादी

डॉ रेणु राज जिनका सफर उनके कैरियर में तो काफी अच्छा रहा, उन्हे हर कदम पे सफलता को हासिल किया। लेकिन उनके जीवन में उन्हे कही चीज़ों का सामना करना पड़ा। उन्हे अपनी पहली शादी में तलाक का सामना करना पड़ा। जिसकी कोई भी खबर सोशल मीडिया पर नहीं है। जिसके बाद उन्होंने अब 2020 में अपनी दूसरी शादी की घोषणा के बाद अपने प्रेमी संग शादी रचाई और उनके साथ प्रेम बंधन में बंध गई।

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Mehandipur Balaji

Mehandipur Balaji – मेहंदीपुर बालाजी मंदिर का इतिहास

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Mehandipur Balaji – मंदिर जो आज काफी प्रसिद्ध है यह मंदिर हनुमान जी को समर्पित है, बालाजी हनुमान जी के नमो में से एक नाम हैं। मेहंदीपुर बालाजी मंदिर में भक्त अपने दुखो का निवारण करने के लिए आते हैं। क्योंकि लोग मेहंदीपुर बालाजी मंदिर की चमत्कारी शक्तियों में काफी आस्था रखते हैं। जिसके चलते यहां काफी भीड़ देखने को मिलती हैं। तो आइए जानते है मेहंदीपुर बालाजी मंदिर के इतिहास और आस्था के बारे में।

Mehandipur Balaji

मेहंदीपुर बालाजी धाम – Mehandipur Balaji

मेहंदीपुर बालाजी जो राजस्थान के दौसा जिले में स्थित है। जहा हिंदू ही नही अन्य कई धर्म के लोग भी देखने को मिलते है। ऐसा कहा जाता हैं की हनुमान जी वहा आए हर व्यक्ति के दुखो का निवारण किसी न किसी रूप में आकर जरूर करते है। वहा रह रहे स्थानीय लोग हर रोज सवेरे मंदिर में बाला जी के दर्शन करने आते है। कहा जाता हैं वहा महंत जी का हर रोज बैठना होता, वहा आए लोग महंत जी को अपनी परेशानी बताते हैं। वह उनकी परेशानी को जानकर उन्हे दवाई देते है और बताए हुए इलाज पर चलने के सलाह देते हैं।

चार हिसो में बाटा हुआ है मेहंदीपुर बालाजी

जैसे की हम सब सुनते आए है। की जब हनुमान जी का नाम जपते हैं तो कोई भी भूत प्रेत पास नही आते। तो ऐसे में मंदिर को चार हिस्सों में बाटा गया है। जिसमे पहले दो में भैरव बाबा और बालाजी की मूर्ति स्थित है। वही तीसरी और चौथे हिस्से में आत्माओं के सरदार राज का हिस्सा स्थित है। तो ऐसे में जो भी लोग भूत प्रेत से परेशान होते हैं तो वो इस जगह पर आकर अपने दुखो का निवारण करते है और अपने जीवन को सुखी बनाते हैं। और अपको बता दे की इस हिस्से में लोग काफी दूर दूर से लोग माथा टेकने आते है, और यहाँ आए दिन भीड़ देखने को मिलती रहती है।

साथ ही आपको बता दे की यहां प्रसाद के रूप जल दिया जाता है क्योंकि यहां बालाजी की मूर्ति में बाय तरफ एक छोटा छेद है जिसमे से जल की धारा बहती रहती है इस जल को एक पतीले में इकठ्ठा कर के हनुमान जी के चरणों में अर्पित किया जाता है जिसके बाद वह प्रसाद रूप में आए हुए भक्तो को दिया जाता हैं। और यहाँ की काफी प्रभावित आरती शनिवार और मंगलवार के दिन होती है। जिसमे लोगो की काफी भीड़ देखने को नजर आती हैं।

कैसे स्थापित हुआ मेहंदीपुर बालाजी धाम

वैसे तो इस धाम का इतिहास 100 साल पुराना है, इस धाम के पीछे भी एक ऐसी कहानी है जिसने यहाँ मेहंदीपुर बालाजी मंदिर को स्थापित किया। ऐसा कहा जाता है की एक समय मंदिर के पुराने महंत को बालाजी का सपना आया था। जिस सपने में उन्होंने अपने मंदिर की स्थापना का आदेश दिया था। जिसमे उन्होंने महंत जी को अपने मंदिर को स्थापित करने के बाद उसकी सेवा और पूजा अर्चना का आदेश देते हुए आशीर्वाद दिया था। जिसके बाद इस मंदिर की स्थापना राजस्थान में हुई। और मंदिर में तीन देवी देवताओं की मूर्ति को स्थापित किया गया। जो आज बेहद प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है ।

आज इस मंदिर के अंदर बहुत ही भाव पूर्ण से पूजा अर्चना महंत किशोर पूरी जी के द्वारा की जाती है। जो भक्ति भाव में काफी कड़क और हर नियम का बिलकुल सिद्धांत से पालन करने वाले व्यक्ति है। यह धाम कई तरह की मान्यताओ के लिए प्रसिद्ध हुआ, यहाँ दुष्ट प्रेत आत्माओं से मुक्ति दिलाने के लिए प्रसाद के रूप में लड्डू या इत्यादि का भोग बालाजी पे लगाना होता हैं। जिसके बाद दुष्ट प्रेत आत्मा शांति पाकर व्यक्ति के शरीर को त्यागती है।

Mehandipur Balaji

मंदिर के अंतर्गत और भी प्रसिद्ध मंदिर

मेहंदीपुर बालाजी अपने दृश्य और मान्यता से लोगो को काफी आकर्षित करते हैं लेकिन ऐसे में जब भी व्यक्ति मेहंदीपुर बालाजी दर्शन करने जाता है। तो वह आस पास में स्थित मंदिर के भी दर्शन करता हैं। जैसे की अजंनी माता मंदिर, काली माता मंदिर, गणेश जी का मंदिर इत्यादि।

प्रसाद वे अन्य चीजों से जुड़ी बाते

मेहंदीपुर बालाजी के मंदिर में लोग अपने दुखो का निवारण पाने के लिए आते है। तो ऐसे में कहा जाता है की भोग का प्रसाद जो व्यक्ति खाता हैं उसके दुखो का निवारण हो जाता है। और यह भी कहा जाता है की वहां पर पाए जाने वाले पत्थर से जोड़े का दर्द, सीने के बीमारी व कई अन्य बीमारियो का इलाज होता हैं।

बाला जी मंदिर में प्रवेश करने पर वहा का दृश्य

मंदिर में प्रवेश करने के बाद वहा का दृश्य काफी चौकाने वाला होता हैं, सबसे पहले तो वहा लाए हुए प्रसाद को भोग में चढ़ाया जाता हैं जिसके बाद दर्शन करने होते हैं और दर्शन करते समय वहा आए लोगो को कई तरह के नजारे देखने को मिलते है, जिसमे वहा लोग चिल्ला रहे होते हैं तो कई जोर जोर से बालाजी के नारे लगा रहे होते है तो कई अपने सिर को दीवार पर मार रहे होते है तो कई बैठकर हनुमान चालीसा काफी ऊंची आवाज में पढ़ रहे होते हैं।

मेहंदीपुर बाला जी में कैसे जाए और जाने का सही समय

अगर आप लोग मेहंदीपुर मंदिर में जाने की सोच रहे है तो आप लोग सड़क मार्ग, वायु मार्ग और रेल मार्ग तीनो रास्ते से जा सकते है। जिसमे अगर आप वायु मार्ग चुनते है तो हवाई अड्डा जो राजस्थान में स्थित है। जिससे आप आगे आसानी से दौसा जिले बाला जी धाम पहुंच सकते हैं। अब बात आती है की मंदिर में जाने का सही समय क्या है,

तो ऐसे में यहां पर हनुमान जी के त्योहारों को काफी धूम धाम से मनाया जाता है जैसे की दशहरा, हनुमान जयंती इत्यादि। ऐसे में इन मोहत्स्व पर हनुमान जी की पूजा अर्चना बड़े धूम धाम से की जाती है। तो आप लोग इन त्योहारों के दिनों में भी जा सकते है अगर आप गर्मी में जाने की सोच रहे हैं तो शाम 9 बजे ही दर्शन करे और सर्दियों में सुबह 8 बजे दर्शन करे।

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Siddhi Vinayak Mandir

Siddhi Vinayak Mandir – सिद्धि विनायक मंदिर का इतिहास

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Siddhi Vinayak Mandir – भारत के सबसे धनी मंदिरों की लिस्ट में गिना जाने वाला सिद्धि विनायक मंदिर आज पुरे विश्व भर में प्रसिद्ध है, यहाँ लाखो की संख्या में दूर दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते है , यहाँ आम लोगो के साथ इस मंदिर में नेता, राजनेता और बड़े सितारे यह दर्शन करते हुए नजर आते हैं।

Siddhi Vinayak Mandir

सिद्धि विनायक मंदिर – Siddhi Vinayak Mandir

मुंबई में स्थित सिद्धि विनायक मंदिर, जो गणपति बप्पा को समर्पित है, अक्सर हम सुनते आए है की गणपति बप्पा को विघ्नहर्ता और दुखहर्ता भी कहा जाता है। इसे के चलते लोगो के मन में मान्यता देखने को मिलती और इसी मान्यता के चलते मंदिर में हमेशा बप्पा के दर्शन करने के लिए लोगो की भीड़ देखने को मिलती है। लोग अपनी मनोकामना लेकर और अपने जीवन के दुखो को दूर करते हैं और अपना विश्वास बप्पा में और अटूट करते हैं। इसी तरह हर एक पवित्र स्थान अपने में कुछ खास बातो को समेटे हुए हैं। तो आइए जानते है सिद्धिविनायक की खूबसूरती और उसकी रोचक बातो के बारे में।

सिद्धि विनायक मंदिर 18 नवंबर 1801 में बनवाया गया था। यह निर्माण एक ठेकेदार द्वारा किया गया था, साथ ही इस मंदिर का निर्माण में एक किसान महिला ने अपना योगदान दिया था, अपको बता दे की, ऐसा कहा जाता है की यह किसान महिला की कोई संतान नहीं थी, जिसके चलते यह महिला ने राशि का योगदान देकर मंदिर के निर्माण में कार्य किया था।

सिद्धि विनायक मंदिर की आस्था

जैसे की हमने आपको बताया की इस किसान महिला की कोई संतान न होने के कारण, वह चाहती थी की कोई भी महिला उनके तरह दुखी न हो, जिसके चलते उन्होंने इस मंदिर का निर्माण, इस आस्था से करवाया था की जो भी नया जोड़ा अपनी संतान की मुराद लेकर आएगा। उसकी झोली कभी खाली नही जायेगी। इसी आस्था के चलते जो जोड़ा संतान के सुख से अप्रचित रहते है, वह अपनी मुराद के साथ यहां सच्चे मन से दर्शन करने आते है। और अपनी झोली भर के जाते हैं।

सबसे अमीर मंदिर में से है सिद्धि विनायक मंदिर

सिद्धि विनायक मंदिर को अमीर मंदिरों में से एक मंदिर माना जाता हैं। यहाँ पर हर साल लाखो करोड़ों रुपए की राशि का चढ़ावा चढ़ता हैं। बताया जाता है की मंदिर में हर साल 10 से 15 करोड़ की राशि दान की जाती है।

सिद्धि विनायक मंदिर में दिखाई देगी हनुमान जी की मूर्ति

सिद्धि विनायक मंदिर में हनुमान मूर्ति का भी इतिहास है ऐसा कहा जाता है की जब मंदिर के लिए सड़क चौड़ी की जा रही थी तो उस दौरान पंडित जी को हनुमान जी की मूर्ति मिली थी। जिसके बाद उन्होंने उस मूर्ति को सिद्धिविनायक मंदिर में गणेश जी की मूर्ति के साथ स्थापित किया। आज जो भी लोग यहां बप्पा के दर्शन करने आते हैं वे साथ में हनुमान जी के दर्शन भी जरूर करते है। और अपको बता दे, की सिद्धि विनायक मंदिर मंगलवार की आरती के लिए भी काफी प्रसिद्ध हैं और इस दिन लोगो की काफी लंबी लाइन भी देखने को मिलती हैं।

Siddhi Vinayak Mandir
बप्पा की मूर्ति का दृश्य

यह मंदिर अपने में ही बेहद खास है। जिसके चलते इसकी सुंदरता में बप्पा की मूर्ति चार चांद लगाती है तो ऐसे में बप्पा की मूर्ति में चार हाथ दर्शाए गए है जिसमे एक हाथ में कमल, दूसरे हाथ में कुल्हाड़ी, तीसरे हाथ में लड्डू और और चौथे हाथ में मोतियों की माला। इस मूर्ति को काले पत्थर द्वारा बनाया गया है जो देखने में काफी खूबसूरत और आकर्षित है बप्पा की मूर्ति अपनी पत्नियों रिद्धि सिद्धि द्वारा घिरे हुए दिखाई दे रहे है।

मंदिर जाने का सही समय

अगर आप सिद्धि विनायक मंदिर के दर्शन करने का सोच रहे हैं तो ऐसे में हम आपको बताएंगे की किस मौसम में आप मुंबई जाकर दर्शन कर सकते है, जैसे की हम जानते है की मुंबई का मौसम गर्म रहता है तो ऐसे में आप गर्मी के मौसम में न जाकर, अक्टूबर से फरवरी के मौसम में अवश्य जाएं। जिस दौरान आप बप्पा के दर्शन बिना किसी परेशानी के और अच्छी तरह कर पाएंगे। अब बात आती है यात्रा की बप्पा के मंदिर में यात्रा करने का सही समय दोपहर का है, जिस दौरान वहा भीड़ कम होती है और आप अच्छे से और जल्दी बप्पा के दर्शन कर पाएंगे।

इनके अलावा सिद्धि विनायक मंदिर में नवरात्रि, विनायक चतुर्थी, गुडी पड़वा अक्षय तृतीया, राम नवमी, नाग पंचमी व इत्यादि ऐसे कई त्योहार बड़े धूम धाम से मनाए जाते है, आप लोग इन त्योहारों के दिन भी जाकर दर्शन कर सकते और वहा का आकर्षित नजारा देख सकते हैं।

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Ankor Wat

Ankor Wat Temple – अंकोरवाट मंदिर का इतिहास

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Ankor Wat Temple – हिन्दू धर्म में ऐसे अनेको प्राचीन धार्मिक स्थल और मंदिर मौजूद है , जिसके पीछे कोई न कोई कहानी जुड़ी हुई है और लोगो की आस्था और विश्वास इनसे बना हुआ है । आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएंगे जिसको विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल माना जाता हैं।जो दुनिया के साथ अजुबो के बाद सबसे आश्चर्यचकित रचना है।

Ankor Wat

कहाँ है अंकोरवाट मंदिर

अंकोरवाट मंदिर जो दक्षिण एशिया में कबोडिया देश में स्थित है। जो भारत से लगभग 4500 किलोमीटर की दूरी पर है । जो शुरू में हिंदू धार्मिक स्थल था जहा हिंदू लोगो का आना जाना था। जिसके बाद इस मंदिर को कबोडिया की राजधानी अंगकोर पर बुद्ध शासन के चलते इसे बुद्ध मंदिर का रूप दिया गया। जिसके बाद इसमें हिंदू और बुद्ध भगवान की मूर्तिया देखने को मिलती है, कहा जाता है की यह मंदिर भगवान विष्णु जी को समर्पित है।

अंकोरवाट मंदिर का निर्माण

इस मंदिर का इतिहास जिस तरह से अनोखा है उसी तरह से इस मंदिर का निर्माण और अंदर का दृश्य भी अनोखे तरह से किया गया है। कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण सौ लाख रेत के पत्थरों से किया गया, जिसमे प्रतेक पत्थर का वजन डेढ़ से दो टन का था। और इसी अनोखे दृश्य के चलते यह मंदिर इतना प्रचलित हुआ की इसे वर्ड गिन्नीज बुक में शामिल किया गया,

इसकी इमारत को यूनेस्को 1992 में वर्ल्ड हेरिटेज ने शामिल किया था। साथ ही साथ अमेरिका के मैगजीन ने इस मंदिर को विश्व का आश्चर्य जनक स्थलों में शामिल किया। जिसके बाद यह मंदिर काफी प्रसिद्ध हुआ और जहाँ लाखो की संख्या में लोग घूमने और वहा दर्शन करने जाते हैं।

अंगाकोर वाट मंदिर का इतिहास

कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण 12 वी सदी में हुआ था और इसका निर्माण हिंदू धर्म के राजा सूर्यवान जो विष्णु के भक्त थे उनके द्वारा किया गया था। इस मंदिर का निर्माण हिंदू धर्म के मंदिर से काफी सामान्य था जिसमे कई तरह की दीवारों पे नकाशी के द्वारा जीवन के बारे में बताया गया। इस मंदिर के चारो और खाई है। जो लगभग 650 फीट चौड़ी है, और 36 फीट चौडा पत्थर का रास्ता है ।

Ankor Wat

अंकोरवाट मंदिर के अंदर की कला

अंकोरवाट मंदिर की कला पूरी हिंदू धर्म को दर्शाती है जिसके चलते लोगो को हिंदू धर्म और पौराणिक कथाओं की काफी जानकारी भी है। ऐसे में जब आप अंगकोर वाट मंदिर में प्रवेश करते हैं। तो आपको दीवार पे रामायण और महाभारत के दृश्यों को दर्शाती है। जिसमे महाभारत और रामायण की पौराणिक कथाओं का वर्णन है और अलग अलग तरह की कला के द्वारा चित्रकारी कर रखी हैं।

अपको बता दे, की यह मंदिर चारो ओर पानी से घिरा हुआ है। जिसका दृश्य काफी खूबसूरत है यहाँ लोगो को मन की शांति मिलती है व साथ ही साथ यहाँ आए पर्यटकों को भगवान विष्णु जी के साथ भगवान ब्रह्मा, शिव जी के दर्शन करने को मिलते है।

मंदिर घूमने का सही समय

अगर आप लोग अंकोरवाट घूमने का सोच रहे है तो ऐसे में बाते आती की किस मौसम में अंगकोर घूमने जाना सही रहेगा समय है। तो ऐसे में आप लोग नवंबर से लेकर मार्च तक जा सकते है। इस दौरान गर्मी कम होने की वजह से और बारिश न होने की वजह से आप अंकोरवाट को अच्छी तरह घूम सकते है।

और अपको बता दे की, अंकोर मंदिर जिस देश में है वह ज्यादातर गर्म ही रहता है। तो आप इस दौरान ऐसे कपड़े ही पहने जो न ज्यादा छोटे हो और न ही ज्यादा गर्म। जिस कारण आप मंदिर को बिना किसी परेशानी के अंकोर मंदिर को अच्छी तरह घूम सकते हैं।

विदेश से आने वाले पर्यटक कैसे प्रवेश करे अंकोर मंदिर में

जैसे की हम सब जानते है अंगकोर मंदिर विश्व का सबसे बड़ा मंदिर है जिसको देखने दूर दूर से लोगो का आना जाना लगा रहता है। तो ऐसे में विदेश से आने वाले पर्यटकों को अंगकोर मंदिर में पास लेकर ही प्रवेश करना होता है और यह पास टिकट अधिकारी ऑफिस से ही प्राप्त किया जा सकता है। और इस पास और टिकट के लिए पैसा देना अनिवार्य होता है जो या तो रुपए के रूप में होगा या डॉलर के रूप में। जिसके बाद हम अंकोर मंदिर में प्रवेश कर उसको अच्छी तरह घूम सकते हैं।

अंकोरवाट मंदिर के आस पास भारतीय रेस्ट्रोरेन्ट

भारत से आए पर्यटक को वहा अपने भोजन के लिए काफी कड़ी मशकत नही करनी पड़ती। भारतीय पर्यटकों को वहा आसानी से भारतीय भोजनालय मिल जाते है जहा भारतीय भोजन के अलग अलग मनोरंजक भोजन होते है।

जो भारतीय लोगो की भूख को मिटाते है। वही अपको अंकोर मंदिर से थोड़ा दूर अंकोर इंडियन रेस्ट्रोरेन्ट (Angkor Indian Resturant) दिखाई देगा, जिसमे आपकी भारत के भोजन की कई वैरायटी मिलेगी। यह होटल सुबह के 7:00 बजे से शाम 4:00 बजे तक खुला रहता है।

भारत से कंबोडिया देश कैसे पहुंचे

भारत से जाने वाले पर्यटकों को बाय एयर जाने के लिए भारत से दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बैंगलोर से फ्लाइट ले सकते है जिसके बाद यह फ्लाइट कंबोडिया के फनोम पेन्ह इंटरनेशनल एयरपोर्ट या सीएम इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर फ्लाइट लैंड करती है जिसके बाद आप कंबोडिया के लिए किसी भी बस या कैब के द्वारा अंकोर मंदिर तक पहुंच सकते हैं। और वहा का आनंद उठा सकते है।

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10.Konark Sun Temple – कोणार्क सूर्य मंदिर

Iskon Temple

Iskon Temple – इस्कॉन मंदिर का उद्देश्य

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Iskon Temple – हिन्दू धर्म कई भगवानों में विश्वास रखता हैं जिसके चलते अनेको ऐसी कहानियां और रोचक बाते है जो भगवान के प्रति हमारा अटूट विश्वास जागरूक करती हैं। ऐसे में हमारे हिंदू धर्म के कई लोग भगवान कृष्ण जी को बहुत ज्यादा मानते है। क्योंकि हमने बचपन से श्री कृष्ण जी की नटखट शैतानी और उनकी लीला के बारे में बहुत कुछ सुना और देखा है। ऐसे में आज हम आपको भगवान कृष्ण जी का एक तीर्थ स्थान मंदिर बताएंगे जो देश के साथ विदेश में भी लोगो को अपनी और आकर्षित करता है।

Iskon Temple

कहाँ है इस्कॉन टेम्पल

इस मंदिर के बारे में तो आपने सुना ही होगा, जो उत्तर प्रदेश (Uttar pradesh) राज्य के मथुरा (Mathura ) शहर के वृंदावन (Vrindavan) में स्थित है। जो भारत के अलावा कई अन्य देशो में भी स्थित है और जहाँ लोग अपनी मुराद लेकर श्री कृष्ण जी के दर्शन करने जाते हैं। ऐसे में इस्कॉन मंदिर की काफी मान्यता होने के कारण, लोग को इस मंदिर में आध्यात्मिक रास्ते पर चलने की सीख दी जाती है।

व साथ ही साथ जीवन जीना का सही तरीका भी सिखाया जाता है। इस मंदिर की स्थापना 1966 में विदेश में श्री कृष्ण जी के भक्त प्रभुपाद ने की थी। जिसके बाद उन्होंने इस मंदिर को विदेश के साथ भारत में भी स्थापित किया। इस्कॉन मंदिर को एक बेहद ही रूपी रूप में बनवाया गया है। जो एक खूबसूरती का अनोखा दृश्य है।

कैसे स्थापित हुआ था इस्कॉन टेम्पल

स्वामी प्रभुपाद जी के गुरु जो चाहते थे, की कृष्ण भक्ति की लीला देश के साथ विदेश में भी अंग्रेजी भाषा में प्रचलित की जाए। जिसके बाद प्रभुपाद जी ने अपने स्वामी का कहा मानते हुए, अपने सफर की और निकल पड़े थे और उन्होंने आध्यात्मिक कृष्ण कथाओं को अंग्रेजी में विवरण कर वहा के लोगो को काफी आकर्षित किया, जिसके चलते पहला इस्कॉन मंदिर न्यूयॉर्क में बनाया गया। जिसके पश्चात स्वामी प्रभुपाद जी का उनकी प्रसिद्ध नगरी मथुरा में निधन हो गया। जिसके बाद इस्कॉन मंदिर का इतिहास और उसके लेकर मान्यता, लोगो के मन में काफी जागरूक हुई।

इस्कॉन मंदिर के सिद्धांत

पूरी दुनिया में 400 मंदिरों में फैला इस्कॉन मंदिर , जिसको इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कांशसनेस ( “International Society for Krishna Consciousness”) है। जिसकी फुल फॉर्म अंग्रेजी शब्दों से ली गई थी। इस्कॉन मंदिर का निर्माण प्रभुपाद जी ने कृष्ण लीला को दुनिया भर में फैलाने के लिए किया था। जिसके बाद लोगो के मन में काफी जागरूकता शुरू होने लगी और लोगो को इस मंदिर में आकर एक शांति का एहसास होने लगा। कहा जाता है की जो भी व्यक्ति अपने जीवन को सरल और सुखी बनाना चाहता हैं उसे इस्कॉन मंदिर में आकर जीवन व्यतीत कर चार नियम का पालन करना होता है – तप , दया, सत्य, और मन की शुद्धता

Iskon Temple

इस्कॉन टेम्पल के कुछ नियम

हम सब जानते है धार्मिक स्थानों पे हर तरह के नियम का पालन किया जाता हैं। क्युकी ऐसी जगह पर हर काम नियम के अनुसार पूर्ण किया जाता है।

जैसे की हमने आपको बताया की इस्कॉन मंदिर में आध्यात्मिक जीवन से परिचय करवाया जाता है जिसके चलते वह रह रहे मनुष्य को कुछ बातो का बेहद ध्यान रखना होता हैं।

  1. पहला नियम इस्कॉन का यहाँ रह रहे लोगो को तामसिक भोजन का त्याग कर एक सरल भोजन को अपनाना होता है जैसे की प्याज, लहसुन, मास, मदिरा इन सब का त्याग करना होता हैं।

2. ऐसे माहौल से दूर रहना होता है, जिनका तालुक जुआ, मदिरा और इत्यादि से होता हैं।

3. इस्कॉन में मनुष्य को हर रोज एक घंटा शास्त्र अध्यन में बिताना होता है। जिसमे हमे आध्यात्मिक और भारत के इतिहास की जानकारी के साथ शास्त्रों का अध्यन करवाया जाता हैं।

  1. साथ ही इस्कॉन में मनुष्य को हर रोज वहा का प्रमुख भजन “हरे कृष्ण हरे रामा”) ९ की माला को 16 बार जपना होता है।
भारत के कुछ प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर

आज लोगो के मन में इस्कॉन मंदिर को लेकर एक ऐसी मान्यता बन हो चुकी हैं। की दूर दूर से लोग इस मंदिर में कृष्ण राधा के दर्शन और अंदर की गई सुंदर नकाशी और उसकी खूबसूरती को देखने आते हैं। ऐसे में भारत में बने कई इस्कॉन मंदिर जो आज बेहद प्रसिद्ध और मान्यता हासिल कर चुके है। तो आइए जाने प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर के बारे में।

1.प्रसिद्ध दिल्ली इस्कॉन मंदिर

भारत में बना इस्कॉन मंदिर जो दिल्ली हरी कृष्ण हिल्स नेहरू प्लेस में स्थापित है जिसका उद्घाटन भारत के पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपाई द्वारा किया गया था। जहाँ आज लाखो संख्या में लोग इस्कॉन के वातारण और मंदिर के अंदर का दृश्य देखने दूर दूर से आते हैं।

प्रसिद्ध मथुरा, वृंदावन इस्कॉन मंदिर

मथुरा, वृंदावन तो श्री कृष्ण का बचपन का स्थान है और साथ ही साथ प्रभुपाद जी का काफी प्रिय नगरी भी है, तो यहाँ पर इस्कॉन मंदिर का होना तो लाजमी ही हैं इसी कारण से मथुरा, वृंदावन में होने पर यह मंदिर काफी प्रसिद्ध और शांत हैं।

प्रसिद्ध जयपुर, इस्कॉन मंदिर

भारत का एक और प्रसिद्ध मंदिर जो श्री कृष्ण और उनके भाई बलराम के प्रेम पर समर्पित है जिसको श्री गिरिधारी दाऊजी मंदिर’ के रूप में जाना जाता है, मानसरोवर, जयपुर में स्थित इस्कॉन मंदिर। यहां की मूर्तियां और चित्र आपका दिल जीत लेंगे।

प्रसिद्ध मुंबई, इस्कॉन मंदिर

श्री राधा रासबिहारी जी’ मंदिर के रूप में जाना जाता है, मुंबई के जुहू में स्थित इस्कॉन मंदिर। यह 4 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। यह मंदिर कही भक्तो से भरा रहता है, जिस कारण यह बेहद लोगो का अलग अलग जगह से आना जाना साल भर लगा रहता हैं।

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Golden Temple

Golden Temple – स्वर्ण मंदिर का इतिहास

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Golden Temple – भारत में कई ऐसे मन्दिर और गुरद्वारे मौजूद है। जो अलग अलग धर्मो का प्रतीक है। जिनका दृश्य किसी खजाने से कम नहीं है। और इसी तरह भारत में कई धर्मो के लोग एक दूसरे के साथ मिल कर रहते है। ऐसे में सिखो का प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर जो सिखो के साथ–साथ सभी धर्मो का प्रतीक है जहाँ हर तरह के लोग अपनी मनोकामना लेकर स्वर्ण मंदिर में माथा टेकने जाते है।

Golden Temple

कहाँ है स्वर्ण मंदिर

स्वर्ण मंदिर जो सिखो के धर्म का प्रतीक है यह मंदिर पंजाब (Punjab) राज्य के अमृतसर (Amritsar) में स्थित श्री हरमिंदर साहिब के नाम से भी जाना जाता है। अपको बता दे की यह मंदिर सोने (Gold ) से बना हुआ है जो खुद में ही एक आकर्षित दृश्य है। यह एक ऐसा पवित्र स्थल है जिसने अपने अंदर खूबसूरती को समेटा हुआ है। अगर हम अंदर से स्वर्ण मंदिर को देखते है तो हमे दीवार पे की हुई कई तरह की नकाशी दिखाई देती है ।

स्वर्ण मंदिर का इतिहास – Golden Temple

ऐसा कहा जाता है की यह स्वर्ण मंदिर 400 वर्ष पुराना है जिसका निर्माण सिखो के चौथे गुरु ने शुरुवात की थी जिसके बाद गुरु नानक और उनके पांचवे गुरु श्री अर्जुन देव जी ने 1577 में उनका पूर्ण रूप से निर्माण किया था। जिसके बाद इसे एक पूर्ण रूप में पक्का किया गया और जिसके बाद इसका निर्माण तालाब के बीच में किया गया। ऐसा कहा जाता है की जो भी श्रद्धालु मंदिर में आते है वह पहले तालाब में नहाते है। क्योंकि पौराणिक कथा के अनुसार इस तालाब में नहाने से कई तरह के रोग से मुक्ति मिलती है और पापों का नाश होता है जिसके बाद गुरु ग्रंथ साहिब जी को स्थापित किया गया।

अपको बता दे, की इस मंदिर का निर्माण सुरक्षित रूप से पूरा किया गया था। लेकिन इस मंदिर पर कई बार कई आक्रमण किए गए। जिसकी वजह से मंदिर पूरे रूप से नष्ट हो गया था। जिसके बाद भगवान में आस्था की वजह से और लोगो के अटूट विश्वास से इस मंदिर का दुबारा एक सुंदर रूप में निर्माण किया गया। जहाँ आज उसी अटूट विश्वास से लाखो की संख्या में लोग मंदिर के सुंदर दृश्य को देखने के लिए दूर–दूर से आते हैं।

किस तरह हुआ मंदिर का निर्माण

जैसे की हमने आपको बताया की मंदिर को एक बड़े सरोवर के बीच बनाया गया है जिसको रात के समय में देखना बहुत आकर्षित लागत है। ऐसे ही इस मंदिर के अंदर का निर्माण भी बेहद खूबसूरत है अपको बता दे की इस मंदिर के दीवारों का निर्माण एक बहुत सुंदर नकाशी से किया गया है इसके चार द्वार है जिन्हे लोग देखने के लिए आते है। इस मंदिर की इमारत तीन मंजिला है। जिसमे ऊपरी हिस्सा सोने से बना हुआ है।

Golden Temple

सबसे बड़ा लंगर

अमृतसर स्वर्ण मंदिर में लाखो लोग माथा टेकने आते है। जहाँ लोगो को अच्छी तरह से लंगर खिलाया जाता है। ऐसा कहा जाता है की अमृतसर गुरदवारे में दुनिया का सबसे बड़ा लंगर होता है। जहाँ करीबन एक दिन में लाखो लोगो को लंगर खिलाया जाता है। और रोजाना संगत को देखते हुए दिन में 2 लाख से भी अधिक रोटियां बनाई जाती है। लेकिन आपको बता दे की, इस मंदिर में थाली में भोज को छोड़ना उनके लिए बेकद्री होती हैं जिस कारण लोगो को उतना ही खाना लेना चाहिए। जितनी उन्हे भूख हो।

स्वर्ण मंदिर में अनुरोध है इन बातो का
  1. गुरुद्वारे में जाने से पहले जूते चपलो को बाहर उतार कर ही अंदर जाना होता है।
  2. गुरुद्वारे में प्रवेश करने से पहले हमे अपने सिर को रुमाल, दुपट्टा, स्कार्फ से ढकना जरूरी है।
  3. गुरुद्वारे में कैप्री या कोई भी छोटे कपड़े डाल के जाना सख्त मना है।
  4. यह आए श्रद्धालु को अपने साथ किसी भी तरह का शराब, सिगरेट और ड्रग्स इत्यादि लाना माना हैं।
  5. गुरुद्वारे में आए श्रद्धालु को अन्य प्रकार की फोटो या सेल्फी लेना माना हैं।
  6. गुरुद्वारे में आए श्रद्धालु को अंदर दरबार साहिब के अंदर चल रही गुरुबाणी को नीचे बैठ कर ही सुनना होता है। क्योंकि ऐसी मान्यता है की नीचे बैठ कर गुरुबाणी को सुनना गुरु ग्रंथ साहिब जी को सम्मान देने का तरीका है।
कैसे पहुंचे अमृतसर स्वर्ण मंदिर

अमृतसर स्वर्ण मंदिर में बाय रोड और ट्रेन से रास्ता भी उपलब्ध है। जिसमे करीबन 9 घंटे का समय लगता है। अब अमृतसर जाने के लिए बाय प्लेन भी रास्ता उपलब्ध है जिसमे करीबन 1 घंटे के सफर को तेय हम अमृतसर स्वर्ण मंदिर में जा सकते है।

कौनसा सही समय ही अमृतसर स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने का

स्वर्ण मंदिर में दर्शन करने के लिए हर रोज लंबी लाइन का सामना करना पड़ता है। क्योंकि मंदिर में लाखो लोगो की कगार में माथा टेकने आते है। जिस स्थिति में लोगो को मंदिर में दर्शन करने के लिए लंबी लाइन में खड़ा होना पड़ता है ऐसी में अगर आप लाइन से बचना चाहते हैं तो आप सुबह के चार बजे स्वर्ण मंदिर में माथा टेक सकते ।

जिसके दौरान लाइन बेहद कम होती और नंबर भी जल्दी आता है। और रही बात वीकेंड पर स्वर्ण मंदिर में जाकर दर्शन करने का । ऐसे समय पर अपको सुबह शाम काफी लंबी लाइन देखने को ही मिलेगी। तो ज्यादातर लोगो वीकेंड को छोड़ आगे पीछे के दिन में दर्शन कर सकते हैं। जिसे आप लाइन से बच कर जल्दी दर्शन कर सकते हैं।

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    vaishno devi

    Vaishno Devi – वैष्णो देवी माता मंदिर का इतिहास

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    Vaishno Devi – हमारे भारत में बहुत से देवी देवताओ को पूजा जाता है , जिनके मंदिर भारत के कोने कोने में बने हुए है, लोग मन में श्रद्धा और विश्वास लिए इन तीर्थ स्थानों के दर्शन करने आते है, आज एक ऐसे ही तीर्थ स्थान के बारे में बताएंगे , जहा माता शेरावाली का वास है जिसके दर्शन करने के लिए लोग कई किलोमीटर चढ़ाई कर अपनी मनोकामना लेकर मां के दर्शन करने जाते है।

    Vaishno Devi

    वैष्णो देवी माता मंदिर – Vaishno Devi Temple

    कहा जाता है की माता वैष्णो देवी ने त्रेता युग में मनुष्य का कल्याण करने के लिए माता पार्वती , माता लक्ष्मी और माता सरस्वती का रूप लेकर एक सुंदर राजकुमारी का जन्म लिया था। जिसके बाद उन्होंने मनुष्य के कल्याण के लिए तपस्या की। आज लोगो के अंदर माता वैष्णो देवी को लेकर मान्यता है और उनके दर्शन के लिए लाखो की संख्या में दूर–दूर से लोग दर्शन करने आती हैं।

    कहाँ स्थित है माता वैष्णो देवी मंदिर

    एक ऊंचे पर्वत पर स्थित मां वैष्णवी देवी का मंदिर जो करीबन 5200 फीट की ऊंचाई पर स्थित जम्मू और कटरा में स्थित है। यह मंदिर में हर साल श्रद्धालु आते है और माता की चढ़ाई जो 13 किलोमीटर की दूरी पर है और उनके दर्शन करते है, चढ़ाई के साथ साथ यह कई सारे साधन है जिसके द्वारा मां वैष्णवी के मंदिर में पहुंचा जा सकता है जैसे की हेलीकॉप्टर व पालकी की सुविधा, भी उपलब्ध है। कहा जाता है की माता रानी का मंदिर एक गुफा में स्थित है जहा मां तीन रूप में निवास करती है जिसमे से एक महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली ।

    कैसे शुरू होती है माता वैष्णवी मंदिर की चढ़ाई

    अक्सर ज्यादातर लोगो को रात में ही चढ़ाई करना काफी पसंद है। क्योंकि अधिकतर लोग रात में इसलिए चढ़ाई करते है क्योंकि मां वैष्णवी का दरबार रात को काफी सुंदर लगता है और चढ़ाई करते वक्त पहाड़ों का दृश्य काफी सुंदर और देखने लायक होता हैं। लोगो बड़े जोश में माता की चढ़ाई एक सुंदर भजन के साथ करते “चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है जोर से बोलो जय माता की”।

    उस समय लोगो का जोश काफी देखने लायक होता हैं। अपको बता दे की यात्रा की शुरुवात पर्ची लेकर करनी पड़ती। जहाँ पहला चेक प्वाइंट बाण गंगा है। जहाँ पर समान की चेकिंग करवा कर आगे की चढ़ाई की शुरुवात करते है। अगर जो लोग माता वैष्णवी की मंदिर की कठिन चढ़ाई नही कर सकते। तो पहले चेकप्वाइंट से हम पालकी, और कई अन्य सुविधा उपलब्ध हैं। जिसके द्वारा हम अपनी चढ़ाई को आसान कर मंदिर तक पहुंचने का आनंद उठा सकते हैं।

    vaishno devi

    कैसे खोज हुई माता के मंदिर की

    पौराणिक कथाओं के अनुसार वैष्णवी देवी मंदिर का निर्माण 700 वर्ष पहले ही एक पुजारी के हाथो हो चुका था। ऐसा कहा जाता है की एक श्रीधर पुजारी जिन्होंने इस गुफा को ढूंढ कर उसकी पूजा की शुरुवात की थी। श्रीधर पुजारी जो काफी गरीब थे। जिनके सपने में मां वैष्णवी ने आकर उन्हे भंडारा आयोजित करने को कहा। जिसके बाद श्रीधर पुजारी ने वो भंडारा आयोजित किया और आस पास के लोगो को भंडारे का न्योता दिया। जैसे जैसे भंडारे का दिन पास आया वैसे वैसे पुजारी परेशान हो गए थे जिसके बाद वहा पर एक लड़की आई।

    जिन्होंने अपना नाम वैष्णवी बताया। जिन्होंने भंडारे में लोगो को खाना परोसा। और देखते ही देखते लोगो की भारी संख्या में सारा भंडारा पूर्ण हो गया। जिसके बाद श्रीधर पुजारी ने उस लड़की को काफी ढूंढा और पता किया। लेकिन उस लड़की वैष्णवी के बारे में कुछ पता नहीं चला। और कुछ समय पश्चात मां वैष्णवी श्रीधर के सपने में आकर अपने बारे में बताया। और अपनी गुफा के बारे में बताया। जिसके बाद श्रीधर पुजारी ने उस गुफा की तलाश की और वहा माता वैष्णवी गुफा के मंदिर की पूजा की और तब से माता वैष्णवी के मंदिर का इतिहास चलता आ रहा है।

    ऐसी ही भगवान में श्रद्धा के कारण भारत आज ऐसी कई कहानियों से प्रसिद्ध है जिनको सुन कर लोगो को उनके प्रति अटूट विश्वास होता है। और उनके दर पर माथा टेक अपने दुख दूर करते हैं।

    माता वैष्णवी देवी के मंदिर की रोचक बाते
    1. माता वैष्णवी ने भैरव का वध कर उनका सर काट दिया था। जिसके बाद भैरव बाबा का कटा सिर 25 किलोमीटर दूर जाकर गिरा। उसके पश्चात भैरव बाबा ने मां वैष्णवी से माफी मांग और अपनी मुक्ति की पुकार लगाई। जिसके बाद मां वैष्णवी ने भैरव बाबा को मुक्ति देने के लिए वरदान दिया जो भी भक्त उनके दरबार में माथा टेकने आयेगा । वे बाबा भैरव के दर्शन अवश्य करेगा। जिससे बाबा भैरव को मुक्ति मिलेगी।
    2. ऐसा कहा जाता है। की मां वैष्णवी देवी को राम भगवान द्वारा समस्त संसार की पूजा का वरदान मिला था। क्योंकि जब राम भगवान सीता माता की खोज में नदी किनारे आए थे तो वहा मां वैष्णवी देवी ने बालिका के रूप में राम भगवान को अपने रूप में स्वीकार किया। जिसके बाद जब उन्होंने राम भगवान को बताया की वह उनको अपना पति मान चुकी है। लेकिन राम भगवान ने यह अस्वीकार करते हुए। कलयुग में उनके पति बनने का वादा किया।

    कैसे पहुंच सकते है मां वैष्णवी के दरबार।

    माता वैष्णवी देवी के मंदिर पहुंचने के लिए सड़क सुविधा भी उपलब्ध है। और साथ ही साथ हम ट्रेन से भी माता वैष्णवी के मंदिर पहुंच सकते है। लेकिन ट्रेन पे जाने वाले श्रद्धालु को जम्मू से उतर कर कटरा की ट्रेन ले कर। मां वैष्णवी के दरबार कटरा पहुंचा जाता हैं।

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    Jagannath Temple

    Jagannath Temple – जगन्नाथ मंदिर का इतिहास

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    Jagannath Temple – हम सबने भारत के चार धामों के बारे में तो सुना ही है । क्योंकि हमने देखा और सुना हैं की जब व्यक्ति अपने जीवन की सारी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता हैं तो वह चार धाम की यात्रा कर अपने बचे जीवन को सुखी बनाना चाहता हैं। ऐसे ही इन चारो धामों में से एक धाम जगन्नाथ धाम, जो भगवान कृष्ण जी को समर्पित है। अपको बता दे की यह धाम भी बहुत सी रोचक बातो को अपने अंदर समेटे बैठा हैं। और यहाँ आज लाखो की संख्या में लोग दर्शन करने के लिए आते हैं। तो आइए जानते है जगन्नाथ धाम के बारे में।

    Jagannath Temple

    कहाँ है जगन्नाथ मंदिर

    जगन्नाथ धाम जो ओडिसा (Odisha ) राज्य के जिले पूरी में समुंदरी तट पर स्थित है पूरी स्थान पर स्थित होने के कारण पूरे क्षेत्र को जगन्नाथ पुरी भी कहा जाता है। यह धाम कृष्ण जी का धाम है। और जगन्नाथ नाम भगवान श्री कृष्ण जी के नामो में से एक नाम है जो दो शब्दो जगन+ नाथ से मिलकर बना है।

    जिसका अर्थ है जगन यानी “जग” और नाथ यानी “स्वामी” यानी जग का स्वामी। पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है, की इस मंदिर में भगवान कृष्ण और उनके श्रेष्ठ बलवान भाई बलराम और उनकी बहन सुभद्रा शाम के समय यह विश्राम करने आते है। और पुराणों के अनुसार इस धाम को वेखुंठ धाम भी कहा गया है ।

    जगन्नाथ मंदिर का इतिहास

    पौराणिक कहानी के अनुसार जगन्नाथ मंदिर के पीछे एक ऐसा रहस्य है की श्री कृष्ण जी ने कलयुग में जन्म लिया था उसके बाद उन्होंने वह जगन्नाथ मंदिर में विराजमान हुए थे। ऐसा कहा जाता है की माता यशोदा, माता देवकी व सुभद्रा सभी रानियाँ द्वारिका से वृंदावन आई। जिसके बाद सभी रानियाँ भगवान कृष्ण जी की बाल लीलाओं की कहानी सुनने के लिए माता यशोदा से आग्रह करने लगी। जिसके बाद यशोदा मैया ने कहानियां प्रारंभ की और सुभद्रा को कक्ष के बाहर खड़े रहने का आग्रह किया।

    माता यशोदा का कहना था की जब तक वह कहानियां सुना रही तब तक तुम कक्ष के बाहर रह कर किसी को अंदर नहीं आने मत देना । जैसे ही श्री कृष्ण की बाल कहानियों का प्रारंभ हुआ तो सुभद्रा भी उन कहानियों में मगन हो गई और कक्ष छोड़ अंदर आ गई। जिसके बाद कृष्ण और बलराम उस कक्ष में आकर अपनी कहानियां सुनने लगे।

    यह सब देख नारायण जी भी कक्ष में आकर कहानी सुनने लगे। जिसके बाद नारायण जी श्री कृष्ण जी का बाल रूप देख, उनसे प्रश्न पूछने लगे की प्रभु आप बाल रूप में अति सुंदर दिख रहे है इस रूप में आप फिर कब जन्म लेंगे । ऐसा कहने पर श्री कृष्ण जी ने नारायण जी से कहा की, वो अब कलयुग में जन्म लेंगे जहा उन्हे यह रूप देखने को मिलेगा।

    मंदिर की मूर्ति की स्थापना

    मालवा के तेजस्वी राजा को भगवान जगन्नाथ ने अपनी मूर्ति स्थापित करने का मौका दिया। ऐसा हमने इसलिए कहा की, मालवा के राजा इंद्र्युम्न के सपने में आए जगन्नाथ भगवान ने अपनी छुपी हुई मूर्ति का रहस्य बताया और आग्रह किया की वे वहा से मूर्ति ला कर एक मंदिर बनवा कर उसमे स्थापित कर दे। जैसे ही अगली सुबह हुई तो राजा ने अपने चतुर ब्राह्मण विद्यापति के साथ सैनिकों को मूर्ति लाने के लिए भेज दिया।

    और आपको बता दे की मूर्ति को सबर कबीले के लोगो ने नीलचलन पर्वत की गुफा में छुपा रखा था और वह उसे अपना श्रेष्ठ मान कर नीलमाधव की पूजा करते थे। नीलमधव उसी मूर्ति को कहा जाता है। जब यह बात विद्यापति को पता चली तो उन्होंने बड़ी चतुराई से मुखिया की बेटी संग विवाह रचा लिया।

    जिसके बाद वह अपनी पत्नी संग उस मूर्ति तक पहुंचे और उससे वहा से चुरा कर राजा को सौप दिया। मूर्ति चोरी होने के बाद कबीले के मुखिया काफी उदास हो गए। जिसके बाद भगवान अपने भक्त को उदास नहीं देख सके और वापिस उस गुफा में मूर्ति के रूप में प्रकट हो गए।

    लेकिन उन्हें अपने दोनो वादे को निभाना था एक की उन्होंने कलयुग में जन्म लेना था दूसरा वह राजा के आए सपने में अपने वादे को पूरा कर चाहते थे। जिसके बाद राजा ने अपने सपने को पूरा करने के लिए एक भवर मंदिर बनाया और भगवान जगन्नाथ जी से उसमे विराजमान होने को कहा।

    लेकिन भगवान जगन्नाथ जी ने राजा से कहा की तुम मेरी मूर्ति बनवाने के लिए समुंदर में से कटा हुआ पेड़ जो द्वारिका से पूरी की और आ रहा हो वे लेकर आओ। जिसके बाद राजा ने अपने सैनिकों को आदेश दिया लेकिन वो उस कटे हुए पेड़ को लाने में नाकामयाब रहे।

    Jagannath Temple

    उसी दौरान राजा को समझ आ गया था की उन्हे कबीले के लोग और मुखिया की सह्यता लेनी पड़ेगी। जिसके बाद वह कामयाब हुए और मूर्ति के लिए कारीगर ढूंढा गया। लेकिन कोई भी उस कार्य में सफल नहीं हुआ और उस वक्त एक बूढ़ा आदमी आया, ऐसा कहा जाता है की वो बूढ़ा आदमी खुद भगवान जगन्नाथ का अवतार था। जिसके बाद उस बूढ़े आदमी ने कहा मैं मूर्ति तो बना दूंगा लेकिन इसके लिए मुझे 21 दिन का समय चाहिए और जब मैं मूर्ति बनाओ तो मेरे निकट कोई भी न हो।

    ऐसे में कई दिनों तक मूर्ति बनाने की आवाज़ आती रही। लेकिन एक दिन आवाज आनी बंद हो गई और राजा ने सोचा की कही मूर्तिकार अंदर मर तो नही गया । जिस पश्चात राजा ने वो कक्ष खोल दिया और वहा कोई दिखाई न देते हुए अधूरी बनी हुई मूर्तियां रखी देखी। जिसमे राजा ने भगवान जगन्नाथ की इच्छा मानते हुए ऐसे ही उन मूर्तियों को बनाए हुए भवर मंदिर में स्थापित कर दिया। और इसी तरह स्थापित हुआ जगन्नाथ मंदिर।

    मंदिर की कुछ रोचक बाते

    जगन्नाथ मंदिर भी अपने अंदर कही रोचक बाते समेटा हुआ है। जिसके बारे में हम आपको बताएंगे की किस तरह लोग ऐसे दृश्य की ओर आकर्षित हो कर जगन्नाथ धाम की यात्रा कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं। अपको बता दे की ।

    1. इस मंदिर से हर साल एक ऐसी शोभा यात्रा निकाली जाती है जो बड़े ही धूम धाम से एक त्यौहार की तरह बनाई जाती है इस शोभा यात्रा में भगवान कृष्ण उनके भाई बलराम और उनकी बहन सुभद्रा का रथ तैयार कर उन्हे पूरे पूरी का भ्रमण कराया जाता है।
    2. जगन्नाथ मंदिर के ऊपर एक सुदर्शन चक्र है। और इस सुदर्शन चक्र की सबसे खास बात यह है की आप इस चक्र को जिस भी दिशा से देखेंगे अपको अपने उतने ही करीब और सीधा दिखाई देगा।
    3. सबसे खास बात यह है की इस मंदिर के अंदर बहुत बड़ा रसोइया घर है जिसमे 500 लोगो की सहयता के साथ भोजन बनाते है और रथ यात्रा के दौरान 2500 से भी अधिक लोगों के लिए भोजन तैयार किया जाता हैं। और जगन्नाथ भगवान के आशीर्वाद के कारण भोजन में कभी कटौती नहीं आती। इसी प्रकार यह मंदिर बहुत ही खास और धामों का पवित्र धाम माना गया। जहाँ बहुत से श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए जाते हैं।

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    Badrinath Temple

    Badrinath Temple – बद्रीनाथ मंदिर का इतिहास

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    Badrinath Temple – भारत के चार धामों में से एक धाम है बद्रीनाथ धाम। जिसकी महिमा अपरम्पार है, जहा लोगो का मानना हैं की बद्रीनाथ की यात्रा के बिना बाकी तीन धामों की यात्रा असफल होती है यह इतिहास का अनोखा मंदिर है जहा भक्त जन की श्रद्धा से लाखो की संख्या में श्रद्धालु माथा टेकने आते हैं और अपने जीवन में आए दुखो का निवारण के लिए प्रार्थना करते हैं। बद्रीनाथ मंदिर अपने साथ कही रोचक बातो को समेटे हुए है, जिसे सुन आप बद्रीनाथ मंदिर की और आकर्षित होंगे और आपकी भी इच्छा उत्पन होगी बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन के लिए। तो आइए जानते है बद्रीनाथ के इतिहास और उसके बारे में कुछ रोचक बाते।

    Badrinath Temple

    कहाँ है बद्रीनाथ मंदिर

    4 धामों में से एक धाम बद्रीनाथ धाम (Badrinath Dham) जिसके दर्शन से लोग अपनी मनोकामना पूरी करते हैं और अपने मन में अटूट विश्वास लेकर मंदिर से खुशी खुशी वापिस जाते है। बद्रीनाथ मंदिर जो भारत के उतर में हिमालय की बर्फ से ढकी पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में बसा हुआ एक बेहद ही सुंदर धाम है। यहां मंदिर में लोगो की लाखो कगार के साथ कई प्रकृति प्रेमी भी यहाँ दर्शन कर उनके दृश्य को देखने आते है। कहा जाता है की इस मंदिर का निर्माण शंकराचार्य द्वारा किया गया था।

    अपको बता दे की, इस मंदिर को 6 महीने खोला जाता है और 6 महीने बंद रखा जाता है और बंद 6 महीने के दौरान वहा एक अखंड दीपक जलाया जाता है। ऐसा इसलिए होता है की सर्दियों के समय में बर्फबारी के कारण सारे रास्ते बर्फ से ढक जाते, जिस कारण लोगो का आना जाना मुश्किल हो जाता हैं। और इसी के चलते 6 महीने यह मंदिर बंद रखा जाता है। इस मंदिर को भगवान विष्णु जी का धाम कहा गया है। यह मंदिर दो पहाड़ियों में स्थित 3150 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। जिसके साथ साथ यह मंदिर 15 फीट ऊंचा है।

    मंदिर की ऐतिहासिक बाते (Badrinath Temple)

    बद्रीनाथ धाम इतिहास का सबसे धार्मिक स्थल है, जहाँ कई ऋषि मुनि अपनी तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न करते है और उनकी भक्ति में लीन होते है पौराणिक कथा के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर इतिहास के 8वी व 9वी सदी पुराना है। जिसमे मंदिर का 2 से 3 बार पुनर्निर्माण किया गया है। जिसमे सोलहवीं सदी के गढ़वाल के राजा ने की थी जिसने भगवान बदरीनाथ की मूर्ति को इसी मंदिर में स्थापित कराया था।

    इस मंदिर की सुंदरता को तीन भागों में बाटा गया है जिसमे कुल 15 मूर्तियां है बद्रीनाथ मंदिर को धरती का बैकुंठ भी कहा गया हैं। इस मंदिर में एक बहुत ही सुन्दर मूर्ति है जो भगवान विष्णु जी को समर्पित है जिसकी ऊंचाई लगभग 3.3 फीट ऊंची है।

    Badrinath Temple

    मंदिर का द्रश्य और कथा (Badrinath Temple)

    यह मंदिर दो पहाड़ियों के बीच में स्थित है जिनका नाम नर और नारायण है । नर और नारायण भगवान विष्णु जी के नमो में से दो नाम है।इस मंदिर में सबसे ऊपर तीन स्वर्ण कलश रखे हुए है। वह इस मंदिर की सुंदरता खुद में ही एक आकर्षण है। जिसे देख लोग काफी आकर्षित होते है। कहा गया है की जब हम मंदिर में प्रवेश करते है तो उसमे लगा द्वारा को सिंह कहते है।

    अक्सर सुनने में यह भी आया है की शुरुवाती दौर में बद्रीनाथ मंदिर में भगवान शिव जी का निवास था जिसके बाद उन्होंने यह जगह भगवान विष्णु जी को दे दी थी। पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है की जब भगवान विष्णु जी इस धरती का भ्रमण कर रहे थे तो उन्हे यह धरती काफी पसंद आई, और इसी भ्रमण के दौरान उन्हे शिव जी और माता पार्वती जी मिले, लेकिन भगवान विष्णु जी ने उनके आगे छोटे बच्चे का रूप धारण किया और वह रोने लगे।

    जब माता पार्वती और शिव जी ने रोते हुए बच्चे को देखा तो वह उनके पास आकर उनसे रोने का कारण पूछा। तब बच्चे के रूप में भगवान विष्णु जी ने बोला की उन्हे यहां तपस्या करनी पर उनके पास जगह नहीं। जिसके बाद भगवान शिव जी ने भगवान विष्णु जी को वह जगह को समर्पित कर दिया और कहा जाता है इसी कथा के बाद वहा विष्णु जी की मूर्ति स्थापित हुई।

    बद्रीनाथ के नाम का रहस्य

    बद्रीनाथ का नाम के पीछे भी एक रहस्य बात है। की किस प्रकार इस मंदिर का नाम बद्रीनाथ रखा गया। प्रोणारिक कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब नारायण जी भ्रमण कर रहे थे। भ्रमण करते वक्त उन्होंने देखा की माता लक्ष्मी जी विष्णु जी के पैर को दबा रही है । जिसे देख नारायण जी चकित रह गए। जिसके बाद उन्होंने भगवान विष्णु जी से इसके बारे में पूछना चाहा , लेकिन विष्णु जी क्रोधित होकर बिना किसी बात का जवाब दिए वहा से चले गए। जिसके बाद वह साधना में लीन हो जाते है, लीन होने के वक्त सर्दियों का मौसम होने के कारण वहा पर काफी बर्फ बारी होने लगती है।

    जिसे देख माता लक्ष्मी जी को अपने पति विष्णु जी की काफी चिंता सताने लगती है। जिसके लिए वह बेर (बद्री) के वृक्ष का रूप धारण कर अपने पति के साथ धूप, बारिश और अंधी में उनकी रक्षा कर उनके साथ तपस्या में लीन हो जाती है। जब विष्णु जी अपनी तपस्या पूरी कर अपनी आंखे खोलते है तो वह लक्ष्मी माता जी के बारे में यह सब देख उनसे बेहद खुश होते है। जिसके बाद बद्रीनाथ नाम का निर्माण होता है यानी बद्री “बेर” और नाथ “लक्ष्मी जी के नाथ” विष्णु भगवान जी।

    लोगो की बद्रीनाथ को लेकर कही गई रोचक बाते
    1. बद्रीनाथ को लोग बद्री वन भी कह कर बुलाते है क्युकी बद्रीनाथ में भगवान विष्णु जी की तपस्या के कारण यह बहुत से बेर के पेड़ है।
    2. ऐसा माना जाता है की इस स्थान पर भगवान शिव को ब्रहम हत्या से मुक्ति मिली थी जिस कारण यह पितरों के श्राद्ध कर उन्हे मुक्ति दी जाती हैं।
    3. जैसे की हम सब जानते हैं की बद्रीनाथ दो पहाड़ों के बीच में है। जिसका नाम नर और नारायण है जिसके बाद महाभारत में अर्जुन ने नर का रूप लिया था और विष्णु जी ने नारायण का रूप धारण किया था।
    4. बद्रीनाथ के इतिहास में बहुत से रोचक कहानी है। जिनका प्रश्न आज तक कोई नही ढूंढ पाया, और बद्रीनाथ मंदिर खुद में ही एक रहस्यमय बातो से समेटा हुआ है।
    5. इस धाम में अलकनंदा नदी के तट पर गर्म पानी का झरना है जिसे तप्त कुंड कहा जाता है। लेकिन में यह झरना देखने में काफी खोलता हुआ लगता हैं लेकिन असल में यह पानी इतना गर्म नही होता, और यह लोग नहा कर बद्रीनाथ के धाम में अपनी यात्रा सफल करते है।

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