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Author name: Rushali Gulati

Rohtak

Self Improvement

Self Improvement – आत्म – सुधार सफल जीवन के मंत्र

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Self Improvement- आत्म-सुधार या आत्म-विकास एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जो व्यक्ति को उन्नति और समृद्धि की ओर ले जाती है। यह बात तो सच है की कोई भी व्यक्ति अपने आप में परिपूर्ण (परफेक्ट) नही होता। वही कुछ लोग अपने भविष्य के सकारात्मक बदलाव के लिए आत्म सुधार करते है l

लेकिन कई बार ऐसा मोड़ भी आता हैं की जीवन में आई परस्थितियों के सामने खुद को झुकाने के लिए व्यक्ति मजबूर हो जाता हैं। और अपना आत्मविश्वास तोड़ बैठता हैं । तो आज हम आपको इस लेख में कुछ ऐसी बाते बताएंगे। जिससे आप खुद में सुधार ला सकते है और जीवन में आने वही हर तरह की परस्थितियों का डट के सामना कर सकते हैं।

Self Improvement

आत्म-सुधार का क्या अर्थ है

(Self improvement) यानी आत्म-सुधार जो दो शब्दो से मिल कर बना हैं। जो पहला शब्द है आत्म यानी “खुद” और दूसरा शब्द है सुधार यानी “परिवर्तन”। यह दो शब्दो से बना अर्थ आत्म-सुधार । जिसका मतलब की एक व्यक्ति खुद के प्रयासों से खुद के अंदर सुधार लाने की कोशिश करता हैं। जिसे हम आत्म सुधार कहते है। आज कल हर क्षेत्र में व्यक्ति खुद को परफेक्ट बनाना चाहता है। जो हर व्यक्ति के लिए बेहद जरूरी भी हैं।

क्यों जरूरी है आत्म– सुधार

हर व्यक्ति अपने जीवन में खुद को दूसरे से बेहतर बनाना चाहता हैं। जिससे वह अपने आप को और अपने मानसिक तनाव को कम कर सके। आज के समय में हर व्यक्ति इतनी भाग दौड़ भरी जिंदगी में फस चुका हैं। की वो अपने अंदर बहुत सी बुरी आदतों को अपना चुका है। जिसके चलते वह अपने जीवन में बुरी आदतों को खत्म करना चाहता हैं। और अपने रिश्तों को सुधारना चाहता हैं। इसी के चलते हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी में आत्म सुधार लाना आवश्यक हैं।

कैसे करे आत्म-सुधार

1. आदत में लाना होगा सुधार

जैसे की हम सब जानते हैं। की एक बेहतर इंसान बनने के लिए सबसे पहले हमे हमारी कुछ बुरी आदतों को सुधारना होगा। जो हमारा आत्म सुधार की और पहला कदम होगा। अगर हम अपनी बुरी आदतों को सुधारेंगे तो हम एक बेहतर मनुष्य बन पाएंगे। जिससे हमारे अंदर सकारात्मक सोच उत्पन होगी। जिससे हम अपने आप को पूरा दिन एक स्वस्थ व्यक्ति की तरह महसूस करेंगे।

2. सेहत का देना होगा ध्यान।

कहा जाता है की सबसे सुखी इंसान वही है जिसका स्वास्थ्य बेहतर हो। और एक बेहतर स्वास्थ्य के लिए इंसान को अपने जीवन में सुबह जल्दी उठ कर व्यायाम करना चाहिए और देर से सोने की आदत को खत्म करना चाहिए। जिससे हम अपने जीवन पे सेहत पे ध्यान दे पाएंगे और एक बेहतर इंसान बन पाएंगे।

3. कारात्मक लोगो से जुड़े

यह कहावत आप सभी ने जरूर सुनी होगी। की जैसी संगत वैसी रंगत , अगर एक व्यक्ति को अपने जीवन में आत्म सुधार लाना है तो उसे सबसे पहले अपने आस पास ऐसे लोगो को रखना होगा जो सकारात्मक सोच रखते होंगे। जिससे आप अपने जीवन में हमेशा सकारात्मक सोच पाएंगे और एक अच्छी दिशा की और चलेंगे।

4. खुद पर रखे भरोसा

खुद पर भरोसा रखना एक सफल व्यक्ति के जीवन का राज हैं। क्या आप लोग जानते है, की अगर हम खुद पर भरोसा रख सकते है तो जीवन में आई हर परस्थितियों को पार कर सकते हैं। एक व्यक्ति को अपने जीवन में आत्म-सुधार लाने के लिए सबसे पहले खुद पे भरोसा करना सीखना होगा। जिससे हम प्रथम स्तर प्राप्त कर सकते हैं।

5. हमेशा सीखते रहो

कहते है की जीवन में कही से भी कुछ सीखने को मिले तो उस अवसर को कभी गवना नही चाहिए। अगर आप लोग अपनी जिंदगी में आत्म सुधार लाना चाहते हैं तो जिंदगी कभी भी सीखने की लालसा को खत्म नहीं करना चाहिए। अगर हम समय समय पर कुछ सीखेंगे तो वो हमारा आत्म विश्वास को बड़ावा देगा और हम एक बेहतर इंसान बन पाएंगे।

आत्म-सुधार का महत्व

हमने अभी तक यह सब तो पड़ा की आत्म-सुधार होना क्यों आवश्यक हैं अब हम आपको आत्म-सुधार का महत्व बताएंगे। जिसे अपनाने के बाद व्यक्ति अपने जीवन में क्या क्या सुधार लाता हैं। आत्म सुधार हर मनुष्य के जीवन में महत्वपूर्ण हैं। आत्म सुधार से व्यक्ति अपने जीवन में एक सही दिशा की और चल सकता है। वह साथ ही साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मानसिक विकसित होता हैं। आत्म-सुधार एक मनुष्य को बेहतर बनाता है वह साथ ही साथ मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में आत्मविश्वासी और सफल बनने की ओर प्रेरित होता है।

निष्कर्ष – Self Improvement

अक्सर हमने मनुष्य को दूसरो से खुद को तुलना करते हुए देखा हैं। जब मनुष्य खुद की तुलना दूसरे से करता हैं तो वह खुद की काबिलियत पर शक करने लगता हैं। जिससे वह मनुष्य खुद के लक्ष्य की और ध्यान नहीं दे पाता। इसी कमी के चलते अगर मनुष्य खुद के जीवन में परिवर्तन लाता हैं और आत्म-सुधार कर लेता हैं तो वह अपने लक्ष्य की तरफ सफल होता है। साथ ही आत्म-सुधार एक मनुष्य को मानसिक रूप से विकसित करता है। और वह मनुष्य स्वयं को उस रूप में पाता है। जिस रूप में वह खुद को देखना चाहता हैं।

आत्म-सुधार एक स्वयं-मोटिवेटेड प्रक्रिया है और व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव के लिए उसकी लगन, प्रतिबद्धता, और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। इसमें नियमित अभ्यास, संदर्भ स्थापना, और गुरुकुल के साथ सहायता भी मिल सकती है।

आप अपने आत्म-सुधार के लिए अपने बिजी दैनिक जीवन में समय निकालकर अपने लक्ष्यों को साधने का प्रयास कर सकते हैं। सकारात्मक सोच, स्वयं-प्रेम, और दूसरों के साथ समझदारी से व्यवहार करना आपके आत्म-सुधार की प्रक्रिया को समृद्ध कर सकता है।

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How To Motivate To Yourself

How To Motivate To Yourself – खुद को प्रेरित कैसे करें

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एक व्यक्ति के सफल जीवन का सबसे अहम हिस्सा उसका आत्मविश्वास होता हैं। लेकिन यही आत्मविश्वास आज कल की नकरात्मक भरी सोच में कही खो सा गया है। जिसके चलते लोगो को इस भाग दौड़ भरी जिंदगी में खुद को सेल्फ मोटिवेट रखना अति आवश्यक हो चुका है। तो ऐसे में बात आती है। की एक व्यक्ति अपने जीवन में किस तरह खुद को मोटिवेट कर सकता है। जिससे वह अपने जीवन को सकारात्मक सोच से जी सके ।

एक असल जिंदगी में अगर कोई इंसान कोई मोटिवेशनल वीडियो या बुक पढ़ लेता हैं तो वो अपने जीवन में बेहद सकारात्मक सोच से संकल्प लेता है जिसके बाद वह अपने लक्ष्य के लिए खुद को तैयार करता है लेकिन वही मोटिवेशन सुबह उठ कर नकरात्मक सोच में बदल जाता है और वह व्यक्ति फिर से खुद को सामान्य जीवन में ले आता है और यही समस्या हर व्यक्ति के साथ हैं तो इसी के चलते आज हम आपको कुछ ऐसी बाते बताएंगे। जिससे आप अपने जीवन में खुद को मोटिवेट कर सकते हैं।

How To Motivate To Yourself

अर्थ क्या है सेल्फ मोटिवेशन का

मोटिवेशन एक ऐसी शक्ति है। जो लोगो के अंदर प्रेरणा जागरूक करती हैं। जिससे व्यक्ति अपने जीवन में जो लक्ष्य की कल्पना करता है वह उसे पाने के लिए कड़ी मेहनत करने लग जाता हैं। ऐसे में हर व्यक्ति के जीवन में सेल्फ मोटिवेशन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सेल्फ मोटिवेशन का अर्थ है खुद को प्रोत्साहित करना। आज के भाग दौड़ भरे जीवन में हर व्यक्ति को सेल्फ मोटिवेशन की आवश्यकता है जिससे वह किसी भी पड़ाव में खुद को जब घिरा हुआ महसूस करता है तो वही सेल्फ मोटिवेशन से खुद को राहत देने की कोशिश कर सकता है।

जीवन में क्यों जरूरी है सेल्फ मोटिवेशन

जैसे की हम सब जानते है हर एक सफल इंसान के पीछे कोई न कोई प्रेरणा अवश्य होती हैं। बिना प्रेरणा के कोई भी इंसान कामयाबी हासिल नही कर सकता और अपनी कामयाबी तक पहुंच कर भी व्यक्ति कई बार इधर उधर भटक जाता हैं। तो ऐसे हर व्यक्ति को अपने जीवन में अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए सेल्फ मोटिवेशन की आवश्यकता होती है जिससे व्यक्ति अपने जीवन में कामयाबी हासिल कर सके।

सेल्फ मोटिवेट रहने के महत्व

आत्म-प्रेरणा एक ऐसी शक्ति है जो हमें आगे बढ़ने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है. यह एक आंतरिक शक्ति है जो हमें कठिन परिस्थितियों में भी काम करने के लिए प्रेरित करती है. आत्म-प्रेरणा के कई लाभ हैं, जिनमें शामिल हैं –

अपनी शक्तियों को बाहर लाना

हर इंसान अपने जीवन में कोई न कोई लक्ष्य जरूर बनाता है जिसे वह अपने जीवन में हासिल करना चाहता है लेकिन कई बार अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए इंसान को सेल्फ मोटिवेशन की जरूरत होती है क्योंकी कहा जाता है की एक प्रेरित इंसान अपने अंदर की छुपी शक्तियों को बाहर लाता है और जिससे वह अपने जीवन को सफल बना सकता है।

अपने लक्ष्य को करता है जल्दी पूरा

एक नॉर्मल इंसान अपनी जीवन में अपना लक्ष्य हासिल तो करता हैं लेकिन वही इंसान अगर अपने जीवन में खुद को प्रेरित करे, तो वह अपना लक्ष्य एक नॉर्मल इंसान के मुकाबले जल्दी समय में पूरा कर लेता हैं।

बढ़ती है सकारात्मक ऊर्जा

एक आत्म प्रेरित इंसान अपने लक्ष्य की और सकारात्मक ऊर्जा से बढ़ता है । जिस कारण वह अपने रास्ते में आई मुश्किलों का सामना सकारात्मक सोच से कर पाता है और जल्दी हार नही मानता है । जिस कारण वे तेजी से खुद के लक्ष्य तक पहुंचा पायेगा ।

कैसे कर सकते है खुद को सेल्फ मोटिवेट

हर इंसान को अपने जीवन में देखे गए लक्ष्य को पूरा करने के लिए किसी न किसी प्रेरणा स्रोत की आवश्यकता जरूर होती है। क्योंकि कहते है की अगर इंसान की सोच सकारात्मक होगी तो वो आई हर मुश्किलों का सामना सकारात्मक सोच के साथ करेगा। तो कैसे रख सकते है खुद को मोटिवेट।

दूसरो से खुद की तुलना मत करो

हर इंसान का अलग व्यक्तित्व होता है। लेकिन यह बात हम भूल जाते हैं। और खुद की दूसरो के साथ तुलना करने लगते है। जिस कारण हम अपने लक्ष्य को लेकर अप्रेरित हो जाते हैं। तो अगर हमे अपने लक्ष्य को हासिल करना है तो हमे सबसे पहले खुद की तुलना दूसरो साथ बंद करनी पड़ेगी। जिस वजह से हम मोटिवेट रहेंगे और आसानी से लक्ष्य की और पहुंच पाएंगे।

ध्यान करे

अक्सर हम सुनते है की सुबह उठ कर मेडिटेशन या ध्यान करना बेहद अच्छा होता है। इसके पीछे यह कारण है, अगर व्यक्ति सुबह उठ कर शांत वातावरण में मेडिटेशन करता है, तो वो अपने मन में चल रहे विचारो को पहचान सकता है, और दिन भर खुद को आत्मप्रेरित कर सकता है, और अच्छा महसूस कर सकता हैं।

कल्पना कीजिए

जब हम किसी क्षेत्र में ऊंचाइयां हासिल करना चाहते हैं तो हमे उस क्षेत्र में जो लोग पहले से ही सफल है उनसे खुद को उसी क्षेत्र में कल्पना करते है तो हमारे अंदर एक आत्म प्रेरणा की ऊर्जा उत्पन होती है। जिससे उस ऊर्जा से हमारे अंदर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की तेजी उत्पन होती है। और हम सारा ध्यान अपने लक्ष्य पर लग जाता हैं।

किताबें पढ़ने की आदत डालिए

कई बार मोटिवेशन डिमोटिवेशन में बदल जाता हैं। तो खुद को हर समय मोटिवेट करने के लिए व्यक्ति को दिन में कुछ समय निकल कर प्रेरणादायक किताबे अवश्य पढ़नी चाहिए, किताबें पढ़ने की आदत डालने के लिए समय और प्रयास लगता है, लेकिन यह एक पुरस्कृत अनुभव है. जब आप किताबें पढ़ते हैं, तो आप नए चीजें सीखते हैं, अपने शब्दावली का विस्तार करते हैं, और अपने कल्पनाशील कौशल को विकसित करते हैं , और जिससे आत्म प्रेरणा की शक्ति बढती है l

कभी हिम्मत न हारे

जिंदगी का दूसरा नाम उतार चढ़ाव ही है। हम ऐसी जीवन की अपेक्षा करते है जिससे कोई दुख न हो। लेकिन जीवन का दूसरा नाम ही उतार चढ़ाव है। जिस कारण अगर व्यक्ति कभी अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कई मुश्किलों का सामना करता है। और कई बार तो वो थक भी जाता है। तो ऐसे में व्यक्ति को खुद को मोटिवेट रखना चाहिए और हिम्मत न हारते हुए। यही बोलना चाहिए की में कर सकता हूं।

प्रकृति के साथ समय बिताए

यह बात तो सौ आने सच है की प्रकृति में रहने से व्यक्ति का दिल और दिमाग को शांति मिलती है। क्योंकि प्रकृति एक ऐसी चीज है जिससे हमे बहुत ज्यादा आत्मा प्रेरणा मिलती है। क्योंकि हमे प्रकृति से बहुत कुछ सीखने को मिलता है, जैसे प्रकृति हमे सिखाती है “अगर रात होती होती है तो दिन भी होता है” “धूप है तो छाव भी है”। तो व्यक्ति अगर जितना समय प्रकृति के साथ बिताएगा। वह उतना ही खुद को मोटिवेट रख पाएगा।

निष्कर्ष- How To Motivate To Yourself

आज कल जिंदगी बहुत भाग दौड़ भरी हो चुकी। जिसमे व्यक्ति के पास खुद के लिए समय ही नहीं है। और खुद को इतना डिमोटिवेट कर बैठता है की वह कई बार अपने जीवन से परेशान होने लगता है। तो ऐसे में इस लेख को पढ़ कर व्यक्ति खुद की दिनचर्या में अपने लक्ष्य के लिए खुद को मोटिवेट कर सकता है। और एक अच्छे जीवन को जीने के लिए खुद को खुश रख सकता हैं ।

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Teamwork

What Is The Meaning Of Teamwork

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What Is The Meaning Of Teamwork – एक अकेला मनुष्य एक बूंद के बराबर होता हैं। अगर वही मनुष्य टीम में रह कर काम करेगा तो वही बूंद से वह सागर बनने तक का सफर तह करता हैं। इसी तरह जब कुछ लोग मिल कर एक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सहयोग में रह कर एक दूसरे के साथ काम कर के अपने अलग–अलग कौशल का इस्तेमाल करके अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करते है। तब वह टीम वर्क कहलाता है।

एक आम भाषा में कहा जाए, तो टीम वर्क वह कार्य हैं जिसमे व्यक्ति खुद की अहमियत को समझ कर अपने अंदर छुपे कौशल से समूह में रह कर सहयोग करे तो वह टीम वर्क कहलाता है। जैसे: व्यवसाय जिंदगी में मनुष्य एक टीम में रह कर अपने व्यवसाय के प्रोजेक्ट को एक साथ मिल कर पूरा करते है। वही सिपाही एक साथ रह कर देश के लिए लड़ते हैं। ऐसे ही टीम में रह रहा व्यक्ति हमेशा मोटिवेट रहता है और खुद का अच्छा सहयोग देकर लक्ष्य की प्राप्ति करता है।

What Is The Meaning Of Teamwork

क्यों जरूरी है Teamwork

टीम वर्क को लेकर बहुत सी कहावतो का इस्तेमाल किया जाता है। क्योंकि ये बात भी झूठी नहीं है की अकेला व्यक्ति ज्यादा कुछ नही कर सकता। एक अकेला इंसान अपनी मेहनत से कई बुलंदियों को हासिल तो कर सकता है, लेकिन वही अगर दूसरी तरफ अपको अलग अलग कौशल वाले व्यक्तियो का साथ मिल जाता हैं। तो वह कार्य बहुत सफलतापूर्वक और कम समय में पूरा हो जाता है।

इसी तरह आज के समय में छोटी कंपनी से लेकर बड़ी कंपनी ने टीम वर्क के मूल मंत्र को अपनी कंपनी में अपना रखा है। क्योंकि कंपनी में आई हुई चुनौतियों का सामना अगर विभिन्न प्रकार के व्यक्ति एक साथ मिल के करेंगे । तो उस कार्य का हल और उसका परिणाम एक सफलतापूर्वक मिल सकेगा ।

इसी कारण के चलते एक टीम वर्क का होना असल जिंदगी में बेहद जरूरी हैं। क्योंकि हर व्यवसाय के अंदर बहुत सी मुश्किले आती हैं। जिसका सामना अगर टीम वर्क में रह कर किया जाए। तो वह रास्ता भी आसान हो जाता है। और सभी व्यक्ति का एक लक्ष्य होने के कारण मुश्किल आसान हो जाती है। और कंपनी कामयाबी हासिल करती हैं।
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Teamwork का महत्व –

असल जिंदगी में लोगो ने यह जाना है। की एक अकेले व्यक्ति द्वारा किया गया काम और वही काम टीम में किया जाए। तो दोनो में समय और कौशल का अंतर होता है। इसी कारण से सिर्फ खेल कूद में ही टीम की आवश्यकता नहीं होती बल्कि असल जिंदगी में भी टीम वर्क में कार्य करने से मनुष्य बहुत कुछ सीख सकता है और अपने कार्य को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। टीम वर्क महत्वपूर्ण होने के कुछ कारण-

नए विचारों को प्रकट करना

टीम में कार्य करने से व्यक्ति नए नए लोगो के साथ तालमेल बड़ता हैं जिसमे हर व्यक्ति कोई न कोई अलग कौशल के साथ कार्य कर रहा होता है। जिससे सामने वाले व्यक्ति को कुछ न कुछ नया सीखने को मिलता है।

आत्मविश्वास बढ़ाएँ

जैसे की हम वर्षो से देखते आए है की टीम में रह रहे व्यक्ति एक दूसरे के साथ काफी सकारात्मक महसूस करते है। जिससे वह एक परिवार के रूप में एक संग होकर कार्य को पूरा करते हैं। और ऐसा करने से कार्य जल्दी पूरा होता है। और कहा जाता है की एक सकारात्मक टीम के साथ लिया गया निर्णय टीम का आत्मविश्वास को बढाता है l

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Teamwork को करे कामयाब

टीम वर्क के बारे हमने बहुत कुछ जाना है और पढ़ा भी है। लेकिन एक सवाल यह आता है की किस तरह बनाई गई टीम को असल जिंदगी में कामयाब किया जाए। यह काम तो बेहद आसान है की एक टीम को खड़ा कर दिया जाये , लेकिन जब तक उस बनाई गई टीम को हम कार्य नही बताएंगे, उन्हे मोटिवेट नही करेंगे तब तक वह अपने कौशल का इस्तेमाल ही नही करेंगे। और कार्य वही के वही रद्द हो जायेगा।

तो ऐसे में टीम वर्क के दौरान व्यक्ति को अपनी टीम का कार्य अवश्य पता होना चाहिए।

टीम बनाने का मिशन जानना।

बनाई गई टीम में टीम के व्यक्ति को अपनी टीम कार्य का विषय और मिशन जरूर पता होना चाहिए। जिससे वह अपने द्वारा अपने कार्य में स्किल्स का अच्छे से इस्तेमाल कर सके। और साथ ही टीम को अपने द्वारा किए जाने वाले कार्य की अवश्य पूरी जानकारी होनी चाहिए।

टीम सदस्यों में होना चाहिए भरोसा

टीम वर्क में कार्य के दौरान एक दूसरे पर भरोसा होना बेहद जरूरी हैं। जिससे किसी भी कार्य में कोई बाधा नहीं होगी और कार्य को आसानी से पूर्ण किया जायेगा। इसी लिए टीम को हर समय समय पे एक दूसरे से तालमेल बनाना चाहिए। जिससे भरोसा होने लगेगा और समूह कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होगा।

समय समय पर करनी चाहिए प्रशंसा।

टीम में कर रहे व्यक्ति को उनके दिए गए कार्य पर अच्छे प्रदर्शन पर उनको सराहना अवश्य करनी चाहिए। जिससे वह और वहा खड़े व्यक्ति में सकारात्मक ऊर्जा उत्पन हो, और वो आने वाले कार्य को और भी अच्छे तरह उसे पूरा करे।

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निष्कर्ष – What Is The Meaning Of Teamwork

बड़ी बड़ी कंपनियाँ अपनी कंपनी की कामयाबी के लिए हर क्षेत्र से कौशल व्यक्तियों को ढूंढ कर उन्हे नौकरी देकर टीम तैयार करती है। क्योंकि कॉरपोरेट कंपनी को यह बात अच्छी तरह पता है अगर कोई भी कार्य वह टीम में करेंगे तो वह कार्य सफलतापूर्वक पूरा होगा। इसी तरह अगर हमारे पास एक अच्छी टीम है तो हम किसी भी कार्य को बिना किसी मुश्किल के पूरा कर सकते है।

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Women Empowerment

Women Empowerment – महिला सशक्तिकरण आदर्श समाज का दर्पण

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Women Empowerment– आज के समय में महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment) एक गहन चिंतन का मुद्दा बन चुका हैं। क्योंकि आज के समय में हर बच्चे को महिला के सम्मान का महत्व सिखाया जाता हैं। सिखाया यह जाता है की जहाँ नारी की पूजा और सम्मान होता है वही देवी देवता का वास होता हैं।

आज के समय में हर जगह महिला सशक्तिकरण को लेकर समाज में कई तरह के कार्यक्रम कर के जागरूकता फैलाई जा रही है। क्योंकि आज भी बहुत सी ऐसी जगह भी है। जहाँ महिलाओं की सम्मान की दृष्टि नहीं देखा जाता है । जिसके लिए भारत में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए कई तरह के कार्यक्रम किए जाते है जैसे महिला दिवस, अंतरराष्टीय महिला दिवस आदि। जिससे सरकार देश में चल रही महिला के प्रति राक्षसी सोच को खत्म कर सके।

Women Empowerment

क्या अर्थ है महिला सशक्तिकरण का

यू तो महिलाओ को समाज का अस्तित्व माना गया है , अर्थात महिला से ही एक समाज की पहचान होती है। लेकिन वही महिला को समाज में कई तरह के भेदभाव का सामना भी करना पड़ता हैं। यहां तक की अपको बता दे, की समाज में रहन सहन तो जरूर बदला हैं। लेकिन महिला को लेकर आज भी समाज वही सोच लेकर खड़ा हुआ हैं। तो जिसके लिए समाज में महिला सशक्तिकरण को लेकर जागरूकता फैलानी अति अवशायक हो चुकी हैं।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ है की समाज में महिला के प्रति सुधार लेकर आना। जिसे वह समाज में रह कर अपनी हक के लिए लड़ सके। यानी महिला समाज में रह कर अपनी तरक्की, कामयाबी और अपना हक हासिल कर सके। सरल शब्दों में महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल इतना हैं, की एक महिला समाज में अपने परिवार में बिना किसी भेद भाव के रह सके। और अपने फैसले वे खुद ले सके। एक महिला को समाज और परिवार में अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए उन्हे सक्षम बनाना ही महिला सशक्तिकरण कहलाता हैं।

क्यों जरूरी है महिला सशक्तिकरण

महिला को परिवार और समाज की वो नीव कहा गया है जिससे परिवार और समाज आगे बढ़ता है। तो ऐसे में अगर वही महिलाओं के साथ समाज या परिवार में भेद भाव किया जाएगा। तो देश आगे की और नही पीछे की और जायेगा। अगर यही पुराने समय की बात की जाए तो पुराने समय में समाज पुरुष प्रधान था जहाँ महिलाओं को परुषो को सोच तले और समाज की सोच द्वारा दबाया जाता था। जिसके चलते महिलाओं की प्रगति में रोक लग जाती थी। और वह उसी सोच तले दब जाती थी। जिससे वह अपने कोई फैसले नही ले पाती थी। वैसे तो हमारा समाज महिलाओं की पूजा में बेहद आगे है।

लेकिन वही समाज महिलाओं के लिए राक्षसी सोच लेकर उन्हे दबाता रहता था। जिसके लिए सरकार ने महिला को विकसित करने के लिए महिला सशक्तिकरण का अभियान शुरू किया। क्योंकि कहा जाता है की अगर महिला आगे बढ़ेगी तो हमारा देश भी आगे बढ़ेगा। जिसके चलते महिला सशक्तिकरण को समाज में लाया गया, और उन महिलाओं को जागरूक किया गया। जो सरकारों द्वारा मिल रही जरुरत से खुद के सपने और अपने फैसले में सक्षम बना सके ।

महिला सशक्तिकरण में बाधाए

समाज में भेदभाव

भारत में अधिकतर जगह है जहाँ आज भी महिलाओं और परूषो में भेदभाव किया जाता हैं। जिसके चलते परिवार वाले महिलाओं की प्रगति में पाबंदी लगा देते हैं। क्योंकि कुछ क्षेत्रों में आज भी महिलाओं को बाहर जाकर पढ़ने पर पाबंदी होती है जिससे वह उसी वातावरण में रह जाती है जहाँ से वह ऊपर नहीं उठ पाती।

पुरुष प्रधान मानता

जैसे की हम सब जानते हैं की हमारा समाज पुरुष प्रधान ही रहा हैं जहाँ पर कई क्षेत्र आज के समय में जागरूक तो हुए है वही कई ऐसे क्षेत्र भी है जहाँ आज भी महिलाओं और पुरुष में भेदभाव होते है और आज भी महिलाओं को अपने फैसले के लिए पुरुष जाति की अनुमति की आवश्यकता पड़ती है जिसके चलते ऐसे वातावरण में महिलाएं खुद को पुरुषो से कम समझने लगती हैं।

प्रथाओ का बोझ

भारत देश में बहुत से ऐसे क्षेत्र है जहाँ आज भी महिलाओं को लेकर बहुत सी राक्षसी प्रथाएं है जिन्हें देश में इन प्रथाओ को खत्म करना बेहद अनिवार्य बन चुका है। आज भी समाज दहेज और महिलाओं को लेकर चल रही प्रथाओं में मान्यता रखता है। जिसके चलते परिवार और समाज आज भी महिलाओं को बोझ समझता है और उनकी प्रगति में अड़चन बनता हैं।

कन्या भूर्ण हत्या

समाज में सोच तो बदली है। लेकिन आज भी कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जो महिला सशक्तिकरण में बाधा के रूप में सामने आते है। जिसमे आज के समय में सबसे बड़ी बाधा है कन्या भ्रूण हत्या, जिसमे लिंग के भेदभाव के चलते गर्भवती मां की जांच करवाई जाती है। और लड़की के होने पर बिना मां की सहमति की गर्भपात करवा दिया जाता हैं।

महिला सशक्तिकरण का महत्व

कई लोगो के मन में यह सवाल अवश्य आता होगा की महिला सशक्तिकरण से हमारा समाज किस तरह आगे बड़ेगा। तो आपको बता दे की महिला समाज की वो नीव है जिसके सहारे देश की प्रगति में काफी सुधार आ सकता है। तो आइए जानते है समाज में होने वाले सुधारो को

  1. समाज का विकास: अगर हमे देश की प्रगति चाहिए तो सबसे पहले हमे समाज से भेदभाव जैसे कीड़े को खत्म करना पड़ेगा। जिसके महिला की विकास से समाज में विकास होगा। अगर हर घर की महिला को शिक्षित किया जाए तो हर परिवार और समाज का विकास होगा।
  2. घरेलू हिंसा होगा कम: महिला सशक्तिकरण से महिला को विकसित किया जायेगा। जिसे क्षेत्र में हो रही घरेलू हिंसा को खत्म किया जाएगा। और हर समाज की महिला पढ़ लिख कर अपने लिए सक्षम होगी। जिससे वह अपने खिलाफ हो रही हिंसा के प्रति आवाज उठा पाएगी।
  3. महिला बनेगी आत्म निर्भर: हमारा देश की सोच हमेशा से महिला की प्रति चार दिवारी मैं ही रही है। जिसके चलते उन्हें घर के कामों में ही विकसित किया गया है। लेकिन महिला सशक्तिकरण से महिला को पढ़ाई के साथ साथ विकास के हर क्षेत्र में प्रोत्साहित कर सकते है जिससे समाज की हर महिला आत्मनिर्भर होकर नौकरी कर सकती हैं।
  4. होगा देश का विकास कम होगी गरीबी: गरीबी देश का दूसरा सबसे अहम विषय है जिसके चलते पुरुष जाति अपने परिवार की पर्याप्त मांगो को पूरा नहीं कर पाते। जिससे महिला सशक्तिकरण के चलते महिला आत्म निर्भर बन कर पुरुष के साथ नौकरी करेगी और उसके साथ कंधा से कंधा मिला कर चलेगी। जिससे देश में विकास होगा और गरीबी की सीमा कम होगी।
निष्कर्षWomen Empowerment

इस लेख में महिला सशक्तिकरण को एक बेहद अहम विषय दिया गया है। क्योंकि समाज सुधार तभी होगा जब हर घर में महिला को सम्मान और उसे आजादी दी जाएगी। जैसे की कहा जाता है की एक महिला अपने परिवार को संभालने में बेहद जिम्मेदार मानी जाती है। जिसके चलते उनका समाज और परिवार में उनका विकास होना बेहद जरूरी है अगर महिलाओ का होगा विकास तो देश का भी होगा विकास ।

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Self Reflection

Self Reflection – The Key Of Success (आत्मचिंतन)

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“समय बहुत मूल्यवान है। इसे चिंतन में लगाओ चिंता में नहीं”

आत्मचिंतन का अर्थ हैं। “की अपने अंदर चल रहे विचारो का अवलोकन करना” , आत्मचिंतन (Self Reflection) जो हर व्यक्ति के जीवन में एक अहम भूमिका निभाता हैं। आत्म चिंतन के दौरान व्यक्ति अपने अंदर चल रहे विचारो को समझ सकता है और अपने जीवन को एक नयी दिशा दे सकता हैं।

आज के समय में अक्सर व्यक्ति खुद के बारे ना सोच कर दूसरो की अच्छाई और बुराई के बारे में सोचने लगाता है जिससे वह व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ नकरात्मक चीज को ही ज्यादा सोचने लगता है। और ऐसा करने पर वह व्यक्ति खुद ब खुद गलत रास्ते पर चल पड़ता है। तो आज हम आपको इस विषय पर कुछ ऐसी बाते बताएंगे। जिससे आप अपने जीवन में खुद के विचारों का अवलोकन करना सीखेंगे और जिससे आप अपनी जिंदगी को और बेहतर बना पाएंगे।

Self Reflection

क्या है आत्मचिंतन का अर्थ

आज के समय में हर व्यक्ति बहुत जल्दबाजी में कार्य करता है। जिसके बाद वह अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर हमेशा पछतावा ही करता हैं। तो इसी आदत के चलते आज हम आपको इस लेख में एक ऐसी महत्वपूर्ण बात बताएंगे जो हर व्यक्ति के जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। तो आइए जानते है आत्म चिंतन के बारे में। आत्म चिंतन दो शब्दो से मिलकर बना हुआ हैं।

जो की है पहला आत्म जिसका अर्थ है “आत्मा या मन से संबंधित” दूसरा शब्द है चिंतन जिसका अर्थ है “मन ही मन में किया जाने वाला विवलेचन यानी ध्यान और किसी विषय पर स्मरण करना। इन्ही दो शब्दो से मिलकर बना है आत्मचिंतन (Self Reflection)। इसी शब्द से हम अपने दैनिक जीवन में काफी बदलाव ला सकते है और खुद के लिए बेहतर सोच रख सकते हैं।

कैसे करे आत्मचिंतन – Self Reflection

हर व्यक्ति अपनी जिंदगी में कोई न कोई ऐसा कार्य जरूर करता हैं। जिस विषय पर वह अपने मन में दो राय अवश्य लेकर आता है। एक जो सकारात्मक विचार होते है वही दूसरी और जो नकरात्मक विचार होते है। जिसको लेकर वह इतना सोच में पढ़ जाता हैं की वह एक विषय का रास्ता ढूंढते–ढूंढते दूसरे विषय में फस जाता हैं। जिस कारण वह कोई न कोई गलत कार्य करने पर मजबूर हो जाता है। लेकिन अगर वही व्यक्ति अपने जीवन में कोई कार्य करने से पहले उस कार्य के सकारात्मक और नकरात्मक विचारो को समझ ले तो वह किसी भी दुविधा में न पड़ कर अपने कार्य को सूझ–बूझ के साथ सफल कर सकता हैं।

लेकिन ऐसा तभी होगा जब वह खुद में आत्म चिंतन का अवलोकन करेगा । जैसे:–

ध्यान लगाना- ध्यान लगाना यानी की “मौन बैठना” जो आज के समय एक मनुष्य के लिए काफी मुश्किल काम है। लेकिन कहा जाता है की ध्यान लगाना एक महत्वपूर्ण कौशल है जो हमें सकारात्मक और साधारण जीवन के लिए उपयुक्त बनाता है। ध्यान एक प्रक्रिया है जिसमें हम अपने मन को एक स्थिर एवं एकाग्र ध्येय के ओर ले जाने का प्रयास करते हैं। ध्यान के द्वारा हम अपने अंतर्मन को शांत, स्थिर और ताजगी से भरते हैं। यह हमें मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से स्वस्थ बनाता है।

डायरी लिखना– कही व्यक्ति ऐसे भी होते हैं। जो अपने विचारो को लोगो के आगे खुल कर प्रकट नहीं कर सकते। जिस कारण वह अपने विचारो को मन में ही दबा देते। जिससे वह व्यक्ति एक नकरात्मक रास्ते की और निकल पड़ता है। तो ऐसे में अपने विचारो को समझने के लिए मन में चल रहे विचारो को हम डायरी पर लिख कर प्रकट कर सकते है। जो एक अच्छा विचार है जिससे व्यक्ति अपने विचारो को समझेगा और अपने बर्ताव में बदलाव लाने की कोशिश करेगा।

प्रकृति से बाते करे– आज के समय में इंसान अपनी जिंदगी के कार्य में इतना डूब चुका हैं। की वह समझ ही नहीं पता की उसका मन उनसे क्या कहना चाहता है। जिससे वह अपने विचारो को समझने में नाकामयाब हो जाता हैं। तो ऐसे में अपने अंदर चल रहे विचारो को समझने के लिए आप प्रकृति के करीब जा सकते है। प्रकृति से जुड़ना यानि ईश्वर से जुड़ना है जहाँ आपके सवालो के जवाब मिल जाएंगे ।

आत्मचिंतन क्यो है महत्वपूर्ण

आत्मचिंतन, या स्वयं के साथ चिंतन, एक व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उसके व्यक्तिगत विकास और समृद्धि का मार्गदर्शन करता है। आत्मचिंतन का मतलब है अपने अंदर के भावों, विचारों, संवेदनाओं और धार्मिकता के साथ संपर्क स्थापित करना। यह हमें स्वयं को बेहतर समझने और अपने जीवन को सार्थक बनाने में मदद करता है।

  1. स्वयं-समीक्षा: आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने आप को समीक्षा करता है और अपने सकारात्मक और नकारात्मक विशेषताओं को पहचानता है। यह उसे अपनी कमियों को समझने और उन्हें सुधारने के लिए प्रेरित करता है।
  2. स्वयं-विकास: आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने अंदर के पोषक और सकारात्मक गुणों का पता लगाता है और उन्हें बढ़ावा देने का प्रयास करता है। यह उसके स्वयं के बेहतर व्यक्तित्व के विकास में मदद करता है।
  3. जीवन के उद्देश्य का पता लगाना: आत्मचिंतन से व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्य और लक्ष्य को समझता है। यह उसे अपने जीवन के मार्गदर्शन में मदद करता है और उसके लिए सही निर्णय लेने में सहायता प्रदान करता है।
  4. स्वयं के साथ सम्बंध बनाना: आत्मचिंतन व्यक्ति के साथ स्वयं के साथ गहरा संबंध बनाने में मदद करता है। यह उसके आंतरिक शक्तियों और संसाधनों को जानने और समझने में मदद करता है।
  5. मानसिक शांति और सुख: आत्मचिंतन से व्यक्ति मानसिक शांति, आनंद और सुख की अनुभूति करता है। यह उसके जीवन को शांत, समृद्ध, और प्रसन्नता से भर देता है।

आत्मचिंतन के लाभ

अभी हमने जाना की किस तरह व्यक्ति को अपने जीवन में आत्मचिंतन का अवलोकन करना चाहिए। लेकिन आत्मचिंतन से व्यक्ति के जीवन में किस तरह के लाभ हो सकते है अब हम इस विषय पर बात करेंगे।

  1. जिस व्यक्ति ने आत्मचिंतन को अपनी जिंदगी में अपना लिया है। वे नकरात्मक और सकारात्मक विचारो में फर्क करने में सक्षम हो जाता हैं।
  2. आत्मचिंतन से व्यक्ति अपनी गलतियों को सीखता है और अपने द्वारा किए गए अच्छे कामों को और बेहतर करने की कोशिश करता हैं।
  3. साथ ही साथ व्यक्ति अपने निजी संबंध में मधुरता लाने में योग्य हो जाता हैं वे अपने बर्ताव और संस्कार को और बेहतर बनाने की कोशिश करता हैं।
  4. आत्म चिंतन से व्यक्ति खुद के विचारो में भावनात्मक और विश्लेषण करने की बौद्धिक क्षमता दोनो का विकास करने की कोशिश करता हैं।
लेख का सार-

यह लेख का अहम उधेशय यही हैं की, आज कल हर इंसान की जिंदगी इतनी भाग दौड़ भरी हो गई हैं की हर व्यक्ति जल्दबाजी में है l जिस कारण वह व्यक्ति अपनी जिंदगी में एक रास्ता ढूंढते ढूंढते नई मुसीबत में फस जाता हैं तो ऐसे में व्यक्ति को अपने जिंदगी में थोड़ा ध्यान लगाने की आवश्यकता है। जैसे की सुबह उठ कर व्यायाम करे, वे प्रकृति में जाकर टहले और अपनी जिंदगी में आत्मचिंतन का अवलोकन कर अपने विचारो और अपने समझने की क्षमता को विकसित करे ।

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Manikaran Sahib

Manikaran Sahib – गुरुद्वारा मणिकरण साहिब की पौराणिक कहानी

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Manikaran Sahib – भारत बहुत से ऐतिहासिक रहस्यों को समेटे हुए है, बहुत सी पौराणिक कथाओं के मुताबिक भारत में आज भी कई ऐसे पवित्र स्थान हैं। जहां करोड़ों की संख्या में लोगो यहाँ दर्शन करने आते है और ऐसे ही एक पवित्र तीर्थ स्थान के बारे में जानेगे जहाँ कई वर्षो तक शिव और पार्वती ने तपस्या की जिसके पश्चात् वहां गुरु नानक देव जी ने कदम रखा और विश्राम किया था ।

Manikaran Sahib

कहाँ है मणिकरण साहिब

एक ऐसा पवित्र स्थान जो हिमाचल की वादियों में बसा हुआ है। हिमाचल प्रदेश में स्थित कुल्लू जिले के भुंतर से उत्तर-पश्चिम में पार्वती घाटी में ब्यास और पार्वती नदियों के मध्य बसा हुआ एक बहुत ही सुंदर व पवित्र स्थल हैं। यह समुद्र तल से 1760 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और कुल्लू से इसकी दूरी लगभग 45 कि.मी. और मनाली से करीब 80 किलोमीटर है। हवाई मार्ग से यहां पहुंचने के लिए भुंतर में छोटे विमानों के लिए हवाई अड्डा भी है l

मणिकरण साहिब का इतिहास – Manikaran Sahib

हर ऐतिहासिक स्थान के पीछे कोई न कोई रहस्य अवश्य होता है। इसी प्रकार इस तीर्थ स्थान के पीछे भी एक ऐसा रहस्य है जिस कारण इसका नाम मणिकरण रखा गया। जैसे की हम सब जानते है पौराणिक कथा के अनुसार इस वादियों में भगवान शिव और पार्वती माता ने 1100 वर्षो तक एक साथ तपस्या की थी। कहा जाता है की भगवान शिव और पार्वती माता इन वादियों के सुंदरता से काफी मोहित हो गए थे।

और एक बार माता पार्वती को अपनी कान की बाली जो काफी प्रिय थी वह नहाने के दौरान उस बाली में से एक मणि जाकर पानी में गिर गई। जब यह बात माता पार्वती ने शिव जी को बताई। तो उन्होंने अपने दूतो को वह मणि ढूंढने का आदेश दिया। काफी कोशिश करने पर भी वह मणि नहीं ढूंढ पाए। जिसके बाद शिव भगवान काफी क्रोधित हो गए। और उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोल दिया। जिस दौरान वहा पर एक नैना देवी प्रकट हुई। जिसने उन्हें मणि के बारे में बताया।

प्रकट हुई नैना देवी ने शिव जी को बताया की वह मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास है। जिसके बाद भगवान जी के दूतो ने शेषनाग से काफी विनती की। काफी विनती के बाद वह मणि शेषनाग ने वापिस तो कर दी। लेकिन वह इस बात से काफी क्रोधित हुए। और उनके क्रोध से एक गर्म पानी की धारा फूट पड़ी। जिस कारण उस जगह का नाम मणिकरण रखा गया।

ठंड में भी एक तरफ बहता है गरम पानी

एक तरफ तो भगवान शिव और मां पार्वती की रोचक कथा है। दूसरी तरफ मणिकरण साहिब गुरुद्वारे में गरम पानी आता है। जहाँ आज भी गुरुद्वारे का लंगर उसी पानी में बनाया जाता हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक इस जगह पर गुरु नानक जी अपने पांच प्यारे के साथ आए थे यह उनका पहला स्थान था जहा वह रुके थे। इसी दौरान उनके प्यारो को भूख लगी। जिसके बाद गुरु नानक जी ने मर्दाने को खाना बनाने के लिए कहा।

लेकिन खाना न होने के कारण उन्होंने संगत से आटा इक्ट्ठा किया। जिसके बाद वहा कई चीज़ों की उपस्थिति न होने के कारण खाना नही बन पाया। जिसके बाद गुरु नानक जी ने मर्दाने को वहा बैठे एक पत्थर हटाने को कहा। जिसको हटाने के बाद वहा से गरम पानी की नदी बहने लगी। जो आज भी इतनी कड़क ठंड में भी गर्म ही बहती है। और सिवाए रोटी के पूरे गुरुद्वारे का लंगर उसी गरम पानी से बनता है।

काफी प्रसिद्ध है मणिकरण साहिब

मणिकरण साहिब जो आज बेहद प्रसिद्ध हैं। जहाँ देश के साथ साथ विदेश पर्यटक भी इस गुरुद्वारे के दर्शन करने आते है। क्योंकि यह गुरुद्वारा कई चमत्कारों पर आधारित है और यही सब चमत्कारों को देखने के लिए पर्यटक काफी दूर दूर से आते थे, साथ ही यह मान्यता भी है की जो भी लोग चरम रोग, गठिया या विशेष चर्म रोग से बीमार रहते है। वह अगर कुछ दिन इस गरम पानी में स्नान करते हैं। तो उनके रोग में पहले से काफी राहत मिलती हैं।

यहाँ स्थित है कई और भी पर्यटक स्थल भी

आपने मणिकरण साहिब के बारे में बहुत कुछ सुना भी है और जाना भी है जहाँ लाखों की संख्या में पर्यटक घूमने आते है। और वहा के अलौकिक दृश्य से मोहित हो जाते हैं। तो ऐसे में मणिकरण के साथ कई और ऐसे पर्यटक स्थान स्थित हैं जो कोई न कोई रोचक तथ्य पर निर्धारित है जैसे की–

  1. खीरगंगा।

यह एक पर्यटक स्थल है जो मणिकरण साहिब से 22 किलोमीटर की दूरी पर है। खीरगंगा वादियों में आकर्षित स्थान है जो आए पर्यटकों के एडवेंचर के लिए बेहद खास हैं। जैसे माउंटेन क्लाइंबिंग, नेचर वॉकिंग आदि।

  1. तीर्थन घटी।

यह भी एक काफी शांत स्थान है। जहाँ लोग शांति को तलाशते हुए आते है। कहा जाता है की इस स्थान पर बेहद शांति है और वहा की बहती नदियां आए हुए पर्यटकों को अपनी और काफी आकर्षित करती हैं।

  1. महादेव मंदिर।

यह पवित्र स्थान के साथ पर्यटक स्थान भी है। यह मंदिर जो काफी प्रसिद्ध और पहाड़ों पर स्थित इस मंदिर की चमत्कारी शक्तियों के चलते यहाँ आए पर्यटक काफी आकर्षित होते हैं।

  1. भृगु झील।

यह झील जो काफी मोहित है। कहा जाता है की इस झील का नाम ऋषि मुनि पर आधारित है। जो इस झील के पास तपस्या करते थे। इस झील को पूल ऑफ गॉड्स के नाम से भी जाना जाता है।

मणिकरण साहिब का खाना

अपको बता दे की मणिकरण साहिब में कुछ ज्यादा रेस्टुरेंट और भोजनालय नहीं है। तो ज्यादा भोजनालय न होने के कारण यहां पर आए पर्यटक गुरुद्वारे द्वारा बनाया गया लंगर खाकर ही अपने भोजन की भूख को शांत करते है। साथ ही पहाड़ी में स्थित गुरुद्वारे में ज्यादातर कोई चटपटी चीज नहीं होती। लेकिन जो भी भोजन बनाया जाता है वह काफी हाइजेनिक और स्वादिष्ट होता हैं।

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Shabari of Ramayana

Shabari of Ramayana – शबरी के झूठे बेर

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Shabari of Ramayana – रामायण के पात्र में कई ऐसे सार हैं। जिसमे कई लोगो ने बरसो तक पुरुषोत्तम राम भगवान की प्रतीक्षा में पूरा जीवन व्यतीत कर दिया। उसी में से एक थी, शबरी माता जिन्होंने बिना कुछ सोचे समझे बरसो तक राम भगवान की प्रतीक्षा की और हर रोज उनके लिए फूल बिछाए और उनकी सेवा में खुद को समर्पित कर दिया।

शबरी माता एक भील जात की कन्या थी। जिसने अपना पूरा जीवन राम भगवान की प्रतीक्षा में समर्पित कर दिया। और किस प्रकार वह अपने घर से ऋषि मुनियों के पर्वत जा पहुंची और उनकी सेवा में लग गई। आज हम आपको यह सब बाते अपने लेख के द्वारा बताएंगे।

Shabari of Ramayana

कौन थी शबरी माता

शबरी माता जो भील जाति की कन्या था। जिसका असली नाम श्रमणा था। यह कथा उस वक्त की है जब राम भगवान ने धरती पर जन्म नही लिया था। शबरी के माता के पिता भील जाती के मुखिया थे जिनका नाम अंज था। जिनके घर शबरी माता (श्रमणा) ने जन्म लिया था। और वही उनकी माता रानी इंदुमती थी और यह भी भील जाती से तालुक रखती थी।

शबरी माता बचपन से काफी पक्षी पशुओं की और आकर्षित थी, और उनसे बाते भी किया करती थी और कभी कभी तो ऐसे कार्य किया करती थी जिस कारण राजा अंज और रानी इंदुमती काफी चिंतित हो जाते थे। जिसको देखने के बाद वह चिंतित हो कर एक ब्राह्मण के पास गए और उस ब्राह्मण को शबरी की वैराग्य बातो के बारे में बताया और अपनी चिंता बया की। जिसके बाद उस ब्राह्मण ने वक्त रहते शबरी के विवाह का विचार प्रकट किया और राजा अंज और रानी इंदुमती को अपनी पुत्री के विवाह करने की सलाह दी।

विवाह के लिए तैयार किया जाए पशु पक्षियों का भोज

जब राजा अंज और रानी इंदुमती ने ब्राह्मण के द्वारा दी गई सलाह के चलते माता शबरी का विवाह तय कर दिया। और उसी के बाद राजा अंज और रानी इंदुमती ने बहुत से पशु पक्षियों को बाड़े में एकत्रित कर दिया। जब पशु पक्षियों को बाड़े में एकत्रित किया गया। तो माता शबरी ने अपनी माता से इन जानवरों को एकत्रित करने का कारण पूछा। जिसका जवाब उनकी माता ने यह कहते हुए जवाब दिया की पुत्री ये सब तुम्हारे विवाह के दावत के लिए है तुम्हारे विवाह के दिन इन सभी जानवरों का एक स्वादिष्ट भोज तैयार किया जाएगा।

आजाद किया पशु पक्षियों को –Shabari of Ramayana

माता शबरी जो पक्षियों और जानवर की और काफी आकर्षित थी जब उन्होंने यह बात अपनी माता से सुनी तो उन्हे यह सब अच्छा नही लगा। वही काफी विचार करने लगी, की एक शादी के भोज के लिए इन बेजुबान की हत्या की जायेगी। इससे अच्छा मैं शादी ही न करू। यह सब सोचते सोचते उन्होंने रात के समय सारे एकत्रित पशु पक्षियों को आजाद कर दिया, और आजाद करते समय उन्हे किसी ने देख लिए था। जिसकी वजह से वह काफी डर गई और घर छोड़ कर निकल गई ।

शबरी जा पहुंची ऋषिमुख पर्वत पर

शबरी जब अपने घर से निकली तो वह ऋषिमुख पर्वत पर जा पहुंची। जहां पर 10000 से भी ज्यादा ऋषि तपस्या और हवन करते थे। शबरी माता उस जगह से बिल्कुल अंजान थी, वह नही जानती थी की जब ऋषि मुनि उनकी भीलनी जाति की सच्चाई जानेंगे तो वह उसे उस जगह नहीं रहने देंगे।

लेकिन किसी तरह कुछ समय तक शबरी वहा छुप कर रही और ऋषि मुनियों को हवन से पहले झाड़ू और अन्य कार्यों को पूरा कर देती थी। जब यह सब ऋषि ने काफी समय तक लगातार देखा तो वह लोग चिंतित हो बैठे। की यह सब हर रोज कौन कर के जाता है। जिसके बाद वह सोचने लगे की कही कोई प्रेत तो नही है जो यह कार्य कर रहा है।

मंगत ऋषि ने बनाया शबरी को अपनी पुत्री

जब ऋषि मुनियों ने प्रातः काल यह कार्य करते हुए शबरी को पकड़ लिया था तो उन्होंने उनका परिचय पूछते हुए उनसे सवाल किया। तब शबरी माता ने अपना परिचय देते हुए अपनी भीलनी जाति के बारे में बताया। जिसको सुनने के बाद वह काफी क्रोधित हुए और उनको अजीब ढंग से देखने लगे। लेकिन उनमें से एक ऋषि जिनका नाम मंगत ऋषि था। वह शबरी की अच्छाइयों को देखते हुए उन्हें अपनी पुत्री का दर्जा दे कर वहा के ऋषियों के क्रोध से उसे बचा लिया। जिसके बाद वह मंगत ऋषि की सेवा में लीन हो गई और उन्ही को पिता मान उनकी सेवा करने लगी।

लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब शबरी के जीवन में संघर्ष भरा सफर आया। जहाँ मंगत ऋषि जो काफी बूढ़े हो चुके थे। और अपना शरीर त्यागने को तैयार थे। जब यह बात शबरी को पता चली तो वह काफी निराश हो गई और मंगत ऋषि से रो कर बोली की एक पिता तो मैं पहले छोड़ आई। अब आप भी मुझे छोड़ कर जा रहे तो मेरी देखभाल कौन करेगा। यह बात सुन मंगत ऋषि ने कहा पुत्री तुम्हारा ध्यान अब श्री राम रखेंगे। तो शबरी ने बोला हे पिता श्री राम कौन है। तो मंगत ऋषि ने कहा की तुम उनकी प्रतीक्षा करो वे अवश्य आयेंगे।

शबरी करने लगी श्री राम का इंतजार

हम सब जानते है की श्री राम जी ने त्रेता युग में राक्षसों के वध के लिए जन्म लिया था और उसी जन्म में शबरी माता का इंतजार खत्म हो जाना था। शबरी माता श्री राम भगवान के इंतजार में बूढ़ी हो चली थी, और फूल तोड़ कर इकठ्ठा कर के उन्हे सजा के रखती। यहाँ तक की वह हर रोज़ बेरो को तोड़ कर उनका मीठे पन का पता लगाने के लिए उन्हे चखती और रख देती। ऐसा वो हर रोज केवल एक ही बात बोलती की मेरे श्री राम आयेंगे।

अब एक वक्त ऐसा आया की सीता की खोज करते हुए श्री राम शबरी की कुटिया आ पहुंचे और माता शबरी अपने प्रभु को एक ही नजर में पहचान गई और उनकी आंखो से आंसू निकलने लगे और उनके पैरो को लिपट के रोने लगी। और उनसे बोली की हे प्रभु आने में बड़ी देरी कर दी। साथ ही उनके स्वागत में फूलो का इस्तेमाल किया और अपने द्वारा तोड़े गए मीठे बेर को श्री राम को चखाया और उनकी सेवा की ।

कथा का सार

शबरी माता ने जिस तरह अपने गुरु के कहने पर श्री राम का इंतजार किया और हर रोज उनके इंतजार में सबर रखा । अगर आज की युवा पीढ़ी भी इसी तरह अपने भविष्य के लिए सबर रखे और अपने लक्ष की प्रतीक्षा करे तो वह कार्य अवश्य सफल होगा।

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Shravan Kumar

Shravan Kumar – श्रवण कुमार जीवन कथा

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भारतीय इतिहास की बहुत सी पौराणिक कथाएं हैं। जिनका वर्णन आज भी हमारे समाज में किया जाता है। यह कहानी एक ऐसे बालक की है जिसने अपने पुत्र होने का कर्तव्य अपने प्राणों का त्याग करके निभाया और अपना पूरा जीवन अपने माता पिता की सेवा में समर्पित कर दिया। तो आइए जानते है एक ऐसी पौराणिक कथा को जिसका संबंध रामायण (Ramayana) से है।

Shravan Kumar

कौन है श्रवण कुमार

जी हा आज हम श्रवण कुमार (Shravan Kumar) की बात कर रहे है जिसकी कथा का वर्णन हर किसी के मुंह से सुना होगा। श्रवण कुमार एक ऐसा पुत्र था जो अपने माता पिता की सेवा को ही अपना धर्म समझते थे। इनके इसी कर्तव्य ने आज इन्हे सतयुग से कलयुग में भी अमर बनाया है। साथ ही इनका संबंध रामायण के साथ भी है जिस कारण इस कथा का वर्णन रामायण के 64 वे अध्याय में किया गया है।

श्रवण कुमार का जीवन परिचय – Shravan Kumar

श्रवण कुमार की जिंदगी काफी कष्टों भरी थी। श्रवण कुमार के पिता जिनका नाम शांतुन (Shantun) था। जो एक साधु थे। और भगवान के पूजा पाठ में काफी लीन रहते थे। इनकी माता जिनका नाम ज्ञानवती (Gyanvati) था। श्रवण के माता पिता दोनो ही नेत्रहीन थे। जिस कारण उनकी जिंदगी काफी कष्ठों भरी थी और श्रवण भी एक ऐसे पुत्र थे जिन्होने अपने माता पिता की जिंदगी में उनका सहारा बन कर उनके हर काम में हाथ बटाया करते थे।

जब वह बड़े हो गए तो उनके घर के कामों में और बाकी अन्य कामों में अपनी माता का हाथ बटाने लगे जैसे भोजन बनाना, मां के लिए चिड़िया लाना। साथ ही अपने पिता जी के साथ उनकी पूजा पाठ उनको फूल तोड़ के देना और कथाओं का वर्णन करना और अन्य कामों में उनकी सहयात करने लगे।

श्रवण कुमार का वैवाहिक जीवन

जैसे जैसे समय बीतने लगा श्रवण कुमार बड़े होने लगे। जैसे ही वह विवाह के योग्य हुए तो उनके माता पिता ने अपने पुत्र का विवाह एक योग्य स्त्री के साथ कर दिया। लेकिन श्रवण कुमार की पत्नी उनके माता पिता को अपने जीवन का बोझ समझने लगी थी। जिस कारण वह उनसे अच्छे से व्यवहार न कर के उनकी बुराइयां करती थी। जब यह सब बातो का वर्णन श्रवण कुमार के आगे हुआ तो वह अपनी पत्नी से बेहद ही नाराज हुए।

जिस कारण उन्होंने अपनी पत्नी को काफी कुछ सुनाया। और परिणाम ये हुआ की वह रूठ कर अपने पिता के घर की और चल दी और कभी लौट कर वापिस नही आई। जिसके बाद श्रवण कुमार ने ही अपनी माता पिता की सेवा में खुद को समर्पित किया और उनकी हर इच्छा को पूरा करने का संकल्प लिया l

श्रवण कुमार ने पूर्ण की अपने माता पिता की इच्छा

श्रवण कुमार अपने माता पिता की हर इच्छा को पूरा करना चाहते। जैसे जैसे समय बीतता गया वह काफी वृद्ध होते गए। जिस कारण उनके माता पिता की तीर्थ जाने की इच्छा हुई। जब यह इच्छा उनके माता पिता ने अपने पुत्र को बताई, तो उन्होंने अपने माता पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए क्षण भर की भी देरी न की और उनके तीर्थ यात्रा पर जाने के लिए तैयारी करने लगे। जिसके बाद उन्होंने दो टोकरी को लेकर एक कावड़ तैयार की।

जहाँ एक तरफ अपनी माता को तो दूसरी और अपने पिता को बिठाया और अपने कंधो पे वह कावड़ उठा के चल दिए। जिसके बाद उन्होंने अपने माता पिता को कई जगह के तीर्थ के दर्शन अपने कंधो पर करवाए जैसे की गया जी, काशी, प्रयागराज और भी कही अन्य तीर्थ स्थान पर उन्होंने अपने माता–पिता को दर्शन करवाए। श्रवण अपने माता पिता को तीर्थ के यात्रा अपने द्वारा वर्णन करते थे और उनके माता पिता अपने पुत्र की नेत्रों से हर तीर्थ को काफी अच्छे से देखने की कोशिश करते थे।

श्रवण कुमार मृत्यु

एक वक्त ऐसा आया जब आधे रास्ते में श्रवण कुमार पर मुसीबत ने हमला किया। तीर्थ के रास्ते में जब उनके माता पिता को प्यास लगी। तो वह उस कावड़ को नीचे रख कर अपने माता पिता के लिए पानी की तलाश करने लगे। जहाँ उन्हे एक नदी दिखाई दी। लेकिन उस वक्त उस वन में अयोध्या के राजा दशरथ भी थे। जो वन में शिकार करने आए हुए थे। लेकिन उन्हें उस दिन कोई भी जानवर शिकार के लिए नहीं दिखाई दिया और वह वापिस अयोध्या के और प्रस्थान करने लगे। लेकिन तभी उन्हें नदी के किनारे जब कोई आहट सुनाई दी ।

तो उन्होंने कोई प्यासा जानवर सोच कर उस पर तीर चला दिया। लेकिन वह और कोई नही श्रवण कुमार थे। जब राजा दशरथ उनके पास पहुंचे तो श्रवण कुमार दर्द से तड़प रहे थे। और यह देख कर राजा दशरथ अपनी गलती का पश्चाताप करने लगे और श्रवण कुमार से माफी मांगने लगे। लेकिन उस समय श्रवण कुमार ने उन्हे सिर्फ यही कहा की उन्हे अपनी मौत की कोई परवाह नहीं है। उन्हे बस अपने माता पिता की प्यास बुझानी है। जो उनकी प्रतीक्षा में उनका इंतजार कर रहे होंगे। तो क्या राजन आप मेरे माता पिता को मेरी मौत की जानकारी दे देंगे। और उनकी प्यास बुझा देंगे। और इतना कहकर अपने प्राण त्याग दिए l

राजा दशरथ को मिला श्राप

राजा दशरथ जब श्रवण कुमार की मृत्यु की जानकारी लेकर उनके माता पिता पास पहुंचे। तो उनके माता पिता को वहा आहट सुनाई दी। जैसे की उनके माता पिता नेत्रहीन थे तो वे आहट से ही अपने पुत्र को पहचानते थे। लेकिन उस वक्त वह आहट उनके पुत्र की नही थी। जिस कारण उन्होंने पुछा की कौन हो तुम, तब उस वक्त राजा दशरथ चुप रहे। उनके माता पिता के दुबारा पूछने पर उन्होंने अपना परिचय दिया और वहा बीता सारा दृश्य उन्हे बताया।

जिसके बाद उन्होंने राजा दशरथ को पुत्र वियोग में जीवन त्यागने का श्राप दिया। क्योंकि उनके पिता का कहना था की जिस तरह पुत्र वियोग में उन्होंने अपना जीवन त्यागा है, उसी तरह राजा दशरथ भी पुत्र वियोग में जीवन को त्याग देंगे। और ऐसा हुआ भी, राजा दशरथ अपने पुत्र राम के 14 वर्ष खुद से दूर रहने का दर्द सह न सके। और उन्होंने अपने पुत्र के वियोग में अपना शरीर त्याग दिया था।

सारांश :-

माता पिता को भगवान से ऊपर का दर्जा दिया गया है, क्योकि पुरे संसार में माता पिता ही होते है जो बिना स्वार्थ के अपने बच्चो का पालन पोषण करते है, लेकिन वही जब सेवा करने का समय बच्चो का आता है तो वह अपने एक माता पिता को पाल नहीं पाते, और घर से निकाल बाहर करते है । आज कलयुग में लोग अपने माता पिता को बोझ समझे है, और अधिकतर ये भी देखा जाता है की वह उन्हें बृद्ध आश्रम छोड़ आते है, जिसके बाद वह अपना जीवन सुखी समझते हैं। लेकिन इसके विपरीत ऐसे लोग पाप के भागी बनते है और इनका जीवन दुखमय बीतता है l

हमें श्रावण कुमार के जीवन से यह सीख लेनी चाहिए की , संसार छूट जाये किन्तु माता पिता नहीं छूटने चाहिए , माता पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है, आपकी सारी पूजा पाठ, तीर्थ और कर्मकांड व्यर्थ है यदि आप अपने माता पिता का सम्मान नहीं करते, उनकी सेवा से ही धरती पर ही स्वर्ग के दर्शन होते है l

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Lalbaugcha Raja

Lalbaugcha Raja – लालबाग का राजा , इतिहास , निर्माण और मान्यता

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Lalbaugcha Raja – हमारे देश में बहुत से त्यौहार हैं जो बड़े ही धूम धाम और श्रद्धा से मनाए जाते हैं। क्योंकि हमारे देश में बहुत से लोग हैं जिनकी मान्यता अलग अलग भगवानों से जुड़ी हुई हैं। इसी तरह हर माहौल में भगवान के अलग अलग त्यौहार को बड़े उल्हास और धूम धाम से मनाये जाते हैं। इसी तरह जब भी त्योहारों में गणेश चतुर्थी का माहौल होता है तो लोगो की लंबी लंबी लाइन गणेश जी के दर्शन के लिए लग जाती है।

तो ऐसे में जब भी गणेश जी की बात होती है तो लालबाग राजा (Lalbaugha Raja) को जरूर याद किया जाता है। क्योंकि यहां पर गणेश चतुर्थी को बड़े ही धूम धाम से मनाया जाता है। जहां लोगो की लंबी लाइन लालबाग राजा के दर्शन के लिए घंटो तक इंतजार करती हैं। तो आइए जानते है आज लालबाग राजा की रोचक और ऐतिहासिक बातो के बारे में ।

Lalbaugha Raja

कहाँ स्थित है लाल बाग राजा का मंदिर

जैसे की हम सब जानते है लालबाग राजा मतलब गणेश जी का मंदिर जो महाराष्ट्र (Maharashtra) में स्थित है। जहाँ प्राचीन समय से मराठी लोगो के लिए गणेश भगवान को लेकर काफी मान्यता रही हैं। कहा जाता है की गणेश जी की पूजा की नीव सेनानी गंगाधर तिलक (Gangadhar Tilak) द्वारा की गई थी। यह वो समय था जब हमारा देश आजादी की लड़ाई को लड़ रहा था।

उस समय गणेश जी की अराधाना इसलिए की गई थी, की उस वक्त लोगो को एक साथ एकत्रित कर के आजादी पे चर्चा की जाती थी। लेकिन इस समय लाल बाग राजा को पेरू चाल बाजार के नाम से जाना जाता था। और उस समय इस मंदिर पर काफी विद्रोह भी हुआ और अन्य समस्याओं के कारण यह मंदिर बंद हो गया l

कैसे पड़ा नाम ” लालबाग”

स्वतंत्रता के बाद उस जगह को रहने के लिए उसका बदलाव किया जाने लगा। जिसके बाद उस जगह को समतल की मिट्टी से भरे जाने लगा। लेकिन रोचक बात यह थी की, इस मिट्टी का रंग धीरे धीरे लाल पड़ने लगा। जिस कारण उस जगह का नाम लालवाड़ी रखा गया। और मिट्टी में बदलाव आने के साथ साथ उस जगह पर कई तरह के फल के पेड़ होने लगे जिस कारण वो जगह बाग बन गई, जिसके बाद उस जगह का नाम लालबाग रखा गया। और जब वह मंदिर का निर्माण दुबारा किया गया तो काफी प्रसिद्धि दूर दूर तक होने लकी और यह मंदिर लालबाग के नाम से जाना जाने लगा।

कैसे हुआ निर्माण (Lalbaugcha Raja)

प्राचीन समय से ही किसी भी शुभ कार्य करने से पहले गणेश जी की पूजा की जाती है। जो प्रथा आज भी चलती आ रही है, जिसके चलते इन्हे विघ्नहर्ता भी कहते हैं। कहा जाता है की जो भी व्यक्ति गणेश जी की पूजा करते है वे उनके विघ्न को हर के सुख शांति प्रदान करते है। जानकारी के मुताबिक लाल बाग राजा सार्वजनिक मंडल का निर्माण सन 1934 में हुआ था जिसके बाद इस मंदिर में पूजा पाठ का निर्माण बाल गंगाधर तिलक जी ने शुरू किया था।

जिसके बाद इस लालबाग राजा का निर्माण हुआ और धीरे–धीरे यह मंदिर देश ही नहीं विदेश में भी प्रसिद्धि होने लगा और यहाँ लोगो की लंबी लंबी लाइन में लोग बप्पा के दर्शन करने आने लगे और अपनी हजारी लगाने लगे।

इच्छाओं का दरबार – (Lalbaugcha Raja)

हर साल हमारे देश में गणेश उत्सव बड़े धूम धाम से मनाया जाता हैं। लेकिन मुंबई का यह काफी प्रसिद्ध त्योहार हैं। जहाँ लोग गणपति बप्पा का आगमन बड़े ही उल्हास से करते है। और महाराष्ट्र के लाला बाग मंदिर में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित की जाती है जिसका नजारा हर जगह से हट के होता है यह मंदिर काफी समय पहले बनाया गया था आज के समय तक इस मंदिर में बेहद बदलाव किए गए ।

लेकिन इस मंदिर की प्रतिमा आज भी वैसी की वैसी है। साथ इस मंदिर की मान्यता यह भी है की इस मंदिर को इच्छाओं का मंदिर भी कहा जाता है जहाँ हर आए भक्त अपनी इच्छाओं को बप्पा के आगे रखते है और वह किसी न किसी रूप में आकर भक्तो के दुखो को हर कर उनको खुशियां देते है।

एक ही परिवार द्वारा बनाई जाती है, “लालबाग की प्रतिमा”

जी हा आप लोग सुन के हैरान होंगे की जब से लाल बाग का निर्माण हुआ है तब से लेकर आज तक इनकी प्रतिमा जो काफी मिलती– जुलती होती है वह सब प्रतिमा एक ही परिवार द्वारा बनाई जाती आ रही है । यानी परिवार की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी दूसरी पीढ़ी से आज तीसरी पीढ़ी यह कार्य को संभाल रही है। पिछले काफी लंबे समय से कबीली परिवार ही गणपति बाप्पा की प्रतिमा का कार्य करते है।

और उन्ही के द्वारा मंदिर की हर मूर्ति को बनाया जाता है, आज इस कार्य को तीसरी पीढ़ी द्वारा संभाला जा रहा है जिसमे परिवार में सबसे बुजुर्ग इंसान रत्नाकर है जो अपने पिता द्वारा सीखे गए इस अनुभव से आज इस कार्य में लीन है। रत्नाकर जी के पिता पहले महाराष्ट्र में हर जगह घूम घूम कर मूर्तियों का कार्य करते थे लेकिन जब वह बप्पा के दरबार पहुंचे तो वह उन्हीं को हो गए।

बप्पा के दर्शन करने का सही समय

बप्पा लालबाग की प्रतिमा आज काफी प्रसिद्ध हो चुकी है, जहाँ बड़ी संख्या में भक्तो का आना जाना लगा रहता हैं जिस कारण यहां भीड़ काफी बड़ी संख्या में होती है, और लोगो के मन में सवाल आता है की दर्शन करने का सही समय क्या है, अगर देखा जाये तो दर्शन करने का सही समय मंगलवार के दिन को छोड़ कर आप लोग किसी भी दिन रात में जाकर बप्पा के दर्शन बड़े ही आराम से कर सकते है। रात का समय वह समय है जहाँ लोगो की भीड़ काफी कम होती है जिस कारण आप लोग भीड़ से बच कर बप्पा के दर्शन कर उनसे मनोकामना कर अपनी इच्छा पूरी कर सकते हैं।

कैसे पहुंचा जाए लालबाग राजा के मन्दिर

अगर आप लोग भी लालबाग राजा के मंदिर जाने की सोच रहे है तो इसके लिए सबसे पहले आपको मुंबई पहुंचना पड़ेगा। जहाँ स्टेशन पर उतरने के बाद आप लोग वहा से किसी भी कैब, बस या मुंबई की चलने वाली लोकल ट्रेन में सवार होकर बप्पा के दर्शन के लिए पहुंच सकते हैं। और बप्पा के दर्शन कर सकते है l

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DRONACHARYA

DRONACHARYA – द्रोणाचार्य के जीवन की अनोखी कड़ीयां

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DRONACHARYA – जब भी इतिहास में किसी धनुर्धर की बात होती हैं तो द्रोणाचार्य के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर शिष्य अर्जुन को अवश्य याद किया जाता हैं। क्योंकि महाभारत के अर्जुन ने द्रोणाचार्य से धनुर्धर की शिक्षा प्राप्त कर एक सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का पद हासिल किया था। जिसमे द्रोणाचार्य ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ शिष्य होने का आशीर्वाद दिया था। महाभारत के द्रोणाचार्य जो कौरव और पांडवो के गुरु थे, जिन्होंने इन्हे दोनों को धनुर्धर की शिक्षा दे कर युद्ध के क्षेत्र में युद्ध के लिए सक्षम बनाया था।

DRONACHARYA

कौन थे द्रोणाचार्य

हम सभी ने महाभारत में द्रोणाचार्य जी के बारे में तो अवश्य सुना होगा। आचार्य द्रोण महाऋषि भारद्वाज के पुत्र थे। जिन्होंने धनुर्विद्या और वेद–वेदांतो की शिक्षा को प्राप्त किया था। ऐसे में आचार्य द्रोण के पिता भारद्वाज के मित्र राजा पृष्ट महामुनि के पुत्र द्रोपद भी आचार्य द्रोण के साथ धनुर्विद्या और वेदों के शिक्षा का अध्यन करते थे। माहराज महामुनि के पुत्र द्रोपद और महामुनि भारद्वाज के पुत्र द्रोण में काफी अच्छी मित्रता थी।

जिसके चलते उनकी मित्रता में द्रुपद आचार्य द्रोण से आगे चल कर राजा बनने के बाद अपना आधा राज्य आचार्य द्रोण को देने की बात किया करते थे। जिसके कारण इनकी मित्रता में काफी प्रेम होने लगा। लेकिन जैसे ही इनकी शिक्षा समाप्त हुई तो महामुनि भारद्वाज ने अपने पुत्र द्रोण का विवाह हस्तिनापुर के राजगुरु कृपाचर्या की बहन कृपी से करवा दिया । जिसके बाद उन दोनो ने एक बेहद ही स्नेह पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम अश्वथामा रखा गया।

कैसे हुआ द्रोणाचार्य का जन्म

महाभारत के आदिपर्व के अनुसार, द्रोण का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं हुआ था, बल्कि उनका जन्म द्रोणम में रेत से बने एक घड़े के से हुआ था। द्रोण से उत्पन्न होने के कारण उन्हें द्रोण कहा जाता था। द्रोण की जन्म कहानी इस प्रकार थी, एक दिन ऋषि भारद्वाज ने गंगा नदी में स्नान करते समय घृताची नामक एक सुंदर अप्सरा को देखा।

भारद्वाज घृताची सुंदरता से अत्यधिक आकर्षित हुए और उन्होंने स्वयं अपना वीर्य त्याग दिया। द्रोण ने अपना सारा वीर्य एक बर्तन में एकत्र कर अपने आश्रम में रख लिया। कुछ दिनों के बाद उस घड़े से द्रोणाचार्य उत्पन्न हुए। इसीलिए महाभारत में द्रोण की कोई माँ नहीं थी।

राजश्री परशुराम से प्राप्त की धनुर्विद्या

आचार्य द्रोण अपने पुत्र और पत्नी से काफी स्नेह रखते थे जिसके चलते वह उनका पालन पोषण बेहद अच्छे से करना चाहते थे। लेकिन वह एक आध्यात्मिक पुरुष भी थे। जिस कारण वह पालन पोषण से वंचित रहे। लेकिन एक समय पर आचार्य द्रोण को कही से खबर आई की राजश्री परशुराम अपनी सारी सुख संपति गरीबों और ब्राहमणों में दान कर के तपस्या के लिए वन जा रहे है। यह खबर सुन कर आचार्य द्रोण भी राजश्री परशुराम के पास गए। लेकिन राजश्री परशुराम अपनी सारी संपत्ति दान में दे चुके थे।

लेकिन राजश्री परशुराम ने जब आचार्य द्रोण को अपने द्वार पर खड़ा पाया तो वह उन्हे खाली हाथ लौटने के लिए न कह पाए। तब राजश्री परशुराम ने आचार्य द्रोण से कहा कि वह अपनी सारी संपत्ति दान कर चुके अब केवल उनके पास उनकी धनुर्धर विद्या और उनका शरीर बाकी है। जब आचार्य द्रोण ने यह बात सुनी तो उन्होंने राजश्री परशुराम से उनकी धनुर्धर विद्या उनको सिखाने का प्रस्ताव रखा।

जिसके बाद राजश्री परशुराम ने यह स्वीकार करते हुए उन्हें धनुर्धर की सारी विद्या सिखाई। जिस पश्चात वह धनुर्धर में काफी सर्वश्रेष्ठ हो गए। जैसे ही आचार्य द्रोण ने अपनी शिक्षा राजश्री परशुराम से प्राप्त की,उसके बाद उनकी प्रसिद्धि काफी दूर दूर तक फैलने लगी। जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी के भाई के पास पहुंच कर खुद को गुप्त रखा।

महाराज द्रोपद ने आचार्य द्रोण का किया अपमान

जब आचार्य द्रोण अपनी धनुर्धर शिक्षा को प्राप्त करके अपने रास्ते की और लौट रहे थे। तो उन्हे खबर मिली की पांचाल देश के राजा पृषत् का देहांत हो गया है और उनके स्थान पर उनका पुत्र द्रुपद पांचाल नरेश हो गया है। जिसके बाद उन्हें अपने मित्र से मिलने की काफी इच्छा उत्पन हुई। जिसके बाद वह पांचाल देश पहुंचे। लेकिन द्रोपद ने उन्हे पहचानने से इंकार किया और उनको एक गरीब भिखारी बताते हुए उनका अपमान किया।

आचार्य द्रोण ने जब अपनी दोस्ती का अध्यन करवाना चाहा तो महराज द्रुपद ने उन्हे यह कहते हुए अपमानित किया की एक माहराज की दोस्ती किसी भिखारी से नहीं हो सकती, उनकी दोस्ती उनके बराबरी वालो से होगी। जिसके बाद आचार्य द्रोण अपने अपमान का प्रतिशोध लेने के साथ वहा से हस्तिनापुर की और चल दिए।

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कैसे बने कौरवों और पांड्वो गुरु

एक दिन की बात है जब आचार्य द्रोण वन में अकेले घूम रहे थे। जिसके दौरान उन्होंने हस्तिनापुर के राजकुमार को वहा गेंद खेलते हुए देखा। उन्होंने देखा की राजकुमार की गेंद खेलते खेलते एक अंधे कुएं में जाकर गिर पड़ी है। जब राजकुमार ने उस गेंद को निकालने का प्रयास किया तो उनकी अंगूठी भी जाकर उस कुएं में गिर गई थी। जिसके बाद उस गेंद को निकालने के लिए कई तरह के प्रयास किए गए।

लेकिन सारे प्रयास असफल रहे, जब यह सारा दृश्य आचार्य द्रोण ने देखा तो वह उस अंधे कुएं के पास आ खड़े हुए। और उन्होंने राजकुमार से कहा की इतने क्षत्रिय होने के बाद भी यह आसान काम नहीं हो पा रहा। जिसके बाद उन्होंने हस्ते हुए मुख से राजकुमार को देखते हुए कहा, की क्या यह गेंद में निकाल दू। जिसके बाद राजकुमार ने उन्हे कहा की, हे ब्राहमण अगर यह गेंद निकाल देते है तो हम अपको हस्तिनापुर के माहराज के वहा पर अपको एक बढ़िया दावत का निमत्रण देंगे।

जिसके बाद आचार्य द्रोण ने सरकंडे लाने को कहा। जिसके बाद वहा पर सरकंडे लाए गए और आचार्य द्रोण ने एक एक करके उन सरकंडो को कुएं में डाला और अपना मंत्र बोलते गए। जिसके बाद तुरंत सरकंडे पे गेंद पीछे हिस्से पे चिपक कर बाहर आ गई। यह सब देख कर राजकुमार ने आचार्य द्रोण से अपनी अंगूठी को भी बाहर लाने का प्रस्ताव रखा। जिसके बाद आचार्य द्रोण ने अपने द्वारा एक तीर छोड़ा और उस तीर के सहारे राजकुमार की अंगूठी बाहर आ गई।

यह सब चमत्कार देख कर राजकुमार ने आचार्य द्रोण से हस्तिनापुर में चल कर भोज का आमंत्रण दिया। लेकिन आचार्य द्रोण ने अपना परिचय न बताते हुए राजकुमार से कहा की है, वत्स तुम्हारे दादा जी मुझे बेहद अच्छी तरह जानते है। उन्हे जब तुम यह घटी घटना के बारे में बताओगे तो वह तुरंत मुझे पहचान जायेंगे।

जब राजकुमार ने यह सब घटना अपने दादाश्री को बताई तो वह तुरंत पहचान गए। की यह महान व्यक्ति और कोई नी आचार्य द्रोण है जिसके बाद वह सारे काम छोड़ कर राजकुमार सहित वन में प्रस्थान किया। जिसके बाद पितामह भीष्म ने आचार्य द्रोण को भोज पर आने का निमंत्रण दिया। और आदर सहित आचार्य द्रोण का महल में प्रवेश करवाया गया, और उन्हे अपने राजकुमार को धनुर्विद्या सिखाने के लिए प्रार्थना की। और उनकी इस प्रार्थना को आचार्य द्रोण ने स्वीकार कर लियाऔर कौरव पांडव के गुरु बन उन्हे शिक्षा देना शुरू किया।

अर्जुन को दिया सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का वरदान

एक दिन की बाद है जब आचार्य द्रोण नदी में स्नान कर रहे थे तब उनका पैर मगरमच्छ ने अपने मुंह में दबोच लिया था जिसके बाद आचार्य द्रोण काफी घबरा गए और ये सारा दृश्य देख उनके शिष्य भी काफी गंभीर सोच में पड़ गए। जिसके बाद अर्जुन। ने अपना तीर छोड़ते हुए मगरमच्छ का वध किया। लेकिन अर्जुन द्वारा छोड़ा गया तीर सीधा मगर के मुंह में जाकर लगा। जिससे मगर का मुंह बिल्कुल खुला का खुला रह गया। जिससे आचार्य द्रोण का पैर आसानी से बाहर आ गया। और आचार्य द्रोण ने अर्जुन को काफी स्नेह देते हुए उसे दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का आशीर्वाद दिया।

शिक्षा खत्म होने पर मांगी अपनी भिक्षा

जैसे ही आचार्य द्रोण द्वारा जब शिक्षा को समाप्त किया गया। जिसके बाद आचार्य द्रोण ने राजकुमारों से भिक्षा में द्रुपद को बंधी बनाकर लाने को कहा। जिसमे पहले दुर्योधन को भेजा गया। जिसमे वह द्रुपद को लाने में असफल रहे। अब बारी थी अर्जुन की जब अर्जुन ने महाराज द्रुपद के राज्य में पहुंचे तो वहा सेना को खत्म किया और महाराज द्रुपद के साथ उनके मंत्री को बंधी बनाकर लाए।

जिसके बाद आचार्य द्रोण ने द्रुपद का राज्य अपने नाम किया। लेकिन उनका कहना था की वह अपनी मित्रता में कभी अहंकार नहीं लायेंगे। जिसके चलते उन्होंने महाराज द्रुपद को आधा राज्य सौप दिया और उन्हे वापिस राज्य लौट जाने को कहा।

भिक्षा में एकलव्य ने दिया द्रोण आचार्य को अपना अंगूठा

आचार्य द्रोण को सभी शिष्य में से अर्जुन काफी प्रिय थे , जिस दौरान वह अर्जुन से आगे किसी को नही जाने देना चाहते थे। जिसके चलते उन्होंने एकलव्य को अपना शिष्य बनाने से इंकार कर दिया गया था। एकलव्य जो आचार्य द्रोण से धनुर्धर की विद्या लेना चाहते थे लेकिन आचार्य द्रोण ने उन्हे इनकार कर दिया। जिसके बाद उन्होंने आचार्य द्रोण की मूर्ति अपने आश्रम में बनाई और उसी के पास अपने धनुर्धर की विद्या की शुरूवात की। जिसके बाद उन्होंने धनुर्धर विद्या में महारथ हासिल और अर्जुन से बड़े धनुर्धर बना ।

लेकिन एक समय पर जब आचार्य द्रोण एकलव्य के आश्रम के पास थे तो वहा उन्होंने देखा की एक कुत्ते पर तीर से वार किया गया। लेकिन वह वार इस प्रकार था की कुत्ता शांत हो जाए लेकिन उसे कोई हानि न हो। यह दृश्य के बाद आचार्य द्रोण काफी चकित रह गए, जिसके बाद वह उस धनुर्धर को ढूंढने लगे। जिसके बाद आचार्य द्रोण एकलव्य के आश्रम में जा पहुंचे । वहां उन्होंने स्वयं की मूर्ति को देखा जिसके आगे एकलव्य विद्या का अभ्यास कर रहे थे,

लेकिन द्रोणाचार्य को ज्ञात था की एकलव्य हस्तिनापुर के शत्रु सम्राट जरासंध के एक सेनापति निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र था और एक योद्धा राजकुमार था। एकलव्य के द्रोणाचार्य को अपना गुरु बताने पर द्रोणाचार्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में एकलव्य से अंगूठा मांग लिया ।

द्रोणाचार्य की मृत्यु कैसे हुई

महाभारत में द्रोणाचार्य कौरवों की तरफ से लड़ रहे थे , और पांड्वो की सेना को गाजर मूली की तरह काट रहे थे , पांड्वो की ऐसी स्तिथि देख कर श्री कृष्ण ने छल से द्रोणाचार्य को मारने की योजना बनाई , और युधिष्ठिर के मुख से द्रोणाचार्य के पुत्र अश्व्थामा के मरने की बात युद्ध में फैला दी, जबकि जिस अश्व्थामा की मृत्यु हुई थी वो असलियत में एक हाथी था ,जिसे सुनकर द्रोणाचार्य शोक में डूब गए और अपने हथियार डाल दिए, इस मौके का लाभ उठाते हुए द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने निहत्थे द्रोणाचार्य का सिर काट डाला।

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